रवीश कुमार के बहाने कुछ अपनी कहानी

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नदीम एस.अख्तर

ravish-mobileमीडिया संस्थान के दफ्तर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना यानी पत्रकारिता करना अलग बात है और किसी पत्रकारिता संस्थान के छात्रों को हैंडल करना, उनके सवालों के जवाब देना, उनका कौतूहल शांत करना, उनके सपनों की हकीकत बताना, उन्हें मीडिया की निर्दयी दुनिया से रुबरु कराना और पत्रकारिता के तथाकथित मिशन से जान-पहचान कराना एकदम अलग बात. मैं खुद को नसीब वाला मानता हूं कि भविष्य के पत्रकारों से संवाद करने का मौका मुझे मिल रहा है. नई पीढ़ी को समझने और गढ़ने का भी. लेकिन मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की तरह एक सवाल मुझे भी परेशान करता है कि नई पीढ़ी पत्रकार बनने आई है या स्टार !!!

शायद ये चाह और ललक उस समय हमलोगों में भी रही होगी जब वर्ष 2001 में मैं और मेरे बाकी साथी IIMC से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेकर नौकरी ढूंढने निकल पड़े थे. तब इतने सारे चैनल तो नहीं थे लेकिन पत्रकारिता के -स्टार- उस वक्त भी थे. -आज तक- पूरी तरह चौबीस घंटे के चैनल में तब्दील होने जा रहा था, स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) तब आया नहीं था और आज के दूसरे तमाम चैनलों का भी तब कहीं कोई अता-पता नहीं था. ले-देकर हमारे पास एक ही हिंदी का न्यूज चैनल था- जी न्यूज और तब इसके मुखिया शाजी जमां साहब हुआ करते थे और वे IIMC भी आते थे, पढ़ाने के लिए. मैं प्रिंट पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन इंटर्नशिप के लिए मैंने किसी अखबार की बजाय टीवी माध्यम को चुना और पहुंच गया जी न्यूज. वहां की कहानी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा. लेकिन जी न्यूज के जिन चेहरों को अब तक मैं स्क्रीन पर स्टार की तरह देखता था (उस समय की अपनी समझ के मुताबिक) उन्हें न्यूज रूम में दौड़ते-भागते देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था. कई मिथक टूट रहे थे और खबरों की दुनिया से मैं जुड़ता चला जा रहा था. कामकाज के दौरान ही जब जी न्यूज के उस दौर के एक स्टार एंकर ने मुझसे पूछा कि आप कहां से आए हैं तो मैंने कहा- IIMC. उन्होंने तुरंत कहा कि अच्छा, आप वहां से हो तभी तो इतने bright हो. आप तो स्टार हो !!! ये कहकर वो तो चले गए लेकिन स्टार वाली बात मेरे जेहन में अटक गई. यानी जिसे कल तक मैं स्टार समझता था, वो खुद मुझे स्टार कह रहा था. बड़ा अजीब लग रहा था तब.

खैर तभी वो दौर आया, जब मैंने पहली बार किसी मीडिया संस्थान में सत्ता परिवर्तन देखा. शाजी जमा जी न्यूज से जा रहे थे और उनकी जगह संजय पुगलिया एंड टीम (सौरभ सिन्हा, जहां तक मुझे नाम याद है) आ चुके थे. न्यूज रूम में बदलाव मैं महसूस कर रहा था. कई सीनियर चेहरों पर तनाव दिख रहा था. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा था और वो पहले की ही तरह खबरों से जूझ रहे थे. मैं इस बात के लिए भी खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि बॉस का बदलना और उसके बाद संस्थान में होने वाले बदलाव को मैंने अपने कैरियर के बिलकुल शुरुआती दिनों में देख लिया था. थोड़ा बहुत समझ भी लिया था. ऐसी ही एक घटना से प्रिंट में काम करते वक्त उस समय दो-चार हुआ जब नवभारत टाइम्स में मुझे पता चला कि अपने सम्पादक यानी रामकृपाल जी नभाटा छोड़कर जा रहे हैं और शायद -आज तक- ज्वाइन करेंगे. तब नभाटा में कोई सोच भी नहीं सकता था कि रामकृपाल जी यूं ही अचानक हम सबको छोड़कर चले जाएंगे. पर यह सच था. मुझे यह खबर कहीं से पता चली थी लेकिन तब मुझे मालूम नहीं था कि नभाटा में सम्पादकीय के वरिष्ठ लोगों को भी इसका भान नहीं था. मैंने ये खबर एक वरिष्ठ को बताई जो एक डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे. वो नाराज हो गए और छूटते ही कहा कि क्या बोल रहे हो?? नौकरी चली जाएगी. रामकृपाल जी के जाने की झूठी अफवाह फैला रहे हो !! मैं हतप्रभ था, मुझे लगा कि उन्हें पता होगा. तब ये नहीं जानता था कि सम्पादक अचानक से, ऐसे ही चले जाते हैं और नीचे वालों को अंतिम समय में पता लगता है. मैं चुप हो गया. फिर शायद उसी दिन शाम को या एक दिन बाद अचानक से रामकृपाल जी ने सम्पादकीय टीम को बताया कि वे नवभारत टाइम्स छोड़कर जा रहे हैं. ये खबर पाते ही वे वरिष्ठ मुझसे पूछने लगे कि यार, तम्हें ये बात पहले कैसे पता लग गई?? कहां से पता चली. तमाम सवाल. अब उन्हें क्या बताता कि कहां से पता चली थी, बस मालूम चल गया था. खैर. मैं रामकृपाल जी से मिलने गया. वहां उनके साथ दूसरे सम्पादक (विचार) मधुसूदन आनंद भी बैठे थे. मैं थोड़ा सकुचाया लेकिन रामकृपाल जी ने बिठा लिया. वो काफी देर तक मुझसे बात करते रहे, समझाते रहे. मुझे बताया कि मेरे यहां होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. आनंद जी हैं, सम्पादक तो आते-जाते रहते हैं. अखबार निकलते रहना चाहिए. आप मन लगाकर काम करते रहिए. उन्होने आनंद जी को भी मेरे बारे में बताया. मधुसूदन आनंद जी चुपचाप सब सुनते रहे. उसके बाद तो कई सम्पादकों की विदाई देखी. और सब अचानक ही गए. इस विदाई के बाद पूर्व सम्पादक की टीम का हश्र भी देखा.

नदीम एस अख्तर
नदीम एस अख्तर

खैर, तो मैं बात कर रहा था टीवी पत्रकार रवीश कुमार और पत्रकारिता के छात्रों की. पत्रकारिता के छात्रों का एक -मामूली- व्यवहार रवीश को चुभ गया और इसी बात को लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है. रवीश इस बात से परेशान हैं कि भविष्य के पत्रकार उन्हें इतना भाव क्यों दे रहे हैं. बात सही भी है. आखिर रवीश भी तो मामूली पत्रकार हैं, शुरुआती दिनों में डेस्क पर चिट्ठियां छांटा करते थे. टीवी पर दिखने से ही क्या कोई स्टार हो जाता है??!! और जिन्हें आज वे स्टार समझ रहे हैं, हो सकता है कल वो उनसे कई कदम आगे निकल जाएं. अपनी ईमानदारी और मेहनत के दम पर उनसे भी बड़े तथाकथित स्टार बन जाएं!! क्यों, ऐसा संभव नहीं है क्या !!!

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