
मुजफ्फरपुर (बिहार). बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ. ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी यक़ीनन इस कहावत पर विश्वास करते होंगे और संभवतः इसीलिए इसे अपने पत्रकारिता जीवन का स्वर्ण काल मान कर चल रहे होंगे.
हाल के दिनों में ऐसी चर्चा किसी पत्रकार, संपादक या मीडिया से जुड़े आदमी की नहीं हुई होगी जितनी सुधीर चौधरी की हुई. ये बात अलग है कि ऐसी चर्चा पर पर कोई गर्व नहीं कर सकता.
बहरहाल खबरिया चैनलों के माध्यम से सुधीर चौधरी और उनकी उगाही कथा महानगरों और छोटे शहरों से होते हुए गाँवों तक पहुँच गयी है और लोग घूरा पर इसकी चर्चा करने लगे हैं.
घूरा का मतलब नहीं समझे. मतलब गाँव के जीवन से आप वाकिफ नहीं है. गाँव से ताल्लुक रखने वाले घूरा का मतलब समझते होंगे. घूरा तापना गाँव में बहुत आम शब्द है और कंपकंपाती ठंढ में भी गप्पबाजी का अड्डा. शहर वाले इस घूरा को अलाव कह सकते हैं.
लेकिन गाँव में घूरा उनकी संस्कृति का एक हिस्सा है और यहाँ सिर्फ लोग आग तापने नहीं आते. बल्कि गप्पबाजी करने भी आते हैं.
यह गप्पबाजी मनोरंजक होती है. ऐसा मनोरंजन आपको 500 रूपये खर्च करके किसी मल्टीप्लेक्स में पॉपकोर्न खाते हुए भी नहीं मिल सकता.
घूरा पर स्थानीय विषयों पर चर्चा के अलावा देश – विदेश की भी चर्चा होती है और सिर्फ चर्चा ही नहीं होती बल्कि बीबीसी की तरह विश्लेषण भी होता है. वैसे बीबीसी रेडियो पर चली ख़बरें और हिन्दुस्तान अखबार में छपी ख़बरों का घूरा की चर्चा पर प्रभाव साफ़ – साफ देखा जा सकता है.
चर्चा रोचक होती है और ऐसी होती है कि न्यूज़ चैनलों पर आने वाले एक्सपर्ट भी शरमा जाएँ. विश्लेषण ऐसा कि न्यूज़ चैनल के एंकर भी टिप्स ले सकते हैं.
आजकल इसी घूरे पर ज़ी न्यूज़ के संपादक और बिज़नेस हेड सुधीर चौधरी भी स्वाहा हो रहे हैं जो ज़ी – जिंदल ब्लैकमेलिंग प्रकरण में हाल ही में जेल की हवा खाकर लौटे हैं और जमानत पर निकलते वक्त ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे कि पत्रकारिता के लिए न जाने उन्होंने कितनी बड़ी कुर्बानी दी है और पत्रकारीय कारणों से ही जेल गए थे. बहरहाल कोयले की कालिख अब दूर से ही दिखने लगी है और गाँव – देहात तक के लोग इस कालिख को पहचान चुके हैं.
मुजफ्फरपुर (बिहार) के एक गाँव के घूरे पर सुधीर चौधरी और स्टिंग की सीडी को लेकर चर्चा चल रही थी –
पहला व्यक्ति – आयं हो ई चैनल वला सब दलाले हो छई की ...
दूसरा व्यक्ति – की भेलई ..
पहला व्यक्ति – न जाने छहउ की, उ ज़ी न्यूज़ वाला सब जिंदलवा से पइसा पीटे के चक्कर में रहलइ , पकड़ा गेलई ....
दूसरा व्यक्ति – साला सब नेतवा लेखा पत्रकारो सब दलाल हो गेल है....
तीसरा व्यक्ति – एकरा आकर त जूता मार के चाही ...
चौथा व्यक्ति – गाँव में रहतइ र त उ दरगाह पर ले जाइके बरगदवा के पेड़ में उल्टा लटका देतई ....
पहला व्यक्ति – एही से न नेतवा सब इतराए छ .... कोई रोके – टोक न है .... देखहू ज़ी न्यूज़ वाला केना खबर बेचे गेलइ र .....
दूसरा व्यक्ति – साला देखही से खच्चर लगइ छ .
तीसरा व्यक्ति – लेकिन ओकरो आर से खच्चर निकललै जिन्दलवा... एहेन कलकई की तिहाड़ जाए के पड़ गेलई.....
पहला व्यक्ति – आयं हो छूट केना गेलइ ...
तीसरा व्यक्ति – पइसा से . सेटिंगबाज ..........सा.....!
