न्यूज़ चैनलों को फैक्ट्री का दर्जा मिले

न्यूज़ चैनल खोलना है तो सबसे पहले एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और बड़ी पूँजी की जरूरत होती है. इस पूँजी की व्यवस्था मालिक करता है. ऐसे में मालिक की नज़र बैलेंस शीट पर पहले होती है और मीडिया एथिक्स पर बाद में.

लाभ कमाना और अपनी लागत को वसूलना उसका पहला ध्येय होता है. प्रणव रॉय से लेकर राघव बहल और सुभाष चंद्रा तक ने यही किया और बड़ा मीडिया एम्पायर खड़ा किया.

बाकी भी यही कर रहे है. लाभ कमाना सर्वोपरि है और एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के लिहाज से इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

कोई भी कंपनी सरोकार के इरादे से बाजार में नहीं उतरती. वह बिजनेस करने और अपने ब्रांड को टॉप लेवल तक ले जाने के ईरादे के साथ आता है.

न्यूज़ भी अब एक प्रोडक्ट की तरह है जिसका उत्पादन न्यूज़ चैनल नाम के फैक्ट्री में होता है. सो इसे उतने ही अधिकार दिया जाना चाहिए जितनी किसी फैक्ट्री और प्रा.लि.कंपनी को मिलते हैं. इससे नैतिकता की बहस को विराम मिलेगा.

वैसे भी नीरा राडिया प्रकरण से ब्लैकमेलिंग प्रकरण तक , साख और नैतिकता बची कहाँ?

रही बात संपादक की तो उसका संपादकीय प्राइवेट लि.कंपनी के निर्देश के दायरे में ही सीमित होकर रह गया. नौकरी के आगे उसका स्टैंड गौण है. ऐसे में ये जरूरी है दोराहे पर चलने की अपेक्षा न्यूज़ इंडस्ट्री एक राह पर चले. या तो नैतिक रास्ते पर चले या फिर पूँजी के रास्ते पर.


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