सर्चलाईट ऐसे बन गया हिंदुस्तान अखबार

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पुष्य मित्र,पत्रकार

वह गौरवशाली अख़बार “बिहारी”-

newspaper-various#चंपारण की कहानी एक आंदोलन भर की कहानी नहीं है, यह बिहार की गौरवगाथा भी है। कैसे कुछ किसानों ने मिलकर एक आंदोलन खड़ा किया जिसकी गूँज पूरे देश में सुनाई दी। रोचक तथ्य यह है कि यह बिहार के पत्रकारिता के इतिहास की गौरवशाली परम्परा का भी आख्यान है, भले ही ज्यादातर लोगों ने आज इसे भुला दिया है।

आज हिंदी पत्रकारिता के सबसे महान संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्मदिन है और उनके अखबार प्रताप ने चंपारण के आंदोलन को आगे बढ़ने में जो योगदान दिया है वह अतुलनीय है। हैरत होती है कि जब यह सब कुछ हो रहा था तब वे बमुश्किल 24-25 साल के रहे होंगे। उस वक़्त उनके अख़बार प्रताप ने कानपुर से सैकड़ों किमी दूर चंपारण के लोगों को निलहे प्लांटरों के प्रति आंदोलित कर दिया।

बहरहाल आज प्रताप की कहानी नहीं आज बिहारी अख़बार की बात जिसके संपादक महेश्वर प्रसाद को अख़बार से इसलिये हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने नीलहे प्लांटरों के शोषण और दमन के खिलाफ लगातार तीखी खबरें प्रकाशित की थीं। इस बिहारी अख़बार की कहानी बहुत कम लोगों को मालूम है। इसके प्रकाशक कौन थे यह तो और अल्पज्ञात तथ्य है।

दरअसल बिहारी अख़बार के संस्थापक और संचालक और कोई नहीं बल्कि बिहार की पत्रकारिता के सबसे बड़े संरक्षक सच्चिदानंद सिन्हा थे। जिन्होंने 1893 में ब्रिटेन से लौट कर बिहार टाइम्स पत्रिका की स्थापना की थी और बाद में हिंदी में बिहारी अख़बार की शुरुआत की। पहले ये दोनों पत्र साप्ताहिक ही थे। मगर 1911 के आसपास इसे दैनिक करने का विचार सामने आया और इसके लिये महेश्वर प्रसाद को व्याख्याता की नौकरी छुड़वा कर अख़बार की कमान दी गयी।

महेश्वर प्रसाद ने इस दैनिक अख़बार की खोजी खबरों के माध्यम से गजब की धार दी। इसमें चम्पारण की खबरों को सबसे प्रमुखता मिलती थी। उस वक़्त नीलहे प्लांटर रैयत से शहरबेसी एग्रीमेंट करने में जुटे थे। किसान यह समझौता करना नहीं चाहते थे। इस वजह से शोषण और दमन की खबरें लगातार सामने आ रही थी। कमजोर लोगों को डराया धमकाया जा रहा था, मजबूत किसान झूठे मुकदमे में फंसाये जा रहे थे। उसी दौर में बिहारी अख़बार खोजी खबरों के जरिये ब्रिटिश सरकार और नीलहे प्लांटरों के बीच के गुप्त समझौतों को उजागर करने में जुटा था।

इस अख़बार से सरकार भी परेशान थी और प्लांटर तो जाहिर तौर पर थे ही। एक बार एक गेट टुगेदर में बिहार के गवर्नर ने प्लांटरों से औपचारिकता में कह दिया कि पिछले दिनों हमारा आपसी विश्वास मजबूत हुआ है। इसको कोट करते हुये प्लांटरों की पत्रिका ने बिहारी अख़बार को चेतावनी दी थी कि वह भ्रामक खबरें छापना बंद कर दे। बहरहाल अखबार और सम्पादक ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। खबरों का तीखापन तेज होता गया। प्रबंधन भी संपादक के साथ मजबूती से खड़ा था।

इस बीच बार-बार सवाल उठता था कि सरकार चंपारण के किसानों की शिकायतों पर जाँच आयोग का गठन करे। सरकार आनाकानी कर रही थी। ऐसे में महेश्वर प्रसाद ने इसे अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी समझते हुए रैयतों के बीच जाकर खुद जाँच किया और इसे अपने अख़बार में प्रमुखता से प्रकाशित किया। इस खबर ने पहले से भड़के प्रशासन को और उत्तेजित कर दिया। अख़बार के प्रबंधन में पूर्णिया के बनैली स्टेट के राजा कृत्यानंद सिंह की दो लाख की पूँजी लगी थी। सरकार ने उन पर दबाव बनाया। चूँकि वे सरकार की खिलाफत खुद नहीं कर सकते थे, लिहाज उन्हें मजबूर हो कर महेश्वर प्रसाद को संपादक के पद से हटाना पड़ा। बाद में उन्हें बनैली स्टेट्स में ही एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर एकोमोडेट कर लिया गया।

उसी के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप अखबार ने चंपारण के मसले पर लगातार लिखना शुरू किया। पीर मोहम्मद मूनिस जैसे पत्रकार इसके माध्यम बने। बिहारी अख़बार ने समर्पण किया तो आगे का बीड़ा प्रताप ने उठा लिया। हालाँकि बिहारी अख़बार ने सत्ता के आगे तो आत्म समर्पण किया यह एक दुःखद कथा है। मगर आगे चल कर सच्चिदानंद सिन्हा के एक अन्य अख़बार सर्च लाइट ने जो उदाहरण प्रस्तुत किया वह एक मिसाल है।

पुष्य मित्र, पत्रकार
पुष्य मित्र, पत्रकार

यह बीसवीं सदी के तीसरे दशक की बात है। बिहारी अख़बार की तरह सर्च लाइट ने भी ब्रिटिश गवर्नमेंट के अन्याय के खिलाफ जुझारू पत्रकारिता करना शुरू कर दिया था। इसी तरह किसी खबर की वजह से परेशान होकर बिहार की सरकार ने अख़बार को पत्र लिख कर चेतावनी दी कि अगर अख़बार इस तरह की खबरें छापना बन्द नहीं करता तो सरकार उसे डिबार कर देगी। उसे न विज्ञापन दिया जायेगा, न सरकारी विज्ञप्ति भेजी जायेगी और न ही कोई सरकारी अधिकारी उसे किसी तरह की सूचना देगा।

सरकार को लगा था कि प्रबंधन इस बार भी घुटने टेक देगा। मगर इस बार प्रबंधन ने हिम्मत दिखाया और उस चिट्ठी को ज्यों का त्यों पहले पन्ने पर प्रकाशित कर दिया। इस साहसिक फैसले से माहौल पलट गया। कोलकाता के बड़े बड़े अख़बारों ने सर्चलाइट के पक्ष में खबरें प्रकाशित कीं। सरकार चाह कर भी अख़बार का कुछ बिगाड़ नहीं पायी। बाद में सर्चलाइट को बिरला जी ने खरीद लिया आज वह हिंदुस्तान अख़बार बन चुका है।

बहरहाल मेरा मानना है कि एक बिहार में कई औद्योगिक घरानों और राज घरानों के अख़बार निकले। मगर जो काम सच्चिदानंद सिन्हा के बिहार टाइम्स, बिहारी और सर्चलाइट जैसे अख़बार ने किया वह अतुलनीय है।

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