एनडीटीवी के रवीश कुमार प्रेमचंद के गाँव को दिखा रहे थे और सुरेश दूबे के आँखों से झर-झर आँसू…

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लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान को मानो अनाप-शनाप की बहसों और हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापन के अलावा किसी और चीज की जरूरत नहीं महसूस नहीं होती, लेकिन ऐसे में इसमें साहित्य का एक छौंक लगाने की कोशिश करती मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही से रवीश की यह रिपोर्ट...

सरला माहेश्वरी

एनडीटीवी के रवीश कुमार लमही पहुंचे। बीते उनतीस अप्रैल को ‘प्राइम टाइम’ पर देखा। वहां उनके साथ प्रेमचंद अनुरागी सुरेश दूबे भी थे। प्रेमचंद साहित्य में उनकी पूरी दुनिया समाहित है। प्रेमचंद की चर्चा के साथ ही कुछ भी सुनाते हुए उनकी आंखों से आंसू झरने लगते थे। गांव में कोई ऐसा नहीं था, जो प्रेमचंद को न जानता हो और उनकी विरासत पर गर्व न कर रहा हो। एक नौजवान बात-बात में कह रहा था- ‘प्रेमचंद की धरती पर खड़े होकर हम झूठ नहीं बोल सकते।’

रवीश कुमार अपने कैमरे के साथ प्रेमचंद के घर, स्मारक, उनके नाम से बने सरोवर और उस जगह भी गए, जहां अभी धीमी गति से ‘प्रेमचंद स्मारक तथा शोध व अध्ययन केंद्र’ के निर्माण का काम चल रहा है। उन्होंने शिलान्यास के उस पत्थर को भी दिखाया, जिस पर कभी केंद्रीय संस्कृति मंत्री रहते हुए जयपाल रेड्डी और राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के साथ करीब आठ साल पहले प्रेमचंद की एक सौ पच्चीसवीं जयंती के समारोह के लिए भारत सरकार की ओर से गठित समिति के संयोजक के नाते मेरा नाम भी खुदा हुआ है। उस पूरे साल देश में कई कार्यक्रम किए गए। प्रेमचंद साहित्य के प्रचार-प्रसार की कई योजनाएं बनीं। लेकिन उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण योजना लमही में प्रेमचंद स्मारक शोध व अध्ययन केंद्र के निर्माण की थी। इसे एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थान के रूप में निर्मित करने की परिकल्पना की गई थी। देश के लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का एक तीर्थ-स्थान और सारी दुनिया के साहित्य-प्रेमी पर्यटकों का भ्रमण-स्थल भी। इसका स्वरूप कुछ ऐसा सोचा गया था, ताकि भारतीय साहित्य पर शोध करने वाला दुनिया का कोई भी शोधार्थी इस संस्थान में जरूर आए। बनारस के घाट, विश्वनाथ मंदिर, सारनाथ जितना ही बनारस का एक और महत्त्पूर्ण स्थल।

इस योजना पर अमल के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और भारत सरकार के शिक्षा विभाग को भी जोड़ दिया गया था। राज्य सरकार की भूमिका तो थी ही। 31 जुलाई 2005 को हमलोग बड़े उत्साह से शिलान्यास कार्यक्रम के लिए लमही पहुंचे थे। वह व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए एक कठिन समय था, कीमोथेरापी शुरू हो चुकी थी। पहला चक्र पूरा हो गया था। दूसरा चक्र पंद्रह दिन बाद शुरू होना था। विमान में जयपाल रेड्डी ने कहा भी कि इस समय काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। भीड़ वाली जगहों से बचना चाहिए। लेकिन बिना किसी विशेष मुश्किल के हमने उस कार्यक्रम में पूरे जोश के साथ भागीदारी की।

बहरहाल, शिलान्यास हो गया। लेकिन असली निर्माण का काम कैसे हो, यह तय नहीं हो पाया। संस्कृति मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, बीएचयू और राज्य सरकार- इतनी एजेंसियों में किसके नेतृत्व में यह काम होगा, यह निर्धारित नहीं किया जा सका और इतने साल बीत गए। इस बीच जयपाल रेड्डी की जगह अंबिका सोनी संस्कृति मंत्रालय में आ गर्इं। बार-बार कोशिश करके भी हम प्रेमचंद को उनकी प्राथमिकता में शामिल नहीं करा पाए। बीच में खुद प्रधानमंत्री भी संस्कृति मंत्रालय का काम संभालते थे। मैंने अंबिकाजी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को न जाने कितने पत्र लिखे या खुद जाकर दिए, लेकिन इन तमाम कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला। उधर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार नहीं रही और मायावती सरकार को प्रेमचंद से कोई खास वास्ता नहीं रहा। बीच में एकाध बार बीएचयू के उपाचार्य के दफ्तर से फोन पर बात हुई, लेकिन वे भी यह नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें क्या और कैसे करना है। समय बीतता चला गया।

हाल में उत्तर प्रदेश में फिर से समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद मुलायम सिंह को याद दिलाते हुए मैंने लिखा था कि ‘उत्तर प्रदेश में परिवर्तन के इस महत्त्वपूर्ण मुकाम पर मैं उन क्षणों को याद कर रही हूं जब प्रेमचंद की एक सौ पच्चीसवीं जयंती के मौके पर इकतीस जुलाई 2005 को आप भी हमारे साथ थे। तब हमने लमही में उनके जन्म-स्थल पर प्रेमचंद स्मृति और शोध संस्थान के निर्माण की आधारशिला रखी थी। वह भारत के सभी साहित्य-प्रेमियों और जनवादी विचारों के लोगों को दी गई एक महत्त्वपूर्ण प्रतिश्रुति थी, जिसकी प्रदेश की पिछली सरकार और केंद्र सरकार ने भी अन्यायपूर्ण ढंग से अवहेलना की। आज फिर हमें उम्मीद है कि भारत के लोगों से किए गए उस वादे की पूरी ईमानदारी और शिद्दत के साथ रक्षा की जाएगी और लमही में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के साहित्य शोध संस्थान के निर्माण के जरूरी काम को पूरा किया जाएगा।’

रवीश कुमार की रिपोर्ट में उस स्थल पर निर्माण के काम की थोड़ी-सी हलचल देख कर मैं वैसे ही भाव-विगलित हुई जैसे सुरेश दूबे हो रहे थे। यह हलचल जैसे जिंदगी का कोई नया राग हो!

(स्रोत-जनसत्ता)

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