चंद टीवी-प्रिंट के पत्रकारों की बेहतर जिंदगी,बाकी का हाल फटेहाल

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चंद टीवी-प्रिंट के पत्रकारों की बेहतर जिंदगी,बाकी का हाल फटेहाल
चंद टीवी-प्रिंट के पत्रकारों की बेहतर जिंदगी,बाकी का हाल फटेहाल

मनीष श्रीवास्तव

चंद टीवी-प्रिंट के पत्रकारों की बेहतर जिंदगी,बाकी का हाल फटेहाल
चंद टीवी-प्रिंट के पत्रकारों की बेहतर जिंदगी,बाकी का हाल फटेहाल

प्रिंट मीडिया हो या चौबीस घंटे चलने वाले टेलीविजन न्यूज़ चैनल मीडिया का बड़ा ब्रांड हो या छोटा, सभी जगह मीडियाकर्मियों की स्थिति एक जैसी ही है. एक ही तरह की त्रासदी से सभी मीडिया हाउस के मीडियाकर्मी त्रस्त हैं. कुछ को छोड़कर बाकी के मीडियाकर्मी आर्थिक तंगी और फटेहाल जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त हैं. यूँ कॉर्पोरेट घरानो ने बड़े-बड़े चैनलो और मीडिया संस्थानों में निवेश तो किया है लेकिन इसका फायदा दिल्ली- मुंबई में बैठे चंद मीडियाकर्मियों को ही हुआ है. बाकी की जिंदगी फटेहाल है.

टीवी चैनल या प्रिंट मीडिया के कुछेक मीडियाकर्मियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी मीडियाकर्मियों की जिंदगी रामभरोसे चल रही है. इसमें बड़े अखबार या चैनल के शहरी रिपोर्टर,ब्यूरो,ग्रामीण रिपोर्टर, जिला संवाददाता, तहसील के रिपोर्टर, सब एडिटर, फ्रीलांसर, स्टिंगर्स, कैमरामैन आदि सब शामिल हैं. इनकी जिंदगी अनिश्चितताओं से भरी है. इन्हीं अनिश्चितताओं की वजह से ‘पेड न्यूज़’ का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. जिले के संवाददाता को महज ८-१० हजार सैलरी, तहसील रिपोर्टर को २-४ हजार महीना, कोई चैनल को स्टोरी के हिसाब से २-३ हजार वो भी स्टोरी ऑन एयर हुई तब आदि-आदि.

दिल्ली-मुंबई में बैठे मीडिया महारथी सालाना लाखो-करोड़ों के पैकेज लेते है. सरकार की मलाई अलग से खाते है. ग्लैमर, हाई प्रोफाइल लाइफ स्टाइल, चकाचौध वाली जिंदगी, सरकारी सुविधा, बड़े-बड़े अवार्ड भी इन्ही को मिलते है. नाम शोहरत पैसा सब इनके हिस्से और बाकियों के हिस्से आती है तो सिर्फ हाशिये की जिंदगी. यह असमानता का अनुपात काफी ज्यादा है. तकरीबन 10 हजार मीडियाकर्मियों में केवल 10 मीडियाकर्मी की जिंदगी बेहतर है.

वैसे देखा जाए तो इन मीडियाकर्मियों का ग्रामीण और शहरी पत्रकारिता में बहुत बड़ा योगदान है. लेकिन इस योगदान के बदले इन्हें इतना कम पारिश्रमिक मिलता है कि अपने बच्चों की पढ़ाई और इलाज कराने के भी इधर – उधर से पैसे मांगना पड़ता है या फिर ‘पेड न्यूज़’ के कारोबार में उतरना पड़ता है. क्योकि जो थोड़ी बहुत सैलरी ,मिलती है वो भी वक्त पर मिलेगी या नहीं इसका कोई भरोसा नहीं. दिल्ली-मुंबई में बैठे टीवी न्यूज़ चैनलों के मठाधीश लाखों-करोड़ों के पैकेज पर दुनिया-जहान की बातें करते हैं और बहस कराते हैं. इन्हें कभी फटेहाल मीडियाकर्मीयो की दास्ताँन भी दिखानी चाहिए.

पत्रकारिता को लोकतंत्र का आइना कहा जाता है. लेकिन इसी आईने पर धूल बैठी है.

ग़ालिब में क्या खूब कहा.
तमाम उम्र ग़ालिब मै यही काम करता रहा.
धूल चेहरे पर थी और आईना साफ़ करते रहा.

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