मीडिया पर अंबेडकर कॉलेज में नुक्कड़ नाटक

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दिल्ली विश्वविद्यालय के अंबेडकर कॉलेज का दो दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम चेतना-2015 में यूँ तो दर्जनों सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए. लेकिन मीडिया पर केंद्रित एक नुक्कड़ नाटक ने ख़ासा ध्यान आकर्षित किया.इसे Institute of Economic Growth के छात्रों ने पेश किया. अंबेडकर कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहे विनीत कुमार इस नाटक के बारे में अपने एफबी पर लिखते हैं –

” प्रतिरोध की ये विधा किसी तरह बची रहे:
नुक्कड़ नाटक ख़त्म होते ही दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेज से आये रंगकर्मी बच्चों ने हमें घेर लिया- सर,फीडबैक प्लीज..सर एनी कमेंट ?

हम सिकंस इन नुक्कड़ नाटक के लिए जज की भूमिका में थे..इन दिनों मैं सरकारी इंग्लिश सीखने की कोशिश कर रहा हूँ- as far as i concern, not only but also..टाइप की रैपिडेक्स की कोशिश और सिविल सर्विसेज से हताहत हो जाने की बीच वाली इंग्लिश..सो हमने कहा- u all are equally good..as far as i concern…खैर.

उनसे बोलते वक़्त बिल्कुल भी मन भरा नहीं था..मुझे स्कूल-कॉलेज के बच्चों स्व बहुत बातें करना बेहद पसंद है..वो अपनी नादानियों और अल्हड़पन के बीच क्या सिखा जाएं,अंदाजा नहीं लगा सकते..बड़े लोग अक्सर घाघ,काईयां और सैडिस्ट होते हैं.

मेरा तो मन था कि जब टुकड़ों-टुकड़ों में ये बच्चे मुझसे बात करने आ रहे थे तो सबको एक साथ कर लूँ और सबसे पहले उन सबका शुक्रिया अदा करूँ. अपनी परफॉरमेंस और रिजल्ट की चिंता के बीच हम सिकंस को क्या देकर गए, इन्हें भी मालूम नहीं.

क्लासरूम में रेडियो,टेलीविज़न और कल्चरल थ्योरी पर लेक्चर देते हुये भीतर से मन उदास हो जाया करता है- क्या ये बच्चे भीतर से सिर्फ इस गुना-गणित में लगे हैं कि परीक्षा के लिहाज से ये बात कर रहे हैं या नहीं..कई बार तो भीतर से काँप जाता हूँ जब मीडिया के बहाने उन मुद्दों पर बात करता हूँ जिनके ठीक उलट वो व्यवहार करते नज़र आते हैं..तब लगता है- हम जो बोल रहे हैं,वो कहाँ जा रहा है,किसके काम की है ?

लेकिन आज जब अलग-अलग कॉलेज के बच्चों को उन मुद्दों पर,उनकी बारीकियों पर नाटक के जरिये अपनी बात रखते देखा तो मन गदगद हो गया..इनमे से एक भी को मैंने नहीं पढ़ाया फिर भी ये सोचकर कि मेरी तरह जब दूसरे सिकंस भी उदास होते होंगे और उन्हीं में से कोई उनका पढ़ाया बच्चा किसान की आत्महत्या पर, महिला उत्पीड़न पर, विज्ञापन के दम पर लोकतंत्र की किलेबंदी पर, धंधे के आगे अपनी बुनियादी जमीन छोड़ देने की मीडिया आदत पर जब अपनी बात धारदार अंदाज़ में रखता होगा तो उन्हें कितना अच्छा लगता होगा..एक सिकंस कइ शरीर में काजू फांकने से खून नहीं बढ़ता बल्कि अपने बच्चों को प्रतिरोध में खड़े देखकर बढ़ता है..

..नुक्कड़ नाटक करते ये बच्चे कम से कम उतने वक़्त तक तो इसी भूमिका में थे..विज्ञापन,ओनरशिप और राजनीतिक सांठ-गाँठ के आगे जो मुद्दे मेनस्ट्रीम मीडिया तक में नहीं आते,उन्हें इतनी मज़बूती से रखते ये बच्चे उन तमाम सिकंस को सुकून तो पहुंचाते ही हैं जो उन्हें तमाम विसंगतियों के बावज़ूद रीढ़ बचाये रखने की ट्रेनिंग देते हैं..जिन्हें भी ज़िन्दगी में सबकुछ सपाट होने के बजाय खुरदरापन पसंद है वो नुक्कड़ नाटक को एक उम्मीद की नज़र से देखेंगें.@अम्बेडकर कॉलेज,डीयू “

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