टेलीविजन के लिए बेहद जरूरी पुण्य प्रसून बाजपेयी

punaya-prasoon-jaat-ke-naamआप चाहे जो कह लें. जितनी असहमति रखें लेकिन इस शख्स का टेलीविजन की दुनिया में बने रहना बेहद जरूरी है. दलित, आदिवासी और हाशिए के समाज पर रवीश के अलावा मैंने किसी दूसरे टेलीविजन पत्रकार को इतनी गहरी, स्पष्ट समझ और बेहद संवेदनशील तरीके से बात रखते नहीं देखा. आज मोदी पर “जाति के नाम पर” स्टोरी देखकर लगा कि ऐसी ही स्टोरी देखकर बाकी के मीडिाकर्मी जो सरोकार के नाम पर कुछ घिस चुके खोखले शब्दों को रखकर बस चीखना जानते हैं, शरमा जाते होंगे. टीआरपी के बताशे बनानेवालों की कढ़ाई ठंडी पड़ जाती होगी.

पुण्य प्रसून को सुनकर ही सहज अंदाजा लग जाता है कि ये शख्स जो बोल रहा है, उसमे गहरे उतरकर चीजों को देखता भी है. आजतक जैसे टेलीविजन चैनल में जहां बुलेटिन और पैकेज 500-600 शब्दों के बीच तैरकर रह जाते हैं, वहीं इन्हें सुनकर टेलीविजन की बेहतरीन भाषा सीखी जा सकती है. हां ये जरूर है कि “कहीं न कहीं” और “देखना होगा” जैसे जुमले के प्रयोग कुछ ज्यादा हो जाते हैं. समाचार चैनल के संभवतः ये आखिरी फसल होंगे जिनका ध्यान रखकर आप ये नहीं कह सकते कि न्यूज चैनल पूरी तरह बकबास हैं. ये इसमें संभावनाओं को जिंदा रखनेवाले लोग हैं.

अपनी इनसे कई स्तरों पर असहमति होते हुए भी ये सद्इच्छा हमेशा बनी रहती है कि सालों तक हमारे बीच अपनी गहरी समझ से टेलीविजन को थोड़ा वजनी बनाए रखें. न्यूज चैनलों में साहित्य की उम्मीद एक विलुप्त प्रजाति की एनीमेशन है लेकिन पुण्य प्रसून की मौजूदगी साहित्यिकता के अंदाज को बरकरार रखने जैसा है. हम साहित्य को जिस अर्थ और आशय के लिए याद करते हैं, गुजरते हैं, उसकी कमी इनके होने से नहीं खलती. अपने घोर व्यावसायिक, विज्ञापन और टीआरपी की मारकाट करनेवाले चैनल के बीच भी थोड़ा कबीर, थोड़ा मुक्तिबोध, नागार्जुन,रेणु को साथ रखकर बोलने-बतियाने वाले टीवी पत्रकार.आप चाहे जो कह लें. जितनी असहमति रखें लेकिन इस शख्स का टेलीविजन की दुनिया में बने रहना बेहद जरूरी है. दलित, आदिवासी और हाशिए के समाज पर रवीश के अलावा मैंने किसी दूसरे टेलीविजन पत्रकार को इतनी गहरी, स्पष्ट समझ और बेहद संवेदनशील तरीके से बात रखते नहीं देखा. आज मोदी पर “जाति के नाम पर” स्टोरी देखकर लगा कि ऐसी ही स्टोरी देखकर बाकी के मीडिाकर्मी जो सरोकार के नाम पर कुछ घिस चुके खोखले शब्दों को रखकर बस चीखना जानते हैं, शरमा जाते होंगे. टीआरपी के बताशे बनानेवालों की कढ़ाई ठंडी पड़ जाती होगी.

पुण्य प्रसून को सुनकर ही सहज अंदाजा लग जाता है कि ये शख्स जो बोल रहा है, उसमे गहरे उतरकर चीजों को देखता भी है. आजतक जैसे टेलीविजन चैनल में जहां बुलेटिन और पैकेज 500-600 शब्दों के बीच तैरकर रह जाते हैं, वहीं इन्हें सुनकर टेलीविजन की बेहतरीन भाषा सीखी जा सकती है. हां ये जरूर है कि “कहीं न कहीं” और “देखना होगा” जैसे जुमले के प्रयोग कुछ ज्यादा हो जाते हैं. समाचार चैनल के संभवतः ये आखिरी फसल होंगे जिनका ध्यान रखकर आप ये नहीं कह सकते कि न्यूज चैनल पूरी तरह बकबास हैं. ये इसमें संभावनाओं को जिंदा रखनेवाले लोग हैं.

अपनी इनसे कई स्तरों पर असहमति होते हुए भी ये सद्इच्छा हमेशा बनी रहती है कि सालों तक हमारे बीच अपनी गहरी समझ से टेलीविजन को थोड़ा वजनी बनाए रखें. न्यूज चैनलों में साहित्य की उम्मीद एक विलुप्त प्रजाति की एनीमेशन है लेकिन पुण्य प्रसून की मौजूदगी साहित्यिकता के अंदाज को बरकरार रखने जैसा है. हम साहित्य को जिस अर्थ और आशय के लिए याद करते हैं, गुजरते हैं, उसकी कमी इनके होने से नहीं खलती. अपने घोर व्यावसायिक, विज्ञापन और टीआरपी की मारकाट करनेवाले चैनल के बीच भी थोड़ा कबीर, थोड़ा मुक्तिबोध, नागार्जुन,रेणु को साथ रखकर बोलने-बतियाने वाले टीवी पत्रकार.

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