सौरभ की हत्या की खबर क्यों राष्ट्रीय चैनलों को खबर लायक नहीं लगी?

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तारकेश कुमार ओझा

saurabh chaudhriवतन पे जो फिदा होगा… अमर ओ नौजवान होगा…। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के नजदीक बामनगाछी का नौजवान सौरभ चौधरी भी देश व समाज के लिए कुर्बान हो गया। लेकिन अफसोस कि उसकी शहादत कथित राष्ट्रीय मीडिया व नागरिक समाज में बहस तो दूर च्रर्चा का विषय भी नहीं बन पाई। अलबत्ता इसे लेकर प्रदेश की राजनीति में जरूर भूचाल की स्थिति है। कालेज का छात्र और तरोताजा नौजवान सौरभ चौधरी को अपने कस्बे में समाज विरोधी गतिविधियों के विरोध की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी। उसके प्रतिवादी स्वभाव से परेशान समाज विरोधी हत्यारे उसे घर से उठा ले गए, और शरीर के नौ टुकड़े कर शव को रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया। बात – बात पर कैंडल मार्च के मौजूदा दौर में सौरभ चौधरी ने अंजाम पता होने के बावजूद असामाजिक गतिविधियों का विरोध जारी रखा जिसके चलते उसकी हत्या हुई। यह कोई मामूली बात नहीं है। लेकिन विडंबना देखिए कि साई बाबा पर शंकराचार्य के बयान को लेकर घंटों बहस चलाने वाले तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों में इस पर एक लाइन की भी खबर नहीं चली। जो चैनल खुद ही बेतुके बोल का शीर्षक चलाते हैं, वहीं इस पर घंटों की बहस भी कराते हैं। संभव है कि सौरभ जैसे नौजवान की शहादत की जानकारी न हो पाने के चलते देश के नागरिक समाज में भी इसकी कोई चर्चा ही नहीं हो सकी। लेकिन क्या इसे उचित कहा जा सकता है। फिर किस आधार पर मीडिया घराने व राष्ट्रीय चैनल्स खुद के राष्ट्रीय होने का दावा करते हैं।

मोदी के प्लान पर रोज ज्ञान का पिटारा खोल कर बैठने वाला मीडिया किसी अभिनेता – अभिनेत्री की नई फिल्म रिलीज होने पर उसके प्रचार का दिन – रात भोंपू बजा सकता है। अाइपीएल की खबरों का हेवीडोज दर्शकों को पिला सकता है। लेकिन सौरभ चौधरी की हत्या जैसे नृशंस कांड की सुध लेने की भी उसे फुर्सत नहीं है। जबकि यह लोमहर्षक कांड देश के किसी सुदूर प्रदेश नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के नजदीक हुई। सवाल उठता है कि सौरभ की हत्या की खबर क्यों राष्ट्रीय चैनलों को खबर लायक नहीं लगी। मुझे याद है 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ था तब विश्व कप क्रिकेट भी खेला जा रहा था। उस दौरान कुछ समाचार पत्रों ने सैनिकों की शहादत पर क्रिकेट से जुड़ी खबरों को प्रमुखता दी। समाज से विरोध की आवाज उठी, तो समाचार पत्रों ने भी तत्काल गलती सुधार कर क्रिकेट के बजाय कारगिल युद्ध को प्रमुखता देनी शुरू कर दी। लेकिन क्या सौरभ चौधरी के मामले में वर्तमान राष्ट्रीय चैनल अपनी गलती सुधारेंगे।

(लेखक दैनिक जागरण से जुड़े हैं)

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