नोट बंदी का फरमान: भ्रष्टाचार विरोधी या जन विरोधी?

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-निर्मल रानी-




निर्मल रानी
निर्मल रानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत् 8 नवंबर को सायंकाल भारत की सबसे बड़ी मुद्रा के रूप में प्रचलित एक हज़ार तथा पांच सौ रुपये के करंसी नोट को बंद किए जाने की अचानक घोषणा कर दी। यह दो बड़े करंसी नोट सरकार द्वारा बंद किए जा सकते हैं इस बात की संभावना पिछली यूपीए सरकार के शासनकाल से बनी हुई थी। ज़ाहिर है एक अर्थशास्त्री के नाते पूर्व प्रधानमंत्री डा० मनमोहन सिंह ने इस फैसले के दूरगामी परिणामों के मद्देनज़र उस समय यह फैसला नहीं लिया। परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह फैसला लेने से नहीं हिचकिचाए। वैसे भी प्रधानमंत्री की कार्यशैली और उनकी तजऱ्-ए-सियासत को भांपते हुए उनके किसी मंत्रिमंडलीय सहयोगी या सलाहकार ने भी उन्हें यह सुझाव देने का साहस नहीं किया कि अचानक लिए जाने वाले इस फैसले के परिणामस्वरूप देश की आम जनता,मज़दूर व गरीब वर्ग के लोग,छोटे व मंझले व्यापारी यहां तक कि स्वयं बैंक कर्मचारी भी कितने बड़े संकट में पड़ सकते हैं? परिणामस्वरूप वित्त मंत्रालय से संबंधित होने के बावजूद इस कदम की घोषणा स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा कर दी गई। और इस फैसले का परिणाम आज देश की जनता को किस रूप में भुगतना पड़ रहा है यह पूरा देश देख रहा है।

देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो,हमारे देश का काला धन जो चंद तथाकथित विशिष्ट लोगों द्वारा विदेशों में जमा किया गया है उसे वापस लाया जाए,धन की जमाखोरी बंद हो,रिश्वतखोरी खत्म हो यह आखिर देश का कौन नागरिक नहीं चाहता? सिवाए उनके कि जो लेाग पेशेवर तरीके से या आदतन भ्रष्टाचार,कालाबाज़ारी व जमाखोरी करने वाले,रिश्वतखोर तथा टैक्स चोरी के नेटवर्क का स्वयं हिस्सा हों। परंतु इस प्रकार के कुछ हज़ार या कुछ लाख लोगों को सुधारने या फिर उन्हें सबक सिखाने के नाम पर यदि देश के सवा अरब लोगों को कई-कई दिनों तक भूखे व प्यासे रहकर लंबी कतारों में खड़े रहने के लिए मजबूर कर दिया जाए यह आखिर कहां का निर्णय है और इसमें आखिर कौन सी प्रशासनिक या राजनैतिक दूरअंदेशी अथवा सूझबुझ नज़र आती है? गत् 9 नवंबर से लेकर अब तक पूरे देश के बैंकों व डाकघरों में देश का साधारण नागरिक जिनमें करोड़ों बुज़ुर्ग व असहाय वृद्ध व महिलाएं भी शामिल हैं अपना रोज़मर्रा का ज़रूरी कामकाज छोडक़र बैंकों में या तो पुरानी करंसी जमा करने के लिए या उन्हें छोटी करंसी में बदलने के लिए कतारों में खड़े हुए हैं। यही हाल कामकाजी लोगों का भी है। इसका सीधा असर उद्योग जगत, थोक एवं खुदरा व्यवसाय,दुकानदारों,शोरूम,सरकारी व गैर सरकारी कार्यालय सभी पर पड़ता देखा जा रहा है। देश की व्यवस्था को संचालित करने वाला परंतु दुर्भाग्यवश जमाखोरी व कालेधन जैसी बदनामी का टोकरा भी अपने सिर पर ढोने वाला व्यापारी वर्ग भी इस समय इस कद्र परेशान है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी 1969 में देश के चौदह प्रमुख निजी बैंकों को राष्ट्रीयकृत किए जाने की घोषणा की थी। उसके पश्चात 1980 में 6 और दूसरे बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। उस समय यह कदम उठाने की ज़रूरत इसलिए महसूस की गई थी कि निजी बैंक जिनके माध्यम से देश का 70 प्रतिशत आर्थिक लेनदेन व जमा खाता संचालित हो रहा था वे आम लोगों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने हेतु कर्ज उपलब्ध कराने का काम तेज़ी से नहीं कर रहे थे। लिहाज़ा जन सुविधाओं के मद्देनज़र यह कदम उठाने की ज़रूरत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने महसूस की। और इतने बड़े फैसले का असर देश के किसी भी खाताधारक पर कतई नहीं पड़ा। परंतु जिस प्रकार आज देश की जनता सडक़ों पर कतारों में खड़ी हुई है और अपनी परेशानियों के चलते वही जनता स्वयं को ही काले धन का सबसे बड़ा मुजरिम या दोषी समझने को मजबूर कर दी गई है इस बात की तो देशवासियों ने कल्पना भी नहीं की थी? प्राप्त समाचारों के अनुसार अब तक लगभग बीस लोग कतार में खड़े होने के कारण होने वाली तकलीफ व परेशानियों से तंग होकर अपनी जानें गंवा चुके हैं। क्या इन मृतकों ने या इनके परिजनों ने कभी यह सोचा होगा कि मोदी के शासनकाल में एक दिन ऐसा भी आएगा जबकि काला धन,भ्रष्टाचार व नकली नोटों पर नियंत्रण पाने के लिए उन्हें भी अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ेगी?




