शेर की तरह दहाड़ने वाले नरेंद्र मोदी अब चुप्पी क्यों साधे हैं ?

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गांधी की मीडिया से दूरी देखो और अपना मीडिया ऑब्शेसन देखें मोदी

रोहित श्रीवास्तव

अब की बार ……. ‘विवादो वाली ‘मौन’मोदी सरकार’

गांधी की मीडिया से दूरी देखो और अपना मीडिया ऑब्शेसन देखें मोदी
गांधी की मीडिया से दूरी देखो और अपना मीडिया ऑब्शेसन देखें मोदी

अच्छे दिन के नारे और सुशासन के वादो के साथ केंद्र की सत्ता पर काबिज होने वाली पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार मे बरहाल सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक के बाद एक विवाद ने मोदी सरकार को ‘विवादो-वाली-सरकार’ बना ला खड़ा किया है। उल्लेखनीय है की विवादो मे घिरी मोदी सरकार का विवादो का दौर तो तभी शुरू हो गया था जब 12वी पास स्मृति ईरानी को शिक्षा मंत्री और बलात्कार के एक मामले मे आरोपी निहाल चंद को ‘मोदी कैबिनेट’ मे जगह मिली थी। उसके बाद चाहे गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे का घूस लेने का मामला हो या फिर तत्कालीन रेल मंत्री सदानंद गौड़ा के बेटे पर लगे बलात्कार और धोखाधड़ी के आरोपो से भी सरकार ‘बेकफुट’ पर आते हुए बचाव की मुद्रा मे आ गयी थी।

आम जनता को हैं बड़ी उम्मीदे…….
लोकसभा चुनावो मे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस एवं उसके सहयोगी दलो की हालत बताती है कि भारत की आम जनता यूपीए सरकार के ‘कुशासन’ से इस तरह से त्रस्त हो गई थी की उन्होने किसी पार्टी या सच कहूँ तो ‘आदमी विशेष’ नरेंद्र मोदी को पूरे तीस साल बाद स्पष्ट और पूर्ण जनाधार दिया।

“आखिरी बार 1984 मे आठवीं लोकसभा के चुनावो मे राजीव गांधी को मोदी के 282 सीटो की तुलना मे 409 सीट के साथ पूर्ण बहुमत मिला था। एक तरफ 2014 मे अगर देश मे ‘मोदी लहर’ चली वही 1984 मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद बनी ‘सहानुभूति लहर’ काँग्रेस के पक्ष मे गयी।“

आपको यहाँ समझना होगा की अचानक इतने वर्षों बाद आम जनता ने पुनः एक पार्टी को इतने बड़े विशाल देश को चलाने की बागदौर कैसे सौप दी। जैसा कि सभी को ज्ञात है कि पूर्व की मनमोहन सिंह और काँग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। अगर आप इनके घोटालों को एक साथ सूचीबद्ध करे तो अँग्रेजी वर्णमाला के सारे अक्षर उसमे समाहित हो सकते हैं। सीडबल्यूजी, 2जी, आदर्श, और फिर ‘कोल स्केम’ से अपने चेहरे पर ‘कालिख’ पोतवाने वाली यूपीए सरकार से जनता मानो ऊब सी गयी थी।

क्यों मिला ‘मोदी’ को पूर्ण बहुमत?
हमारे देश की जनता अत्यंत बुद्धिमान और चालाक है उसे मालूम है कि उसके हित मे क्या है और क्या नहीं है। बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी और बेरोजगारी जैसे मूल मुद्दों से जूझ रही जनता ने काँग्रेस को अर्श से फर्श पर ला दिया। अगर जनता ने मोदी को 5 साल दिये है तो इसका मतलब भी एकदम साफ है कि जनता ने मोदी पर अपना गहन-विश्वास जताया है और पूर्ण बहुमत प्रदान कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि ‘बहुमत’ देना एक सांकेतिक इशारा है कि पूर्व सरकारो की तरह गठबंधन की मजबूरीयों का हवाला देते हुए ‘आप’ जनता के प्रति अपनी जिम्म्दरियों से और चुनावों मे दिखाए अच्छे दिनो के सपनों के वादो से नहीं भाग सकते हैं। यह बहुमत आपको कड़े और जनता के हित मे फैसले लेने मे मदद करेना। गौरतलब है कि पूर्व की यूपीए सरकार ने ‘गठबंधन की बैसाखी’ का सहारा लेकर लगभग हर मुद्दे पर अपना बचाव किया था। डीएमके का श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर बार-बार यूपीए सरकार से समर्थन वापसी की धमकी देना हो या फिर बात-बात पर ममता दीदी की तृणमूल काँग्रेस का यूपीए सरकार को अल्टिमेटम देना। यह कहानी पूरे 10 साल चली, लगता था कि यूपीए सरकार देश चलाने मे कम, सरकार-बचाने की कवायद मे ज्यादा ज़ोर-आजमाइश करती हुई दिखाई देती थी। यूपीए-1 मे सहयोगी रही लेफ्ट ने भी ‘न्यूक्लियर डील’ पर समर्थन वापस ले कर मनमोहन सरकार को संकट मे डाल दिया था”

