आइडिया के स्तर पर अलग है वोडाफोन का नया रेड पोस्टपेड का विज्ञापन

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वोडाफोन रेड पोस्टपेड का विज्ञापन
वोडाफोन रेड पोस्टपेड का विज्ञापन

एक्सपर्ट नहीं, जैक ऑफ ऑल बनिएः वोडाफोन

वोडाफोन रेड पोस्टपेड का विज्ञापन
वोडाफोन रेड पोस्टपेड का विज्ञापन
वोडाफोन रेड पोस्टपेड का विज्ञापन बिना कुछ बोले भी आपका ध्यान खींचता है. बिना किसी शब्द प्रयोग के विजुअल्स के दम पर कोई विज्ञापन कितना असरदार हो सकता है, ये वोडाफोन जो-जो सीरिज से लेकर अब तक साबित करता आया है. इस विज्ञापन में भी ये बात बिल्कुल ही जुदा अंदाज में सामने आती है.

हाथ में गिटारनुमा साज लेकर, मुंह से सीटी बजाते हुए एक शख्स लोगों का ध्यान खींचकर फल बेचने की कोशिश करता है लेकिन आते-जाते लोग उसकी बिल्कुल भी नोटिस नहीं लेते..लेकिन जैसे ही अपने पूरे शरीर पर जुगाड़ से बनाए दर्जनों साज लादकर एक ही साथ बजाना शुरु करता है, सीटी के बजाय वही आवाज मॉथ आर्गन से निकालनी शुरु करता है, देखने-सुनने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती है…और फिर चारों तरफ से तालियां.

विज्ञापन सिर्फ इतना बताना चाहता है कि टुकड़ों-टुकड़ों में प्रीपेड रिचार्ज करने से बेहतर है कि पोस्टपेड सुविधा रखें और फिर चाहें तो जितनी बातें करें..लेकिन इस “टुकड़े-टुकड़े” के लिए जिस तरह से घरेलू साज का इस्तेमाल और उस शख्स के एफर्ट को दिखाया है, वो साबुन-सर्फ के शोर-शराबेवाले विज्ञापन से अलग है.

ये विज्ञापन न केवल आइडिया के स्तर पर अलग है बल्कि जिस कंटेंट को शामिल किया है वो हमारी जिंदगी से तेजी से गायब होते जा रहे हैं.याद कीजिए मोहल्ले की वो गलियां जिसमे कभी फेरीवाले कर्कश आवाज न लगाकर कुछ न कुछ साज बजाकर हमारा ध्यान खींचा करते थे, बाजार के चौक चराहे पर इस अंदाज में सामान बेचनेवालों की खासी संख्या होती थी लेकिन आज अगर उनके होने पर अजूबा या तमाशा लगता है तो इसका मतलब है कि किस्तों में ऐसी छोटी-छोटी बहुत सारी चीजें हमारे बीच से गायब होती जा रही है. ये विज्ञापन इसे नोटिसेबल बनाता है.

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