योगेन्द्र यादव की नज़र में श्रीकृष्ण

तेंतीस करोड़ देवी-देवताओं में श्रीकृष्ण को ही 'पूर्णावतार' क्यों कहा गया? मैं परंपरागत अर्थ में धार्मिक नहीं हूँ। यानि पूजा-पाठ नहीं करता, कर्मकांड से बचता हूँ, अपने से मंदिर-मस्जिद में नहीं जाता। लेकिन धर्म का तिरस्कार नहीं करता, उसके महत्व को नहीं नकारता।

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योगेन्द्र यादव, संवाद इंडिया

तेंतीस करोड़ देवी-देवताओं में श्रीकृष्ण को ही ‘पूर्णावतार’ क्यों कहा गया?

मैं परंपरागत अर्थ में धार्मिक नहीं हूँ। यानि पूजा-पाठ नहीं करता, कर्मकांड से बचता हूँ, अपने से मंदिर-मस्जिद में नहीं जाता। लेकिन धर्म का तिरस्कार नहीं करता, उसके महत्व को नहीं नकारता। किसी की आस्था का अनादर नहीं करता, चाहे वो आस्था भगवान् के किसी निर्गुण या सगुण रूप में हो, किसी महापुरुष में हो या किसी ग्रन्थ में। इसलिए जब कोई साथी किसी मंदिर, गुरूद्वारे, चर्च या दरगाह ले जाता है, या फिर किसी मूर्ति पर माला चढ़ाने को कहता है तो मैं ना नहीं करता।

लेकिन बचपन से ही आध्यात्म के प्रति आकर्षण रहा है। यह तो साफ़ था कि जीवन का अर्थ केवल भौतिक सुख-सुविधा या उपलब्धियों में नहीं है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अपने अंतर्मन से बेहतर सम्बन्ध बनाने का महत्व समझ आने लगा है। इस उद्देश्य और अपने धर्म को समझने के लिए पिछले कुछ समय से मैं नियमित रूप से भगवतगीता को पढ़ रहा हूँ। गीता पर गांधीजी और विनोबा की टीका से भी सीख रहा हूँ।

यह सब कहने का सन्दर्भ कल सुबह से छिड़ा विवाद है। आज दिन भर कई साथियों ने मुझसे भगवान कृष्ण और हिन्दू धर्म पर मेरे विचार पूछे। कईयों ने यदुवंशी होने के नाते श्रीकृष्ण से मेरे विशेष सम्बन्ध का हवाला दिया। (ये बात मेरे गले नहीं उतरती, क्योंकि कोई महापुरुष या देवता किसी जाति विशेष की संपत्ति नहीं होता)।कई लोगों ने जी भर के गाली-गलौज की — हिन्दू विरोधी, कम्युनिस्ट और जो मुंह में आया वो कहा। गालियों का तो क्या जवाब दूं, बस उम्मीद कर सकता हूँ कि जब उनका गुस्सा ठंडा हो जायेगा तो वो देख पाएंगे की मेरे विचार उनकी छवि से ठीक विपरीत हैं। मैंने पिछले पच्चीस साल से वामपंथियों की इसी बात पर आलोचना की है की वे भारतीय समाज और संस्कृति नहीं समझ पाए। अंग्रेज़ीदां बुद्धिजीवियों में भारतीय परम्पराओं और हिन्दू धर्म को गाली देने का जो फैशन चला हैं, उसका मैंने बार-बार विरोध किया है।

दरअसल इस सवाल पर सोचने में मुझे राममनोहर लोहिया से बहुत मदद मिली है। हमारी संस्कृति के मुख्य प्रतीकों के बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा। मैं सोचता था कि हिन्दू धर्म के तेंतीस करोड़ देवी-देवताओं में श्रीकृष्ण को ही ‘पूर्णावतार’ क्यों कहा गया? लोहिया में मुझे इसका उत्तर मिलता है। उसके कुछ उद्धरण पेश हैं:
“रास का कृष्ण और गीता का कृष्ण एक है”

“कृष्ण उसी तत्त्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलांघता-उलांघता सबमे मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता।”

“त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। … द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमे उसे सम्पूर्ण सफलता मिली। कृष्ण सम्पूर्ण और अबोध मनुष्य है…”
“राम त्रेता के मीठे, शांत, सुसंस्कृत युग का देव है। कृष्ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम गम्य है, कृष्णा अगम्य।”

“त्रेता का राम हिंदुस्तान की उत्तर-दक्षिण एकता का देव है। द्वापर का कृष्ण देश की पूर्व-पश्चिम एकता का देव है।”
“मैं समझता हूँ कि अगर नारी कभी नर के बराबर हुई है तो सिर्फ ब्रज में और कान्हा के पास।”
“मिलो ब्रज की रज में पुष्पों की महक, दो हिंदुस्तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता।”

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