लोगो को उम्मीद है कि जिन लुभावने नारो और वादो की बदौलत मोदी सरकार ने सत्ता हासिल की है उनको वास्तविकता मे अमलीजामा जरूर पहनाया जाएगा। वैसे कई लोग 6 महीने की मोदी सरकार के प्रदर्शन से खासे नाखुश और निराश दिखाई पड़ते हैं। शायद वो जब अपने देश मे धार्मिक-उन्माद, दंगे, महंगाई, बेरोजगारी,बलात्कार,सीमा पर दम तोड़ता जवान दिखाई देता है तो उन्हे चुनावो के वक़्त गूँजते वो नारे सुनाई देते हैं… “बहुत हुई महंगाई की मार…..अबकी बार मोदी सरकार’ ….. ‘सबका साथ….. सबका विकास’……. ‘मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा”…… “बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार”।

मूल मुद्दों से ध्यान भटका रही सरकार
मोदी सरकार ने सत्ता मे काबिज होने के बाद एक नहीं कई मुद्दो पर ‘यू-टर्न’ लिया है जिसमे मुख्य तौर पर बात अगर ‘कालेधन’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की हो जिसको 100 दिन मे वापस लाने का वादा स्वयं वर्तमान गृहमंत्री और तत्कालीन बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह ने किया था। यहां तक कि पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अगर कालाधन देश में वापस आया तो प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये तक आ सकते हैं।

अरुण जेटली का पहले संधि की आड़ मे कालेधन खाताधारको के नामो का खुलासा न करना हो या 1962 की भारत-चीन जंग की हैंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से इनकार करना यह वही अरुण जेटली है जो यूपीए सरकार मे राज्य सभा के विपक्ष के नेता के तौर पर कहते थे “क्या आर्काइव में रखे रिकॉर्ड्स अनंतकाल के लिए जनता की नजरों से दूर रखे जाएंगे? इन दस्तावेज को अनिश्चितकाल के लिए ‘टॉप सीक्रिट’ बनाए रखना जनहित में नहीं होगा।’ सरकार में आने के बाद जेटली ने पलटी खाते हुए कहा है कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करना देशहित में नहीं होगा।

जब से बीजेपी की सरकार बनी है लगता है पूरे देश मे धार्मिक-सोहाद्र बिगड़ सा गया है। पहले ‘लव जेहाद’ और कुछ अति-उत्तेजित नेताओ की भाषाओ पर बीजेपी और मोदी सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी और अब एक बार फिर ‘धर्मांतरण’ का मुद्दा सत्ता के गलियारे मे गरमा गया है। आरएसएस के लिंक जुडने से बीजेपी पूरी तरह से बचाव की मुद्रा मे आ गई है। इससे पहले मोदी सरकार मे मंत्री साध्वी निरंजन ‘हरामजादे’ जैसे ‘अमर्यादित’ शब्दों का प्रयोग करती है वही पार्टी के सांसद साक्षी महाराज महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त बताते है।

सरकार इन सभी मुद्दो को ठीक ढंग से नियंत्रित करने मे नाकाम दिखाई देती है। कुछ लोगो का यह भी मानना है कि सरकार एक योजना के तहत इन गैरजरूरी मुद्दे को ज्यादा तवज्जो देते हुए आम आदमी से जुड़े मूल मुद्दो को भटकाने की कोशिश कर रही है।

