बुखार में तपते हुए भी रजत शर्मा ने केजरीवाल का बुखार उतार दिया

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हर्ष रंजन

रजत शर्मा ने खोली केजरीवाल की पोल
रजत शर्मा ने खोली केजरीवाल की पोल

इंडिया टीवी पर 14 मार्च को प्रसारित 9 बजे का कार्यक्रम “आज की बात” ऐतिहासिक था। ऐतिहासिक इसलिये क्योंकि बीमार होने के बावजूद रजत शर्मा ने इसे एंकर किया। किसी मजबूरी के तहत नहीं , बल्कि सच दिखाने के जनता से किये अपने वादे को पूरा करने के लिेये। चुनावों से पहले ये सच दिखाया जाना ज़रूरी भी था, क्योंकि झाड़ू अब घिस चुकी है। मैं अपने पहले के कई पोस्ट में इस सच का ज़िक्र कर चुका हूं।

अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेता अब हताश हो चुके हैं। यही वजह है कि आलोचना सुनने की उनकी आदत नहीं रही। पहले भी नहीं थी। समूचे मीडिया और मीडियावालों को बिका हुआ बताकर केजरीवाल अपनी कब्र में आखिरी कील ठोकने का काम कर चुके हैं। “चलो एक मौका देते हैं, लड़का कुछ नया कर रहा है, शायद समाज और राजनीति में कुछ सार्थक बदलाव आ ही जाय” यही सोच कर मीडिया ने शायद अब तक केजरीवाल के दोहरे चरित्र को समझते हुए भी उसे तवज्जो नहीं दिया था। लेकिन केजरीवाल ने इसे मीडिया की कमज़ोरी समझी। कमज़ोरी समझने की वजह भी थी। जब संपादक स्तर के ही लोग ही टिकट के लालच में पीठ पीछे किसी पार्टी से मिल बैठे हों तो अरविंद केजरीवाल की सोच ऐसा होना लाजमी था। और यहीं वो गलती कर बैठे। एक दो आशुतोष या आशीष पूरे मीडिया का चेहरा तो नहीं हो सकते।

अब जब आम आदमी पार्टी ने समूचे मीडिया का सार्वजनीकरण कर बिका हुआ बता ही दिया तो इसका नुकसान भी उन्हें ही उठाना पड़ेगा। रजत शर्मा का कार्यक्रम “आज की बात” इसी नुकसान का पहला किस्त था। मैं ये नहीं कहता कि मीडिया में सब अच्छे ही हैं, लेकिन इसे सापेक्ष और तटस्थ भाव से देखे जाने की ज़रूरत होती है। कुतार्किक भाव से खोज कर गलतियां निकालेंगे तो कुछ न कुछ मिल ही जायेगा। ठीक उसी तरह से जैसे कोई ट्रैफिक पुलिस वाला चाह ले कि आपकी गाड़ी का चालान करना है तो ट्रैफिक नियमों के अनुसार कुछ न कुछ खामी निकल ही आयेगी।

कैजरीवाल के साथियों ने मीडिया पर दिये गये उनके बयान को जस्टीफाई करने के लिये जब प्रेस कांफ्रेस की, तो दो चार चैनलों का नाम ले गये। ये उनकी दूसरी गलती थी। “ज़ी टीवी” देश का पहला न्यूज़ चैनेल है। उसकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता का आंकलन आप इस बात से लगा सकते हैं कि अब भी कई गांवो और छोटे शहरो में लोग टीवी मतलब दूरदर्शन या ज़ीटीवी समझते हैं। मैं और मेरे मित्र आलोक शर्मा (अब न्यूज़ 24 में) सालों पहले लोकसभा चुनाव की कवरेज के लिये बिहार गये हुए थे। तब हम किसी और चैनेल में थे, लेकिन पूरी कंस्टीच्युएंसी के लोग हमें ज़ी टीवी वाला ही बता रहे थे। सुधीर चौधरी पर कोई मामला चल सकता है, लेकिन उनपर मामला चलने से अगर ज़ी टीवी का न्यूज़ और बुलेटिन प्रभावित हो रहा हो तो बात की जानी चाहिये। मुझे नहीं लगता ऐसा वहां होता है।

अरनब गोस्वामी की विश्वसनीयता का आलम बाहर जाकर देखिये। ठेठ हिन्दी भाषाई लोग, जो अंग्रेज़ी से परहेज़ करते थे, अब टाईम्स नाउ देखते हैं। उनपर जो उंगली उठायेगा, क्या जनता उसे माफ करेगी। फुर्सत के क्षणों में केजरीवाल को अपने आप से ये सवाल “आज नहीं तो कल” पूछना ही पड़ेगा।

जांच और रिसर्च कराने में माहिर केजरीवाल रजत शर्मा और उनके इतिहास की जांच कराने में पीछे क्यों रह गये। मैंने रजत शर्मा के साथ काम किया है, तब सुधीर चौधरी भी साथ थे। बुलेटिन और न्यूज़ स्टोरी चुनने की सारी ज़िम्मेदारी होती थी, मैंने कभी नहीं पाया कि रजत जी या सुधीर की तरफ से स्टोरी में भेदभाव करने का दबाव या इशारा मात्र भी हुआ हो। चलिये मान लेते हैं केजरीवाल की समझ इतना नहीं चली और अक्ल घास चरने गई थी।

बहरहाल, चुनावों से ठीक पहले केजरीवाल गलती पर गलती कर रहे हैं। अंग्रेज़ी में कहावत है “I couldn’t wait for success… so I went ahead without it”. ऑल द बेस्ट केजरीवाल जी।

(स्रोत-एफबी)

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