बहुजन पत्रकारिता की चुनौती पर हुआ मंथन

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वीरेंद्र यादव

हिंदी-अंग्रेजी की मासिक पत्रिका फॉरवर्ड प्रेस के संवाददाताओं की दो दिवसीय कार्यशाला और पत्रिका का पांचवां स्थापना दिवस समारोह 26 और 27 जून, 14 को नई दिल्ली में आयोजित किया गया। इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में आयोजित कार्यशाला में देश भर के करीब 50 संवाददाताओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान पत्रकारिता व खासकर बहुजन पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की गयी। इस मौके पर अस्पायर प्रकाशन की अध्यक्ष डॉ सिल्विया फर्नाडिज ने पत्रिका के प्रकाशन और इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला, जबकि पत्रिका के मुख्य संपादक आयवन कोस्का ने बहुजन पत्रकारिता की दिशा-दशा पर चर्चा करते हुए फॉरवर्ड प्रेस के बहुुजन सरोकारों की वकालत और भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने पत्रकारिता के सैद्धांतिक पक्ष पर भी प्रकाश डाला। पत्रकारिता के आंतरिक ढांचे और व्यावसायिक पक्षों पर भी जोर दिया। पाठक और प्रबंधन के अंतर्संबंधों और अंतर्व्यवहारों पर भी चर्चा हुई। इस दौरान संवाददाताओं के साथ विभिन्न मुद्दों पर विमर्श का सिलसिला भी चलता रहा। डॉ टॉम वुल्फ ने ज्योतिराव फूले और सावित्री बाई फूले के विषय में व्यापक चर्चा की और कहा कि भारत में महिला शिक्षा को लेकर पहला प्रयास सावित्री बाई फूले ने किया था। उधर केमलिन ने भारतीय संविधान के प्रस्तावना और भारतीय समाज व्यवस्था में उसकी महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बाबा साहेब भीम राव अंंबेदकर ने किस तरह संविधान के माध्यम से नये भारत की आधारशिला रखी और उसी आधारशिला पर भारतीय लोकतंत्र निरंतर मजबूत होता जा रहा है।

कार्यशाला के दूसरे दिन पत्रकार अविनाश और छायाकार सर्वेश ने पत्रकारिता के जातीय स्वरूप, सामाजिक बनावट और बहुुजन पत्रकारिता की चुनौतियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की। इसके बाद फॉरवर्ड प्रेस के संवाददाताओं ने पत्रिका की चुनौती और उससे मुकाबले के लिए अपनी भूमिका पर चर्चा की। सभी संवाददाताओं ने इस बात का भरोसा दिलाया कि वह पत्रिका के विस्तार और वैचारिक संघर्ष को मजबूत करने के लिए अपना योगदान देंगे।

कार्यशाला व स्थापना दिवस का अंतिम कार्यक्रम फॉरवर्ड प्रेस सम्मान समारोह का था। इसमें प्रथम ‘महात्मा जोतिबा और क्रांतिज्योति सावित्री फूले बहुजन रत्न सम्मान’ से इग्नू की प्रो वीसी सुषमा यादव और दिल्ली के पोस्ट मास्टर जेनरल राजेंद्र कश्यप को सम्मानित किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद थे।

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