न्यूज24 पर निर्मल बाबा रिटर्नः जो चैनल खुद का नहीं है वो आपका-हमारा क्या होगा ?

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न्यूज़ 24 और निर्मल बाबा एक – दूसरे के बिना ज्यादा दिन तक नहीं रह सकते. आलोचना, मीडिया की नैतिकता और कोर्ट – कचहरी के चक्कर में चैनल और बाबा अलग तो हो गए , लेकिन सच्ची मुहब्बत थी सो फिर दोनों आ मिले . न्यूज़ 24 के स्क्रीन पर निर्मल बाबा रिटर्न कर चुके हैं. दरअसल दोनों ने एक – दूसरे को बहुत कुछ दिया है. निर्मल बाबा को और अधिक प्रसिद्धि मिली तो न्यूज़24 को टीआरपी के साथ – साथ मुद्रा की भी प्राप्ति हुई. अब फिर दोनों पुराने इतिहास को दुहरा रहे हैं और पाखण्ड एक बार फिर से लाइव है. मीडिया मामलों के विशेषज्ञ विनीत कुमार का विश्लेषण (मॉडरेटर)

news 24 nirmal babaन्यूज 24 पर निर्मल बाबा का विज्ञापन एक बार फिर से बदस्तूर जारी है. एक ऐसे चैनल पर जिसका शुरु से नारा ( इसे नारा तक ही समझें) रहा है- न्यूज इज बैक. न्यूज कितनी और किस तरह से बैक हुई, इस पर तो अळग से शोध की जरुरत है लेकिन इतना जरुर है कि एक ऐसे शख्स के गुणगान में विज्ञापन की वापसी हुई है जिसे दूसरे चैनलों के साथ-साथ खुद न्यूज24 लगभग खलनायक साबित कर चुका था. ये अलग बात है कि टीवी की दुनिया में निर्मल बाबा का आगमन इसी चैनल के जरिए हुआ और इतना ही नहीं इसने पेड कार्यक्रम और विज्ञापन को इस तरीके से दिखाया कि ये टीआरपी चार्ट तक में शामिल हो गया. मतलब विज्ञापन की टीआरपी न्यूज कंटेंट में आ गयी. इसे लेकर सोशल मीडिया पर घड़ीभर के लिए हो-हल्ला हुआ लेकिन बात आगे तक नहीं गई और सवाल इस पर भी नहीं उठा कि आखिर ये सब हुआ कैसे और टैम के लोग भांग खाकर रिपोर्ट जारी करते हैं क्या ?

 

खैर न्यूज 24 अब जबकि दोबारा से इस विज्ञापन को प्रसारित करना शुरु किया है तो इससे पहले उसने कोई खबर नहीं दिखाई जिससे कि ये साबित हो सके और हम टीवी ऑडिएंस समझ सकें कि निर्मल बाबा अपने इस ताजा विज्ञापन में जिस तरह से क्लेम कर रहा है कि उसके साथ साजिश की गई और जबरदस्ती फंसाया गया वो सब सही है. नैतिकता को ताक पर रख भी दें तो धंधे के लिहाज से भी चैनल को ये विज्ञापन प्रसारित करने से पहले ये जरुर बताना चाहिए था कि निर्मल बाबा पर लगे सारे आरोप निराधार साबित हुए हैं और ऐसा होने की स्थिति में हम दोबारा से उनके कार्यक्रम और विज्ञापन प्रसारित कर रहे हैं. दसबंद और बाकी ये बर्फी कहां से आ रही है, आपने कल आइसक्रीम क्यों नहीं खायी थी जैसे बेहूदा तरीके से सचमुच कृपा बरसनी शुरु होती है और हमने इसकी भली-भांति जांच कर ली है इसलिए हम इसे फिर से प्रसारित कर रहे हैं. लेकिन अगर चैनल ने विज्ञापन प्रसारित करने से पहले ऐसी कोई खबर नहीं की है और इधर निर्मल बाबा लगातार अपने खिलाफ दिखाए/की गई कार्रवाइयों को साजिश बताकर बकायदा प्रचार कर रहे हैं तो इसके क्या मायने हैं, इसे समझने की जरुरत है ?

