गहलोत से ज्यादा आफत तो वसुंधरा के सामने है

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भले ही राजस्थान में बीजेपी की कमान श्रीमती वसुंधरा राजे के हाथ आ गई हो। भले ही विधान सभा में विपक्ष के नेता का पद गुलाबचंद कटारिया को मिल गया हो। और भले ही बाहर से सब कुछ ठीक ठाक दिखाई दे रहा हो, पर बीजेपी में भीतर के हालात अब भी कोई बहुत सहज नहीं है। राजनीति के जानकार अब भी मानते हैं कि जैसे जैसे प्रदेश में चुनाव की तारीख नजदीक आएगी, वर्चस्व की लड़ाई को लेकर संघ परिवार के पाले के पराक्रमी अपनी ताकत का अहसास कराने लगेंगे। पिछले विधानसभा चुनाव की तरह ही साफ लग रहा है कि अहम के चकराव की वजह से ही बीजेपी की लुटिया फिर डूबने की अहम प्रक्रिया शुरू होगी।

दिख भी रहा है, और सच भी यही है कि श्रीमती वसुंधरा राजे इन दिनों अदम्य आत्म विश्वास से लबरेज है। लेकिन यह भी तो सभी को दिख ही रहा है कि संघ परिवार के नेता उनको अंदर ही अंदर बहुत परेशान किए हुए है। हालांकि वसुंधरा राजे किसी के सामने झुकने वाली मिट्टी की नहीं बनी हैं। फिर समूचे राजस्थान में कहीं भी चले जाइए, पार्टी में किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले श्रीमती वसुंधरा राजे का दबदबा भी नजर आता है और खौफ भी कुछ ज्यादा ही दिखाई देता है। लेकिन फिर भी हालात अब भी कोई पूरी तरह से उनके हक में नहीं हैं। डर यही है कि जो झुकना नहीं जानते, वे टूट जाते हैं। पिछली बार के चुनाव में टूट ही गई थी न !

राजस्थान में एक रामदास अग्रवाल हैं, जो वसुंधरा राजे के भरपूर विरोध में हैं और पिछले दिनों ही बहुत कुछ खुलकर बोल चुके हैं। 76 साल के अग्रवाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी रहे हैं। सवर्णों और खासकर व्यापारिक समाज में रामदास अग्रवाल का देश भर में बहुत बड़ा मान, सम्मान और नाम भी है। बीजेपी के वोट बैंक वैश्य समाज की एक बहुत बड़ी संस्था के संस्थापक अध्यक्ष हैं, लेकिन वसुंघरा राजे के सामने पार्टी के हालात से नाराज हैं। दूसरे ललित किशोर चतुर्वेदी हैं। वे वैसे तो ब्राह्मण हैं, पर सिर्फ ब्राह्मणों के ही नहीं पूरे राजस्थान में बीजेपी के बहुत बड़े नेता हैं। 81 साल के चतुर्वेदी इस ऊम्र में एकदम स्वस्थ हैं और बहुत सक्रिय भी। अनेक बार विधायक रहे, कई बार मंत्री और प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष रहे हैं। मान सम्मान उनका भी बहुत है। पर वे भी बहुत नाराज है। तीसरे नंबर पर घनश्याम तिवाड़ी हैं। वे भी ब्राह्मण हैं। दिग्गज भी हैं और दमदार भी। पार्टी में उनके समर्थकों का संसार बहुत लंबा चौड़ा है। मगर न केवल वसुंधरा राजे बल्कि पार्टी के वर्तमान हालात से भयंकर ही नहीं खतरनाक हो जाने की हद तक नाराज हैं। ज्यादा साफ साफ सुनना हो तो तिवाड़ी इन दिनों वसुंधरा राजे का नाम सुनते ही मुंह फेर लेते हैं। चौथे हैं हरिशंकर भाभड़ा, 85 साल के हैं। उपमुख्यमंत्री रहे हैं और इस ऊम्र में भी कोई कम ताकतवर नहीं हैं।

गुलाबचंद कटारिया, को भले ही इन दिनों विपक्ष के नेता के पद पर बिठाकर पार्टी में सत्ता के संतुलन को सहेजने की कोशिश की गई हो, पर जैसे ही चुनाव आएंगे, कटारिया कतई न झुकने के मूड़ में अभी से हैं। छठे हैं अरुण चतुर्वेदी, जिनको प्रदेश में पार्टी की सबसे बड़ी कुर्सी से उठाकर सीधे घर बिठाकर उनकी जगह पर कब्जा करनेवाली वसुंधरा राजे से वे कैसे खुश रह सकते हैं। वे तो पहले से ही वसुंधरा राजे के सामने तलवार लेकर खड़े थे, फिर अब तो मामला और भी भारी हो गया है। रही बात ओम प्रकाश माथुर की, तो वसुंधरा राजे पिछले चुनाव को लड़ते वक्त तो बहुत आत्म विश्वास से भरी थी, माथुर को भी कुछ नहीं समझ रही थी। पर जब हार गईं, तो सारा ठीकरा माथुर के मत्थे मढ़ दिया। वे पिछले चुनाव में वसुंधरा राजे के घनघोर विरोध में थे, पर इस बार कंधे से कंधा मिलाकर साथ चल रहे हैं। पर कितने दिन तक, यह कोई नहीं जानता।

इतने सारे लोगों के अलावा महावीर प्रसाद जैन, सतीश पूनिया, मदन दिलावर, ओंकार सिंह लखावत जैसे बहुत सारे और भी हैं। ऐसे में जो लोग कांग्रेस में सीपी जोशी जैसे सिर्फ मेवाड़ इलाके में गिरिजा व्यास के बाद दो नंबर के नेता को सीएम अशोक गहलोत के लिए आफत बताकर कांग्रेस के सत्ता में फिर न आने की बात करते हैं, उनको वसुंधरा राजे के ये इतने सारे शुभचिंतक पता नहीं क्यों दिखाई नहीं देते !   (लेखक राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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