अर्नब की लात खाने के लिए भी नेताओं को मैंने रिरियाते देखा है

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मनीष ठाकुर,पत्रकार




arnab-goswami1ये अर्नब पर हाई तौबा…किसने बनाया …क्या वो भगवान के घर से बन कर आया…आप जिसे हैवान बनाना चाहेंगे आपकी नफरत से वो भगवान बन जाएगा..आप जिसे भगवान बनाएंगे…वो आपका भ्रम तोड़ जाएगा…मत बनाइए किसी को हैवान या भगवान…..

मेरा हमेशा मानना रहा है कि इंसान कोई भी बड़ा और छोटा नहीं होता, वक्त और हालात उसे बडा या लिजलिजा बना देते हैं। उसकी चमक और धमक से जब आप नफरत करने लगते हैं तो उसे आप बडा बनाते चले जाते हैं। आज एक खबर यूं ही ट्यूटर पर ट्र्रैंड करने लगा टाइम्स नाऊ के पत्रकार अर्नब गोस्वामी के इस्तीफे को लेकर। बीबीसी ने एक खबर ट्यूटर के आधार पर ही बना दी और साबित कर दिया कि देश किसी अर्नव गोस्वामी नामक पत्रकार से कितना नफरत करता है। मानो अर्नब नामक यह पत्रकार देश की सबसे बड़ी समस्या थी जो निपट गई।

भगवान जाने इस खबर के पीछे का सच क्या है? लेकिन बेहद कम उम्र में जब से अर्नब चर्चित हुए हैं, खासकर टाईम्स नाऊ में आने के बाद, मैने रिपोर्टिंग करने के दौरान कई बडे दिग्गज नेताओ को अर्नब के चैनल के रिपोर्टरों के सामने गिरगिडाते देखा है कि उन्हें अर्नब के शो में बुलाया जाए। वहां अर्नब के लात खाने के लिए लगभग सभी दल के कद्दावर नेताओं को ललाइत देख कर लगा की सचमुच अर्नब बडे पत्रकार होगें। उन नेताओं को लगता था की मैडम सोनिया या भाजपा में उस समय आडवाणी और जेटली नियमित अर्नब शो देखते हैं…नेशन वांट्स टू नो….

उन से मेरी कभी कोई मुलाकात नहीं है लेकिन उनका तेवर हमेशा पसंद आया। याद आता है मैं चंडिगढ में साल भर पहले एक मंत्री के घर पर था। मीडिया का जमावडा था।सरकार के सलाहकार भी थे। चिंतन का विषय यह था कि अर्नव के प्रोग्राम में सरकार का पक्ष रखने किसे भेजा जाए। खट्टर सरकार के तमाम मीडिया सलाकार इस फैसले पर पहुंचे की अर्नव खा जाएगा। दिल्ली के किसी नेता को ही भेजो। किसी पत्रकार का सामना करने के लिए नेताओं के अंदर इतना खौफ और भय होता है यह नया अनुभव था।, यह भय भी पत्रकारिता की ताकत बढा रहा था।




लेकिन एकाएक दिखा की अर्नब मोदी सरकार से प्रभावित होने लगे। बतौर पत्रकार यह कितना सही है या गलत इस पर चर्चा की गुंजाईस है। क्या पत्रकार को सरकार की हर नीति का विपक्ष की तरह विरोध ही करना चाहिए। जैसा की तर्क दिया जाता है कि पत्रकारिता का मतलब है सत्ता के विरुध। इस पर भी बहस की गुंजाइस है। लेकिन एक ब्रिगेड अर्नब के खिलाफ हल्ला बोलने लगा। भारत के किसी पत्रकार को इतनी नफरत भी नसीब नहीं हुई। इसी नफरत ने अर्नब को हीरो बना दिया। अर्नब जो नाम और गरीमा पा गए वो अब तक किसी को नहीं पत्रकार को नहीं मिला।

लेकिन अब उन से उनका मंच छीन गया है। तो क्या जो आजादी अर्नब को उनके संस्थान ने दिया वो कोई और दे सकता है। सवाल अहम और भी है कि जो आजादी अर्नब को टाइम्स नाउ ने दिया वो आजादी कौन पत्रकार नहीं चाहता? पर कितनों को नसीब हुआ? तो क्या अर्नब उपर से बन कर आए थे। या किस्मत ने उन्हे अवसर दिया?

मनीष ठाकुर
मनीष ठाकुर

पत्रकारिता के लगभग 18 साल के सफर में हमने कई बार पाया कि बाहर से जो मुझे महान पत्रकार दिखे जिनका सम्मान करता था उनके साथ काम करने या बीट रिपोर्टिंग के दौरान वक्त गुजारने के बाद ज्यादातर पत्रकारों के लिए लगा ये बेहद हल्के हैं। बस अवसर ने इन्हे बडा बना दिया। मंच से बाहर आते ही वे कहीं के नहीं रहे। हां कई ने अकेले दम पर भी अपनी योग्यता साबित किया। कई जो लोगों की जिंदगी बनाने का दाबा करते थे उन्हें कुछ ही साल के अंदर केचुए की तरह रेंगते देखा। अनुभव यही रहा कि अपने किसी बॉस को कभी तुर्रम खां मत मानिए। यदि आप सचमुच पत्रकार हैं तो अपने बॉस को बराबरी के स्तर पर आंकिए । सचमुच ये पेशा अन्य पेशों जुदा है। कोई आप से काबिल नहीं है। हां काबिल होने का अहंकार मत पालिए……किसी को भगवान या हैवान मत बनाइए….

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