पहली बात तो ये कि
न्यूज24 या ऐसे किसी भी चैनल पर अगर कोई पैसे देकर अपने पक्ष में विज्ञापन करवाने की हैसियत रखता है तो वो इसकी साख भी खरीद सकता है, उसकी साख से खुलेआम खेल सकता है और चैनल को इश बात में कोई आपत्ति नहीं होगी कि विज्ञापनदाता उसकी ही जमीन खोदने में लगा है. नोटों की गड्डियों के आगे चैनल को इस बात से रत्तीभर भी कोई मतलब नहीं है कि विज्ञापनदाता मीडिया के साथ क्या कर रहा है ?

दूसरा कि अगर निर्मल बाबा जैसा बदनाम और खुद मीडिया द्वारा समाज का खलनायक घोषित कर दिए जाने के बाद न्यूज 24 फिर से उसे मसीहा बनाने में जुटा है, उसकी छवि मेकओवर करने में लगा है तो इसका सीधा मतलब है कि पैसे के लिए चैनल कुछ भी दिखाने के लिए तैयार है ? ऐसे में ऑडिएंस के आगे एक बड़ा सवाल है कि क्या इस तरह की सौदेबाजी सिर्फ विज्ञापन के मामले में होती है, खबरों के साथ किसी किस्म की सौदेबाजी नहीं होती ? क्या इस घटना को ध्यान में रखते हुए ये बात आसानी से पचायी जा सकती है कि कोई चैनल या मीडिया संस्थान विज्ञापनदाताओं के पक्ष में अलग से माहौल तैयार नहीं करता या फिर जिनसे लाभ होता है उनके साथ खबरों की सौदेबाजी नहीं करता ? ये मामला सिर्फ निर्मल बाबा औऱ न्यूज 24 के साथ का नहीं है. आजतक को ही लें तो पहले तो उसने एन मार्ट के लंबे-लंबे विज्ञापन जो कि श्रम कानून के खिलाफ थे, इसका एमडी न्यूज इंटरव्यू की शक्ल में जिस तरीके की बातें करता दिखाया गया, कोई चाहे तो इस पर जनहित याचिका दायर कर सकता है. खैर, चैनल ने लगातार न केवल विज्ञापन दिखाए बल्कि इस कंपनी से जुड़ी छोटी-मोटी खबरों को भी अपनी बुलेटिन में जगह दी. अब जब इस कंपनी में अलग-अलग तरीके से काननी शिकंजे कसे जा रहे हैं, धोखाधड़ी और ग्राहकों के पैसे दबाने के मामले सामने आ रहे हैं तो बिल्कुल चुप है. कल संभव है कि फिर जब सामान्य हो जाएगा तो फिर से इसके विज्ञापन आने शुरु हो जाएंगे.

तीसरी और शायद सबसे जरुरी बात है
कि कल तक जिस चैनल ने निर्मल बाबा को ढोंगी औऱ जालसाज बताया, अब बिना किसी स्पष्टीकरण के सीधे-सीधे उसका विज्ञापन दिखा रहा है, ऐसे में क्या ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जो चैनल खुद अपनी साख की सौदेबाजी करने में वक्त नहीं लगाता और खुद का नहीं हो सकता वो ऑडिएंस और देश के लोगों का क्या होगा ? ऐसे में लोकतंत्र का चौथ खंभा कहलाने का ढोंग और फिर उससे सरकार की ओर से लाखों-करोड़ों रुपये की रिआयते लेने का काम अबाध गति से क्यों चलते रहने चाहिए. लोगों के हितों की रक्षा के नाम पर चलनेवाले ऐसे चैनल और मीडिया संस्थान जब खुद की जमीर बेचने में नहीं हिचक रहा हो वो खबर के नाम पर लो गों के साथ,उनकी भावनाओं और सरोकारों के साथ क्या कर रहा है, इस सवाल पर सोचने लगें तो आपके रोंगटे खड़े होने लगेंगे.

(विनीत कुमार- युवा मीडिया समीक्षक, टीवी कॉलमनिस्ट( तहलका हिन्दी) और मंडी में मीडिया किताब के लेखक.)

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