‘नमो’ की संदेहात्मक चुप्पी का क्या है ‘राज’?
पूर्व मे केंद्र की यूपीए सरकार को हर मुद्दे पर घेरने वाले तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तेवर कुछ ढीले पड़ गए है। खैर वो अपनी ही सरकार पर धावा कैसे बोल सकते हैं। फिर भी प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी जनता के प्रति ज़िम्मेदारी और वफादारी और बढ़ जाती है।

“शायद ही ऐसा कोई मुद्दा जब प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल माध्यम टिवीटर और फेसबूक के जरिये तत्कालीन यूपीए सरकार और तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को न घेरा हो। अगर वही बात अपनी सरकार पर आती है तो प्रधानमंत्री महोदय चुप रहना बेहतर समझते हैं”

शेर की तरह दहाड़ने वाले नरेंद्र मोदी अब मनमोहन सिंह की तरह सिर्फ एक निहारने वाले कमजोर प्रधानमंत्री दिखाई पड़ रहे हैं। एक के बाद एक मंत्री, बीजेपी नेता और सांसद प्रधानमंत्री के निर्देशों को नज़रअंदाज़ करते हुए उलूल-जुलूल बयान देकर मोदी सरकार को लगातार शर्मिंदा करते है। क्या उन्हे ‘नमो’ का डर नहीं है या उन्हे आदेश-निर्देश ऊपर से मतलब आरएसएस की तरफ से मिल रहें हैं? क्या मोदी की चुप्पी इसी और इशारा करती है की इन सभी बयानवीरों को संघ का समर्थन प्राप्त है? विडम्बना है की मोदी अपने आकाशवाणी के प्रोग्राम मे अपने मन की बात तो जरूर करते हैं पर जनता के मन की बात करने से शायद कतराते हैं। फेसबूक और ट्विटर पर अपनी चुनावी रैलियों की खबर जरूर साझा करते है पर बलात्कार से पीड़ित लड़की के दर्द, महंगाइ-बेरोजगारी और दंगो की आग मे झुलसती जनता की पीड़ा को साझा करने मे असमर्थ दिखाई देते हैं। अभी

रोहित श्रीवास्तव
रोहित श्रीवास्तव

तक शायद उन्होने अपना एक ही वादा पूरा किया है वो भी जनता को कड़वी दवा पिलाने का जिसे वह और उनकी सरकार बड़ी शिद्दत से पूरा कर रही है। “बीच मे गैस के दाम कम कर, पेट्रोल-डीजेल के दाम घटा सरकार आम जनता के मुह का टेस्ट बदलने की कोशिश भी करती नज़र आती है पर सच्चाई यही है की यह कदम इतने ‘मीठे’ नहीं है की वो कड़वी दवा की ‘कड़वाहट’ के असर को कम करते हुए पूर्व की सरकारो के दिये जख्मो को भर जाएँ”

निष्कर्ष मे सिर्फ इतना कहूँगा कि यह पब्लिक है भाई सब जानती है…. भारत की पब्लिक है…… सब जानती है…… सब समझती है। उन्होने अच्छे दिनो की कल्पना और कामना को ध्यान मे रखते हुए ही मोदी को प्रधानमंत्री का ताज पहनाया था। अगर मोदी उन उम्मीदो और आशाओ पर समय रहते खरे नहीं उतरते हैं तो देखने वाली बात होगी कि जनता संयम और सब्र के बांध टूटने पर ‘मोदी सरकार’ को अपनी ही भाषा मे कैसे जवाब देती है।

(आलेख मे प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं)

@रोहित श्रीवास्तव : कवि, लेखक, व्यंगकार के साथ मे अध्यापक भी है। पूर्व मे वह वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के निजी सहायक के तौर पर कार्य कर चुके है। वह बहुराष्ट्रीय कंपनी मे पूर्व प्रबंधकारिणी सहायक के पद पर भी कार्यरत थे। वर्तमान के ज्वलंत एवं अहम मुद्दो पर लिखना पसंद करते है। राजनीति के विषयों मे अपनी ख़ासी रूचि के साथ वह व्यंगकार और टिपण्णीकार भी है।

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