जिस प्रकार की अफरातफरी का माहौल देश में इस समय दिखाई दे रहा है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि सरकार ने यह कदम जल्दबाज़ी में तथा इस सिलसिले में पूरी तैयारी किए बगैर उठाया है। एक ओर तो वित्तमंत्री अरूण जेटली यह फरमा रहे हैं कि बैंकों के चेस्ट करंसी से भरे पड़े हैं तो दूसरी ओर यही सरकार लोगों को उन्हीं का धन देने हेतु सीमाएं निर्धारित कर रही है। कभी दो हज़ार कभी 45 सौ तो कभी दस हज़ार रुपये। बताया जा रहा है कि दो हज़ार रुपये की नोट को एटीएम मशीन की ट्रे उसके आकार के चलते स्वीकार नहीं कर पा रही है। उधर जिन लोगों को दो हज़ार की नई नोट मिल भी गई है वे बाज़ार में उन्हें लेकर सिर्फ इसलिए मारे-मारे फिर रहे हैं कि दो हज़ार की नोट के खुले नोट देने के लिए कोई छोटा व मध्यम वर्ग का दुकानदार तैयार नहीं है। वैसे भी एक हज़ार की करंसी बंद होने के बाद स्वाभाविक रूप से आम आदमी दो हज़ार रुपये की नोट अपने पास रखना भी नहीं चाह रहा है। देश के आधे से अधिक एटीएम या तो काम नहीं कर रहे हैं या फिर सौ और पचास की नोट जिन एटीएम पर मिल भी रही हैं वहां लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं। परंतु इन सब परेशानियों के बावजूद देश की जनता को यही समझाने की कोशिश की जा रही है कि यह सब देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए किया जा रहा है। और इन कदमों से काले धन पर लगाम लगाई जा सकेगी। सवाल यह है कि क्या प्रधाानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी भारतीय जनता पार्टी वास्तव में आम जनता को इतनी पेरशानी व मुसीबत में डालकर तथा देश के उद्योग तथा व्यापार को िफलहाल इतना बड़ा धक्का पहुंचाकर काला धन व भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की कोशिश कर रही है?

और यदि वास्तव में ऐसा है तो सरकार तथा भाजपा को देश को यह बताना चाहिए कि उनकी पार्टी के कर्नाट्क के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी ने पिछले दिनों अपनी बेटी की शादी में जो लगभग पांच सौ करोड़ रुपये खर्च किए वह धनराशि किस करंसी में दी गई? ज़ाहिर है यदि पुरानी एक हज़ार व पांच सौ की करंसी में शादी का खर्च उठाया गया तो यह काला धन नहीं तो और क्या था? और यदि नई करंसी को खर्च कर यह शादी की गई तो जब देश की आम जनता को दो व चार हज़ार रुपये उपलब्ध कराए जा रहे हैं ऐसे में रेड्डी को लगभग पांच सौ करोड़ रुपये कहां से हासिल हुए? गौरतलब है कि रेड्डी भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते तीन वर्ष जेल में भी रह चुके हैं और गत् वर्ष ही वे ज़मानत पर रिहा हुए हैं। जेल से आते ही उन्होंने इस वर्ष नोटबंदी की घोषणा के बाद अपनी बेटी की शादी पर इतनी धन-संपत्ति खर्च कर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। इसी प्रकार भाजपा को इस बात का स्पष्टीकरण भी देना चाहिए कि भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई ने प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा तथा 8 नवंबर से केवल दो दिन पहले ही चार करोड़ रुपये बैंक में आखिर किन परिस्थितियों में जमा करवाए? इस प्रकार के समाचार और भी कई जगहों से प्राप्त हो रहे हैं। वैसे भी आज देश के किसी भी बैंक में कोई भी बड़ा उद्योगपति,व्यवसायी,राजनेता या बड़ा अधिकारी कतार में खड़े होकर अपनी करेंसी जमा करता या नोटों की अदला-बदली करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। ऐेसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि नोटबंदी का मोदी फरमान भ्रष्टाचार विरोधी कम जबकि जनविरोधी ज़्यादा दिखाई दे रहा है।

(निर्मल रानी)

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