ब्रांड मोदी कितना पास कितना फेल ?

मोदी मैजिक
गांधी की मीडिया से दूरी देखो और अपना मीडिया ऑब्शेसन देखें मोदी
गांधी की मीडिया से दूरी देखो और अपना मीडिया ऑब्शेसन देखें मोदी
दुर्गेश उपाध्याय
दुर्गेश उपाध्याय

इन दिनों एक चर्चा जो कि मीडिया और आम लोगों में हो रही है वो ये कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है. जिस मोदी ब्रांड के सहारे भाजपा ने साल 2014 में अभूतपूर्व जीत हासिल की क्या उसमें गिरावट आनी शुरु हो गई है? अलग अलग लोगो की अपनी अपनी राय है. सरकार ने पिछले साल मई के महीने में सत्ता संभाली थी और देश ने यूपीए सरकार के दस सालों के शासन से ऊबकर मोदी की बातों पर भरोसा किया और ब्रांड मोदी पिछले लोकसभा चुनावों में लोगों के सिर चढकर बोला भी.

केंद्र में सत्ता में काबिज होने के बाद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ काफी ऊपर चढ़ा लोगों के मन में उनके प्रति भरोसे का स्तर काफी ऊंचा था. सबका साथ सबका विकास का नारा खूब गूंजा. मोदी एक प्रभावशाली ब्रांड के तौर पर इस देश में उभरे. जाहिर सी बात है कि मोदी को एक मजबूत ब्रांड बनाने के पीछे काफी सोची समझी रणनीति और मीडिया मैनेजमेंट शामिल था. जिस शानदार तरीके से और मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर उनको जोर शोर से पेश किया गया उसका सीधा असर जनता पर हुआ और मोदी ब्रांड चमक उठा. मोदी एक जादूगर की तरह भारतीय जनमानस पर छा गए. उनका क़द इतना बड़ा हो गया कि एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का क़द उनके सामने बौना दिखलाई देने लगा.

केंद्र में सत्ता संभालने के बाद जिस तरह से महाराष्ट्र चुनावों में भाजपा ने अपने पुराने सहयोगी शिव सेना के बगैर ही चुनावों में जाने का फैसला लिया उसके पीछे भी ब्रांड मोदी का ही कांफिडेंस था. क्यों कि अमित शाह और मोदी दोनों ये बखूबी जानते थे कि अभी भारतीय जनता के बीच मोदी अत्यधिक लोकप्रिय हैं और वो अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत ले आने में कामयाब हो पाएंगे. हुआ भी वैसा ही. महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनी. ठीक उसी तरह हरियाणा और जम्मू एवं कश्मीर में भी मोदी ब्रांड ने ही पार्टी को सत्ता में लाने मंा अहम भूमिका निभाई.

लेकिन बाद में एक ऐसा भी समय आया जब मोदी के प्रति लोगों के मन में निराशा का भाव उत्पन्न होना शुरु हुआ. आपको याद होगा कि मोदी ने किस तरह से चुनावों के दौरान काला धन वाले मुद्दे को लेकर काफी तीखे बयान दिए थे और जनता से ये वादा किया था कि सत्ता में आते ही वो सारा काला धन देश में वापस लाएंगे. बाद में केंद्र सरकार इस अति गंभीर मुद्दे पर क्या रवैया रहा, वो किसी से छिपा नहीं है. उसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा के दौरान जिस तरह से उनके 10 लाख के सूट की नकारात्मक चर्चा हुई उससे भी ब्रांड मोदी को काफी धक्का लगा. लोगों के बीच ये संदेश गया कि जो मोदी भारतीय जनमानस को यूपीए 2 के भ्रष्टाचार और मंहगाई के मुद्दे से निजात दिलाने और सबका साथ सबका विकास, सुशासन और नौजवानों के लिए रोजगार पैदा करने जैसे बड़े वादे करके सत्ता में आए बाद में उनकी वो बातें वास्तव में जमीनी हकीकत का रुप नहीं ले पा रही हैं.

यहां एक बात समझना जरुरी है कि मोदी को प्रधानमंत्री बने मात्र साल भर ही हुए हैं और उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री को ये बात समझना अनिवार्य है कि खुद उन्होंने ही भारतीय जनमानस की उम्मीदों को परवान चढ़ाया है और अगर वो उसको पूरा करने की दिशा में तेजी से काम करते हुए नहीं दिखाई देंगे तो लोगों के मन में गहरी निराशा का भाव उत्पन्न होगा जिससे उनकी अपनी ब्रांड इमेज को गहरा धक्का लगेगा.

विधान सभा चुनावों में जिस तरह से उन्होंने विपक्षियों पर चुनाव प्रचार के दौरान तीखे हमले किए और जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया उसकी भी काफी आलोचना हुई और ये माना गय़ा कि उन्हें ऐसा करना शोभा नहीं देता और ऐसा करना प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरुप नहीं है. जाहिर सी बात है कि इससे ब्रांड मोदी की इमेज प्रभावित हुई. विधानसभा चुनावों की कड़ी में दिल्ली विधानसभा चुनाव की बात करना जरुरी है. जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हमले किए उससे लड़ाई से बाहर मानी जा रही आम आदमी पार्टी को सत्तर में से 67 सीटें मिल गईं. चर्चा हुई कि मोदी जी की सारी जोर आजमाइश के बावजूद भाजपा की दुर्गति हो गई और उनकी लार्जर दैन लाइफ़ वाली इमेज को धक्का लगा.

यहां एक और महत्वपूर्ण बात जिसकी चर्चा आवश्यक है वो ये कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक खूब विदेश यात्राएं की हैं और विदेशी निवेश को भारत लाने के लिए उचित माहौल तैयार करने की कोशिश की है, इसकी सराहना भी हो रही है, मेड इन इंडिया कार्यक्रम को सरकार जोरशोर से प्रचारित कर रही है लेकिन देश में जिस तरह से आज भूमि अधिग्रहण बिल पर वो घिरे हुए दिखाई दे रहे हैं उससे गलत संदेश ये जा रहा है कि उन्हें किसानों के हितों की चिंता नहीं है, उनके ऊपर कॉरपोरेट्स लॉबी को लाभ पहुंचाने का आरोप विपक्ष मढ़ रहा है. इतने आनन फानन में भूमि अधिग्रहण बिल जैसे संवेदनशील मुद्दे को संसद में पारित करवाने की कवायद प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के लिए सिर दर्द का बड़ा कारण बन गई है. कहा ये जा रहा है कि वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कामयाब हो रहे हों लेकिन अपने खुद के देश के किसानों और खेतों खलिहानों के बीच जाकर ज़मीनी सच्चाई से रुबरु होना शायद अभी भी बाकी है.

जाहिर सी बात है कि मई में सरकार को एक साल पूरे होने जा रहे हैं और ब्रांड मोदी के प्रति लोगों में अविश्वास की स्थिति न सरकार के लिए ठीक है और न ही खुद प्रधानमंत्री ऐसा चाहेंगे, फिर इस ब्रांड की मजबूती के लिए जनता के भरोसे पर खरा उतरने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता और नहीं है.

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