चिट् फंड वाले वसूली और ब्लैकमेलिंग से बचने के लिए खुद ही चैनल खोल लेते हैं

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दलाली के देवता

— आपने 25-30 करोड़ रूपए खर्च भी कर दिये पर चैनल कहीं दिखता नहीं है ?

— भाई जी 20-25 करोड़ और खर्च करने पड़ेंगे तब डिस्ट्रीब्यूशन ठीक होगा और फिर कहीं जाकर चैनल दिखेगा.

–तो आपने चैनल खोला क्यूँ है ?

–देखिये सच ये है कि…आप जानते है हमारी चिट् फंड कम्पनी है…छोटे छोटे शहरों में पत्रकार हमारे दफ्तर वसूली के लिए ऐसे पहुंचते थे जैसे बच्चा पैदा होने पर किन्नर घर पहुँचते हैं. अगर पैसा ना दो तो फिर ….atleast…अब पत्रकार और पुलिस से मुक्ति मिल गई है.

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ये बातचीत एक पत्रकार मित्र के ज़रिये एक चैनल मालिक से हो रही थी. चैनल मालिक मुझे कृषि भवन में मिले जहाँ वो शरद पवार से मिलने आये थे. कुछ दिन बाद पता लगा की चिट् फंड के एक पुराने मामले में यू पी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया.

मित्रों , मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र में बिल्डर, चिट् फंड और सरकारी कांट्रेक्टर जब कद काठी में बड़े होने लगते हैं तो वसूली और ब्लैकमेल से बचने के लिए खुद चैनल या अखबार खोल लेते है…

ये चैनल क्या खबर दिखाते होंगे आप अंदाजा लगा सकते हैं पर यहाँ सरकार की दलाली और लाईजनिंग को हुनर माना जाता है. पोलटिकल एडिटर सत्ता के गलियारों में चैनल मालिकों के लिए लाइजनिंग करते हैं और क्राईम रिपोर्टर पुलिस और जांच एजेंसियों में अपनी कम्पनी के मुकदमों की पैरवी करते हैं. ऐसे कुछ चैनल अब trp की दौड में भी बड रहे हैं और कुछ अपने नेटवर्क का विस्तार करने में लगे हैं. मुमकिन है कि पेड न्यूज़ के पेशे में ये चैनल सबसे आगे निकल जाएँ.

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मित्रों आपसे अब सिर्फ एक ही सवाल है …जवाब चाहूँगा…..क्या जिनके दामन पर गुनाहों के दाग है …वो अब इस देश को आएना दिखाएंगे ? क्या कोई विकल्प है ?

(आजतक के पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से)

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