राजदीप सरदेसाई पर नरेंद्र मोदी का रंग चढ़ा !

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अर्णब गोस्वामी से सवाल – जवाब करना चाहते हैं तो फिल्म सिटी पहुंचे

rajdeep sardesai

नरेंद्र मोदी एसआरसीसी में आए थे तो उनका ग्लास वाला डायलॉग काफी सुर्ख़ियों में रहा था. आधा ग्लास खाली या आधा ग्लास भरा. लगता है देखने के इस नजरिये से सीएनएन – आईबीएन के एडिटर – इन – चीफ राजदीप सरदेसाई खासे प्रभावित हो गए हैं तभी तो आज आईजोम्स द्वारा आयोजित मीडिया फेस्ट के सेमिनार में वह नरेंद्र मोदी ‘इस्टायल’ में आईजोम्स मीडिया स्कूल के बच्चों को यही समझाते नज़र आए. पॉजिटिव एटीट्यूड की शिक्षा दी और दिलासा देने की तर्ज पर मीडिया को लेकर हिम्मत मत छोडिये की बात भी कहते नज़र आए.

राजदीप के ही ग्रुप के हिंदी चैनल IBN-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष भले अंग्रेजी – अंग्रेजी का जाप करते हों लेकिन मीडिया फेस्ट में राजदीप ने हिंदी में अपनी बात रखी और हिंदी भी एकदम धाराप्रवाह. कोई BUT नहीं.

 

ख़ैर भाषा पर न उलझते हुए वापस सेमिनार पर आते हैं. अपना वक्तव्य देते हुए राजदीप को ट्विटर पर जो आलोचनाएं झेलनी पड़ती है उसका दर्द भी आज रह – रह कर सेमिनार के दौरान उभर कर सामने आया. ये बात और है कि ट्विटर के बिना उनसे रहा भी नहीं जा रहा था और सेमिनार के दौरान ही मौका ताड़ वे शायद ट्विट करने में लगे थे. ट्विटर के दर्द को उन्होंने शब्द देते हुए कहा कि मीडिया को ट्विटर पर लोग गालियाँ देते हैं. हमें पेड मीडिया कहा जाता है. लेकिन बाहर बैठकर कहना बहुत आसान है. लेकिन मैं कहता हूँ कि 90% मीडिया बिकाऊ नहीं है. रिपोर्टर अच्छी रिपोर्ट करना चाहते हैं. प्रेशर ऊपर से आता है. लेकिन रिपोर्टर में ना कहने की हिम्मत होनी चाहिए. दरअसल मीडिया में गिरावट इसलिए आयी है क्योंकि हमारी आत्मा में गिरावट आयी है. इसके लिए कॉरपोरेट को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. सनसनी फैलाने और बहस के नाम पर रायता फैलाने के लिए कोई कॉरपोरेट नहीं कहता. दरअसल लोग आज मीडिया से डरते हैं. अब लोगों में मीडिया के प्रति आदर नहीं रहा. यानी यहाँ भी राजदीप कॉरपोरेट को क्लीन चिट् देने में लगे रहे. लेकिन फिर उन्हें ये बताना चाहिए कि यदि कॉरपोरेट का दवाब नहीं तो फिर उनका हिंदी चैनल ही बहस और खबर के नाम पर इतना रायता क्यों फैलाता रहा. वैसे राजदीप के पूरे भाषण को सुनकर असमंजस की स्थिति पैदा होती है. कभी वे कॉरपोरेट को क्लीन चीट देते हैं फिर चैनलों को भी डिफेंड करते हैं, फिर कोड़े बरसाते हुए कहते हैं कि पत्रकारिता की साख खतम हो गयी. लोग इज्जत नहीं करते. उसके बाद आधा ग्लास भरा और आधा खाली का उद्धरण दे समझाने लगते हैं. ऐसे में राजदीप प्रभु कहना क्या चाहते हैं ये समझ में नहीं आता. वैसे आज वे पसोपेश में तब पड़ गए जब एक छात्रा ने प्रभु चावला और 2G स्पेक्ट्रम से संबंधित सवाल पूछ लिया. ख़ैर बच बचाकर वे सवाल से बच जरूर निकले, लेकिन उनके चेहरे की शिकन को साफ – साफ़ पढ़ा जा सकता था. यह उनके लिए एक जवाब भी था कि सोशल मीडिया पर मीडिया की क्यों फजीहत होती है. मीडिया की अच्छाइयों का कीर्तन करते हुए, वे ज़ी न्यूज़ ब्लैकमेलिंग प्रकरण, 2G स्पेक्ट्रम घोटाले आदि को ऐसे छिपा जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

