यूपी में अखिलेश की उजली छवि पर दाग लगा रहे यूपी के भ्रष्ट सूचना आयुक्त

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सरकारी खर्चे पर यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निजी फेसबुक-ट्विटर का प्रचार
अखिलेश यादव,मुख्यमंत्री, यूपी

उर्वशी शर्मा

लखनऊ. यूपी की राजधानी लखनऊ की चर्चित समाजसेविका और आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा ने यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त और सूबे के पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी द्वारा सूचना आयोग की फाइलों को विनष्ट करने के लिए बीते साल मार्च में जारी किये गए एक आदेश को अवैध बताते हुए इस आदेश को आधार बनाकर जावेद उस्मानी, सभी 8 सूचना आयुक्तों, आयोग के सचिव राघवेन्द्र विक्रम सिंह समेत आयोग के अनेकों अधिकारियों को भ्रष्टाचार करने, भ्रष्टाचार को पोषित करने,आयोग में भ्रष्टाचार को बढाने वाला और आरटीआई आवेदकों के साथ धोखाधड़ी बताते हुए कटघरे में खड़ा किया है और इन सभी पर अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए यूपी के सीएम अखिलेश यादव की उजली छवि पर
दाग लगाने का कार्य करने का आरोप लगाते हुए इन सबकी शिकायत सूबे के सीएम और राज्यपाल को प्रेषित की है.

उर्वशी ने बताया कि सूचना आयोग के सभी भ्रष्ट अधिकारियों ने एक राय होकर एक ऐसा आदेश जारी कर दिया है जिसे करने के लिए सूचना आयोग अधिकृत ही नहीं था. बीते साल के मार्च माह में यह आदेश जारी कर सूचना आयोग की फाइलों को 6 महीने बाद ही नष्ट करने का प्राविधान किया गया है जबकि केंद्र सरकार और सूबे की सरकार ने आरटीआई के प्रकरणों से सम्बंधित पत्रावलियों को कम से कम 3 वर्ष तक रखे जाने की अनिवार्यता रखी गयी है. बकौल उर्वशी किसी श्रेणी की पत्रावलियों को विनष्ट किया जाना एक नीतिगत प्रश्न है और सूचना आयुक्त या सूचना आयोग केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार की नीति से प्रतिकूल जाकर अधिनियम की धारा 15(4) के तहत इस प्रकार का मनमाना अतिक्रमण करने के लिए अधिकृत नहीं हैं.

उर्वशी ने बताया कि अधिनियम की धारा 15(4) के तहत सूहना आयोग के कार्यों के साधारण अधीक्षण,निदेशन और प्रबंध के सम्बन्ध में ही नियम बनाए जा सकते हैं न कि नीतिगत विषयों के सम्बन्ध में. बकौल उर्वशी उनको कुछ सूत्रों से जानकारी मिली है कि आरटीआई जद में आये भ्रष्ट लोकसेवकों के समूह ने इस गैरकानूनी आदेश को जारी कराने के लिए जावेद उस्मानी समेत सभी सूचना आयुक्तों को घूस की मोटी रकम दी थी और इस अवैध आदेश को बनाए रखकर सभी सूचना आयुक्त भ्रष्ट लोकसेवकों के समूह से आज भी मोटी रकम ऐंठ रहे हैं और यही कारण है कि इलेक्शन कमिश्नर के समकक्ष पद धारित करने वाले पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी , मुख्य सचिव के समकक्ष पद धारित करने वाले
सूचना आयुक्त और आई.ए.एस. कैडर के सचिव राघवेन्द्र विक्रम सिंह इस अनियमितता पर आँख बंद किये हैं और 8-8 महीने आगे की तारीखे देने वाला सूचना आयोग गुपचुप केस ख़त्म कर 6 महीने में सूचना आयुक्तों और लोकसेवकों के भ्रष्टाचार के सबूतों को नष्ट कर रहा है.

बकौल उर्वशी यदि सूबे के सभी कार्यालयों के विभागाध्यक्ष इन सूचना आयुक्तों की मानिंद फाइलों को विनष्ट करने के मनमाने आदेश करने लगें तो अपने समय की अनियमितताओं की फाइलें अपने हिसाब से नष्ट कर निश्चिन्त हो जाएँ और सूबे का प्रशासनिक ढांचा भरभरा के गिर पड़े.

सूचना आयुक्तों के द्वारा इस गैरकानूनी आदेश को जारी करने और इस गैरकानूनी आदेश के अनुसार कार्य कराने को भारतीय दंड विधान और पब्लिक रिकार्ड्स एक्ट के तहत 5 साल की सजा वाला अपराध बताते हुए उर्वशी ने एस.एस.पी. लखनऊ को एक तहरीर देकर जावेद उस्मानी, 8 सूचना आयुक्तों और सचिव राघवेन्द्र विक्रम सिंह के खिलाफ एफ.आई.आर. लिखकर वैधानिक कार्यवाही की मांग की है.

बकौल उर्वशी सूचना आयुक्तों के ऐसे गैरकानूनी कृत्यों से सूबे का नाम तो बदनाम हो ही रहा है और साथ ही साथ पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्ध सूबे के मुखिया अखिलेश यादव की उजली छवि पर दाग लग रहे हैं और इसीलिये उन्होंने राज्यपाल के साथ साथ अखिलेश को पत्र भेजकर सूचना आयुक्तों के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग भी की है.

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