दलाल पत्रकारों के बीच योगेन्द्र की पत्रकारिता, एनडीटीवी पर रवीश के प्राइम टाइम में किया बड़ा खुलासा

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yogendra-ON-NDTV INDIA

हालात खराब है. पत्रकारों में दलालों का जमावड़ा हो चुका है. विनोद दुआ जैसे पत्रकार खानसामा बने हुए हैं. पुण्य प्रसून बाजपेयी ज़ी न्यूज़ की नौकरी को सलाम करते हुए आपातकाल की घोषणा कर रहे हैं.

ज़ी न्यूज़ सरकारी चमचई की हदों को पार करते हुए, भीड़ में उत्पातियों के होने के एलान के साथ – साथ लोगों को घर जाने की अपील कर रहा है.

दो संपादक उगाही करते हुए स्क्रीन पर देखे जाते हैं. बरखा दत्त जैसी पत्रकार नीरा राडिया के साथ बात करते हुए बेपर्दा हो जाती है.

ऐसा लगता है कि पत्रकारिता का बेड़ा गर्क हो रहा है और आशा की कोई किरण बाकी नही. लेकिन जब अंधियारा घना हो जाता है तभी सवेरा होता है.

आज पत्रकारिता के संदर्भ में भी यही कहावत सच साबित हुई जब एनडीटीवी इंडिया के स्क्रीन पर एक जाबांज पत्रकार का उदय हुआ. वह कोई बड़ा नाम नहीं. अभी कायदे से पत्रकार भी नहीं बना. दिल्ली विश्वविद्यालय के अम्बेडकर कॉलेज में पत्रकारिता का विद्यार्थी है.

लेकिन उसने जो काम किया वह दिग्गज पत्रकार और न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टर भी न कर सके और ऐसा करके उसने उम्मीदों को जिंदा रखा कि नयी पौध में पत्रकारिता का जज्बा अभी बाकी है. सच के सिपाही तैयार हो रहे हैं जो करप्ट सिस्टम से लोहा लेने के लिए तैयार हैं.

पत्रकारिता के छात्र योगेन्द्र ने हवलदार सुभाष सिंह तोमर के सम्बन्ध में रवीश के प्राइम टाइम में महत्वपूर्ण खुलासा किया. गौरतलब है कि वह इस घटना का चश्मदीद भी है और उसी ने हवलदार सुभाष सिंह तोमर को अस्पताल तक पहुँचा कर अपनी इंसानियत दिखाई.

उसने एनडीटीवी पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर के दावों को पलीता लगाते हुए कहा कि हवलदार सुभाष सिंह तोमर खुद ही दौड़ते हुए गिर गए थे. बाहरी तौर पर उनके शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था. यानी उन्हें पत्थर से चोट नहीं लगी थी.

उसका ये भी दावा था कि पुलिस अपने सहकर्मी को बेहोशी की हालत में देखने के बावजूद एम्बुलेंस बुलाने की बजाये भीड़ के पीछे भाग गए. योगेन्द्र के इस बयान से इस केस में नया मोड़ आया है.

गौरतलब है कि पुलिस ने हवलदार सुभाष सिंह तोमर की मौत का पूरा भार आंदोलन पर डालने का बंदोबस्त कर लिया था और इसी सिलसिले में आठ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था.

योगेन्द्र एनडीटीवी पर निर्भीकता से बोले और उनकी निर्भीकता ने यह उम्मीद बंधाई कि टिमटिमाते तारों के बीच आने वाले समय में कई चमचमाते ध्रुवतारे भी पत्रकारिता के आकाश में जगमगाएंगे. रिपोर्टर अभी जिन्दा है. योगेन्द्र की हिम्मत और हौसले को सलाम.

एनडीटीवी इंडिया की रिपोर्ट :

चश्मदीद का दावा, दौड़ते वक्त खुद ही गिर पड़े थे सुभाष तोमर!

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर की मौत कैसे हुई इसपर अब विवाद गहराता जा रहा है। अब एक लड़का सामने आया है जिसका कहना है कि उसने सुभाष तोमर गिरते को देखा था। इसके बाद उसने पुलिस की मदद से उन्हें अस्पताल भी पहुंचाया।

योगेंद्र नाम के इस लड़के के मुताबिक सुभाष तोमर को किसी प्रदशर्नकारी ने पीटा नहीं था जबकि दिल्ली पुलिस के सीपी का कहना था कि सुभाष तोमर को गर्दन छाती और पेट पर चोट के निशान थे। इस बीच इंतज़ार है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का जिससे तस्वीर साफ होगी।

कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर जिनकी मौत की वजह को लेकर तमाम सवाल खड़े हुए थे, इस पर एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान के बाद नया मोड़ आ गया है। कॉन्सटेबल तोमर 22 तारीख़ को इंडिया गेट प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर थे। तस्वीरों में कॉन्स्टेबल को संभाल रहे इस युवक के मुताबिक तोमर को चोट नहीं आई और दौड़ते-दौड़ते वह अचानक गिर पड़े। योगेंद्र नाम के इस युवक और उसकी सहयोगी ने कॉन्स्टेबल को पुलिस की मदद से अस्पताल पहुंचाया था।

उधर, दिल्ली पुलिस के आला अफ़सर योगेंद्र के बयान पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। पुलिस योगेंद्र के बयान को सच मानने को तैयार नहीं है।

पुलिस के आला अफ़सर यह दावा भी कर रहे हैं कि सुभाष के शरीर पर चोट के निशान हैं।

योगेंद्र के दावे से लगता है कि सुभाष की मौत पत्थरबाज़ी के दौरान नहीं हुई लेकिन हक़ीकत तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही पता चल पाएगी।

2 COMMENTS

  1. me khud abhi prime time aur news point me yogendra ko sun raha tha muze darr bas iss baat ka hai ki iss baat ko fir se daba diya naa jaye kyuki is baat se bohot se chehre ujagar hoge…aur delhi police ka bhi asli chehra samne aa jayega….
    chinta ye bhi hai ki yogendra ko delhi police tang naa kare..hatzzz of to yogendra

  2. I agree that it is the new generation of journalists in whom we can repose our faith and it is always that black sheep is found in all the professions as we are coming from the same society which is having honest, less honest, corrupt and more corrupt in it. It is actually, the owners of the channels or newspapers who burden the journalists to buckle under pressure of various kinds, some make us chefs (Vinod Dua, a great journalist who has potential to shake governments and hold them accountable), others consider it good to become Dalals (Zee news editors) or anybody else mentioned in your article (allegedly talking to Radia. But the management is successful only because we succumb to their pressures. Now, find out who are the people owning TV news channels – to my disappointment most of them are actually real estate monsters or having tainted business and money. To cover up their own tainted business or activities they wield press clout rather misuse the name of the media so that nobody question them. It is high time that to purge the media, the licenses of TV news channels must be revoked and only people belonging to real media be given permission to run News channels and none else, not even politicians. Only then true media can work in the interest of the country. Otherwise Dalals will do irreparable loss to the profession and public will stop taking media seriously, rather, people have already stopped taking media seriously. This is an alarming stage.

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