ख़ैर उनसे भी दो कदम आगे नेशनल दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता निकले. आज जमकर उन्होंने अपनी ईमानदारी का राग अलापा और पत्रकारिता पर लंबा – चौड़ा भाषण भी. समझौतावादी न होने की सलाह दी. कह रहे थे कि यदि उन्होंने समझौता कर लिया होता तो उनके पास भी पचास – सौ करोड़ होते. उनके समझौतावादी न होने की सलाह पर मीडिया को समझने और जानने वाले एक – दो लोग आपस में एक – दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे. ख़ैर आलोक मेहता यही नहीं रुके. सेमिनार में वक्तव्य देते हुए कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर कौन बनेगा पत्रकार – पत्रकार खेलने लगे. आपमें से कौन राजदीप बनना चाहता है ? कौन बरखा बनना चाहता है ? तब भावी पत्रकार संपादक बनने वाले की चाहत रखने वाले छात्र हाथ उठा रहे थे. उन्हीं में से कुछ छात्र कुछ देर बाद चाय के ठीये पर बतिया रहे थे कि जो भी कह लड़कियां सही आयी हुई थी. पन्द्रह मिनट की उनकी बातचीत में  एक बार भी ये जिक्र नहीं किया कि राजदीप, आलोक मेहता, अनुराधा प्रसाद, त्रिपुरारी शरण या अजीत अंजुम ने क्या कहा? बताने की जरूरत नहीं कि आलोक मेहता की बातों को छात्रों ने कितनी गंभीरता से लिया और भविष्य में ये पत्रकार बनते हैं तो इनकी क्या समझ बनेगी?

बहरहाल दूरदर्शन के डीजी त्रिपुरारी शरण जब आए तब मीडिया सेमिनार में आध्यात्मिकता की लहर फ़ैल गयी. वे पूरे प्रवचन की मुद्रा में आ गए और न्यूज़ मीडिया पर बात करते हुए फिल्म और न जाने कहाँ – कहाँ घूम आए. उनकी बातें सरकारी चैनल की ही तरह ही घूमावदार थी जिसके ओर – छोर का कोई पता नहीं. उन्होंने शुरूआती पंक्तियों में ही कहा कि मीडिया का मतलब सिर्फ न्यूज़ ही नहीं है. इसका दायरा बहुत बड़ा है. न्यूज़ उसका महज एक हिस्सा है. आपके समाज में भ्रष्ट नेता और अफसरशाह आप बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन पत्रकार के भ्रष्ट होने पर अलग तरह से रिएक्ट करते हैं. ये क्यों भूल जाते हैं कि वो भी इसी समाज का हिस्सा है. समाज में अच्छाई और बुराई दोनों है……… ख़ैर उन्होंने अपना वक्तव्य खत्म किया तो दूरदर्शन के संस्कार का असर साफ़ – साफ़ महसूस किया जा सकता था. उसके अलावा राजदीप और त्रिपुरारी शरण को सुनकर प्राइवेट और सरकारी चैनल का संस्कार समझ में आया. राजदीप बोलते हुए थोड़े कॉरपोरेट हो जाते हैं तो त्रिपुरारी शरण आध्यात्मिक………

बीएजी की चेयरपर्सन अनुराधा प्रसाद ने साफगोई से स्वीकार किया कि यदि आपके पास इकोनोमिक पावर नहीं है तो आप मीडिया पावर नहीं बन सकते. प्रोमोटर के लिहाज से भी मीडिया को समझने की जरूरत है. पूरे शेषण को न्यूज़24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम ने मॉडरेट किया. यूँ ये सत्र खत्म हुआ. अंत में अलग से सवाल – जवाब का सत्र भी हुआ. पर चलते – चलते आइजोम्स मीडिया स्कूल की तरफ से की गयी एक गडबड़ी का उल्लेख. सेमिनार में जब ‘बुके’ देकर अतिथियों को सम्मानित किया जा रहा था तो सबसे पहले आइजोम्स की मालकिन अनुराधा प्रसाद को ही बुके दे दिया गया जबकि कायदे से बाहर से आए अतिथियों यानी राजदीप, आलोक मेहता, त्रिपुरारी शरण को बुके दिया जाना चाहिए था और उसके बाद अनुराधा प्रसाद और अजीत अंजुम को बुके देना था क्योंकि वे लोग तो एक तरह से होस्ट ही थे. बहरहाल स्कूल के छात्र काफी उत्साह में नज़र आए. उम्मीद करते हैं कि मीडिया इंडस्ट्री की चक्की में पीसने के बाद भी इनका ये उत्साह बना रहे.

(शुक्रवार 8 मार्च को 11 बजे एक और मीडिया सेमिनार है जिसमें मुख्य वक्ता अर्णब गोस्वामी और आशुतोष होंगे. यह ओपन शेषण होगा और इसमें दोनों से सवाल – जवाब भी किया जा सकता है)

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