विष्णुगुप्त[caption id="attachment_11656" align="alignleft" width="621"]
कार्टूनिस्ट-सागर कुमार [/caption]
यह क्या चौथा खंभे का हस्र हुआ
यह क्या चौथा खंभे का पतन हुआ
यह क्या चौथा खंभे का अनैतिकरण हुआ
यह क्या चौथा खंभे का अपसंस्कृतिकरण हुआ
यह क्या चौथा खंभे अमानवीयकरण हुआ
यह क्या चौथा खंभे का अपराधीकरण हुआ
यह क्या चौथा खंभे का परसंप्रभुताकरण हुआ
खबर बनाने वाले ही खबर बन गये सनसनी फैलाने वाले ही सनसनी के शिकार बन गये स्किन पर चमकने वाले ही कब्र बन गये स्टिंग के शिकारी ही शिकार बन बन गये
नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले ही अनैतिक बन गये सदाचार-भष्टाचार का पाठ पढ़ाने वाले ही दुराचरी- भ्रष्टाचारी बन गये महिला सम्मान की बात करने वाले ही बलात्कारी बन गये स्टिंग आपरेशन से जेल कोभिजवाने वाले ही जेल के अपराधी बन गये सत्य-अहिंसा का झंडा ढोने वाले ही लहू और आबरू के कातिल बन गयेयह कैसी हवस की आग है आदमी नहीं हैवान-जानवर है दोस्त की बेटी को भी बेटी न समझा स्वयं की बेटी के दोस्त को बेटी न समझा सहयोगी-कर्मयोगी की इज्जत को इज्जत न समझा जिसको खिलाया गोद में उसको ही बना दिया हवस का शिकार
न चैथे खंभे की लाज न लोकलाज का डर न संपादक पद की गरिमा खोने का डर न स्वयं के परिजनों की नजरों में गिरने का डर न पुलिस परीक्षण-जांच का डर न न्यायालय की सजा का डर न जेल की चाहरदीवारी में जलालत भोगने का डर न स्टिंग-पर संप्रभुता कीकमाई खोने का डरहिंसक-दुराचरी, कुचक्रवादी, भ्रष्टाचारी बलात्कारी के पास कलम ही क्यों थी संपादक जैसी कुर्सी इनके पास क्यों थी चौथा स्तंभ के वे कैसे और क्यों बन गये महारथी मीडिया के चमकते सितारे क्यो बन गये ये प्रेरक और आदर्शवादी मीडिया शख्यियत क्यों बन बैठे जिन्हें जेलों में रहना था वे स्क्रीन के स्टार हुए क्यों हजारों करोड़ों के मालिक ये बने क्यों कहां से आता है इनके पास कुचक्र-हिंसकवादी रकम
आज संपादक -पत्रकार के खोल में कोई वीरप्पन है आज संपादक-पत्रकार के खोल में कोई नीरा राडि़या है आज सपंादक-पत्रकार के खोल में ओसामा बिन लादेन है आज कोई संपादक-पत्रकार के खोल में ए राजा है आज कोई संपादक पत्रकार के खोल में फई है आज कोई संपादक पत्रकार के खोल में आईएसआई हैचंद रूपये के टुकड़ों के लिए विदेश के दौरों के लिए पंचसितारा संस्कति के भोग के लिए अपसंस्कति के वाहक बनने के लिए एनजीओ फंड के लिए कारपोरेटेड लाभ के लिए नेताओं की चमचागिरी के लिए
ईमान बेचते है जमीर बेचते हैं देश बेचते हैं परिवार बेचते हैं गरीबों के भावनाएं बेचते है किसानों की तकदीर बेचते हैंहम भी कम दोषी हैं नहीं हम असलियत जान कर भी चुप थे क्यों हमारी कान-आखें तब क्यों नहीं खुली हम तब क्यो नही सजग हुए चौथा स्तंभ की नैतिकता क्यों नहीं जागी थी कहां थे चैथे स्तंभ के पैरबी कार कहां थे सवैधानिक नियामक
