रिलांयस जियो का विरोध करने का मतलब प्रधानमंत्री की छवि पर सवाल खड़े करना !

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रिलांयस जियो का विरोध करने का मतलब प्रधानमंत्री की छवि पर सवाल खड़े करना !

रिलांयस जियो का विरोध करने का मतलब प्रधानमंत्री की छवि पर सवाल खड़े करना !
रिलांयस जियो का विरोध करने का मतलब प्रधानमंत्री की छवि पर सवाल खड़े करना !
रिलांयस जियो के विज्ञापन में देश के प्रधानसेवक की बतौर ब्रांड मॉडल मौजूदगी की चौतरफा आलोचना हो रही है. लोगों के भीतर राष्ट्र के विकास को लेकर शक और मौजूदा सरकार को लेकर इस कदर नकारात्मकता भरी हुई है कि इसके चक्कर में वो रिलांयस इन्डस्ट्रीज और पीआर एजेंसी के उस शख्स की अलग से तारीफ करना तक भूल गए जिसने दुनिया के सामने एक नया आइडिया दिया. उसने बताया कि रिलायंस एक ऐसी कंपनी है जो सिर्फ आपके भीतर कर लो दुनिया मुठ्ठी में का आत्मविश्वास नहीं पैदा करती बल्कि कंपनी खुद बहुमत की सरकार के मुखिया को अपनी मुठ्ठी में कर सकती है. दिमागी स्तर पर वो शख्स नीरा राडिया से कम तेजतर्रार तो नहीं है.

लेकिन प्रधानसेवक के आगे उसकी तारीफ में एक शब्द भी नहीं लिखा-बोला गया. लिखा-बोला क्या, ये जानने की कोशिश तक नहीं की जा रही कि उसके दिमाग में ये आइडिया आखिर किस तरह से आया और कैसे उसने इसे आगे पिच किया. यही काम अभी पेप्सी, कोक, क्रैकजैक के लिए किया जाता तो पीयूष पांडे, प्रहलाद कक्कड़ और प्रसून जोशी जैसे विज्ञापन गुरू के घर बधाई का तांता लग जाता है.




स्वाभाविक है कि ये सब एक दिन का कारनामा नहीं है. अदने हवाई चप्पल और शक्तिवर्धक चूरन के विज्ञापन तैयार करने में तेल निकल जाते हैं. यकीन न हो तो गजनी एक बार फिर से देखें. ऐसे में जिस मोबाईल से पूरे हिन्दुस्तान की तस्वीर बदलने जा रही हो और जिसका विज्ञापन हिन्दुस्तान की तस्वीर बदल देने में दिन-रात लगे प्रधानसेवक से विज्ञापन कराने की योजना बनी होगी, कितने स्तर पर मेहनत करनी पड़ी होगी. रंगों के चयन में ही दुनियाभर की माथापच्ची करनी पड़ी होगी और प्रधानसेवक को भाजपा का भगवा-हरा छोड़कर ब्लू-सफेद अपनाने में थोड़ा ही सही, वक्त लगा होगा. ( यदि ये सब पूर्व प्रायोजित है तो इसकी व्याख्या ऐसी ही होगी लेकिन यदि रिलांयस ने महज इनकी छवि का इस्तेमाल किया है तो पीएमओ ऑफिस की तरफ से प्रधानमंत्री की इस तरह से छवि इस्तेमाल करने संबंधी जरूर स्पष्टीकरण देने की जरूरत बनती है)

2 जी के संदर्भ में वैष्णवी कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन की डायरेक्टर नीरा राडिया का नाम हमारे बीच बेहद हिकारत से लिया जाता रहा है. लेकिन ऐसा करते वक्त हम शायद भूल जाते हैं कि ये वही शख्स है जो एक ही साथ रिलायंस इन्डस्ट्रीज और टाटा कंपनी के लिए पीआर स्ट्रैटजी तैयार करती रही हैं. ये वही शख्स है जो एक तरफ सरकारी महकमे के एक से एक दिग्गज चेहरे तो दूसरी तरफ मीडिया के आकाओं को साधती रही हैं. 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े टेप जब एक के बाद एक करके जारी होने शुरू हुए, उस वक्त भी हमने कहा था कि आप चाहे लाख इस बात पर सिर कूट रहे होंगे कि ऐसा होने से पत्रकारिता ध्वस्त हो गई लेकिन आगे यही पैटर्न होगा. इन टेप को मीडिया पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए और कम से कम विज्ञापन एवं जनसंपर्क के छात्रों को तो इसे अनिवार्य पाठ के तौर पर एक बार जरूर गुजरना चाहिए.

रिलांयस जियो में प्रधानसेवक के इस विज्ञापन से 2011-12 के दौरान जो धुंधलापन था, वो अब पूरी तरह छंट गया है. आप कह सकते हैं ये सरकार, पीआर-मीडिया और कॉर्पोरेट के गंठजोड़ का सबसे लेटेस्ट संस्करण है. कल तक जो जिम्मेदारी नीरा राडिया जैसे पीआर दिग्गज के हाथों में थी, वो जिम्मेदारी अब प्रधानसेवक ने खुद अपने उपर ले ली. कॉर्पोरेट और सरकार के बीच कोई तीसरी एजेंसी नहीं.

अब इससे होगा ये कि रिलांयस जियो का विरोध करने का मतलब प्रधानसेवक की छवि और उनकी साख पर सवाल खड़ा करना है. ये ठीक उसी तरह है जैसे साल 2012 के पहले तक जी न्यूज- इंडिया टीवी जैसे चैनलों की हरकतों की आलोचना करना, मीडिया आलोचना का हिस्सा था, उसके बाद वो राष्ट्रद्रोह का हिस्सा होता चला गया. आप जी न्यूज से असहमति में लिखते हैं तो उसका जवाब देने जी न्यूज के मीडियाकर्मी चाहें न आएं, बहुमत की सरकार चला रही राजनीतिक पार्टी के समर्थक जरूर विरोध में उतर आएंगे.
ऐसे में अब कॉर्पोरेट से असहमति, कॉर्पोरेट मीडिया से असहमति का मतलब है, सरकार का विरोध और सरकार का विरोध मतलब देशद्रोह. बेहद ही दिलचस्प दौर है ये कि साल 2011-12 में जिस 2जी मसले पर यूपीए की सरकार भरभराकर खत्म हो गई और एक से एक मीडिया दिग्गजों की साख मिट्टी में मिल गई, उसकी जड़ें मौजूदा सरकार में आकर इतनी गहरी हो गई कि अब इसकी शाखाओं पर भ्रष्टाचार के जहरीले फल नहीं, राष्ट्रभक्ति के फूल खिलने लगे हैं.

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