पुण्य प्रसून बाजपेयी 'आपातकाल' के असर से निकले, बीईए पर बरसे

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aaj tak rape charges नव वर्ष में एक अच्छी खबर है. पुण्य प्रसून बाजपेयी आपातकाल से निकल आये हैं और तलवार खींच कर मैदान में भी आ गए हैं. आते ही बीईए की खबर ली. बीईए के स्वनियमन के पैटर्न से वे नाराज हैं और इसलिए दिल्ली सामुहिक दुष्कर्म मामले में न्यूज़ चैनलों के कवरेज को लेकर अपने लेख में संस्थान की खूब लानत – मलानत की है.

पुण्य प्रसून लंबे समय से चुप्पी साधे हुए थे. तब भी चुप थे जब उगाही मामले में ज़ी न्यूज़ पेड न्यूज़ के सबसे बड़े दलदल में धंस चुका था और जब बोले तो उगाही के आरोपी संपादक की गिरफ्तारी को आपातकाल करार दिया और अंतर्ध्यान हो गए. मानों आपातकाल में वे खुद ही भूमिगत हो गए हों. हो – हल्ले के बाद भी उनकी तरफ से एक लाइन का कमेंट तक नहीं आया. लेकिन अब जब उन्होंने पत्रकारिता से संबंधित लेख लिखा है तो बीईए की लानत – मलानत की है और ब्लैकमेलिंग के आरोपी सुधीर चौधरी की एक तरह से तारीफ़ की है.

 

पुण्य प्रसून ने अपने लेख के जरिये सामुहिक दुष्कर्म मामले में न्यूज़ चैनलों और बीईए के तौर – तरीके और कवरेज पर सवाल उठाए हैं उसमें से कुछ सही भी है. लेकिन बीईए से सवाल पूछने के पहले शायद वे अपने अंदर झाँकना भूल गए हैं. बीईए को जो ज्ञान दे रहे हैं , वह ज्ञान अपने मामले में कहाँ था? अपने लेख में पुण्य प्रसून ने न्यूज़ चैनलों और संपादकों पर सीधे – सीधे इल्जाम लगाया है कि सरकारी निर्देश के मुताबिक उन्होंने ख़बरें की और किसी ने भी सरकार से टकराने की हिम्मत नहीं की. पुण्य प्रसून की बात में दम है. लेकिन पुण्य प्रसून जी आपने भी तो चाकरी के चक्कर में अपनी कलम गिरवी रख दी थी और जब बोले तो आपातकाल.

बहरहाल पुण्य प्रसून बाजपेयी का यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए जिसमें उन्होंने न्यूज़ इंडस्ट्री और बीईए की कलई खोली है. अब तक जो मीडिया आलोचक कहते थे अब वही बात इंडस्ट्री का एक वरिष्ठ पत्रकार कह रहा है. लेकिन क्या अच्छा होता कि पुण्य प्रसून ज्ञान देने के साथ – साथ खुद भी उसपर अमल करे. नहीं तो पुन्नू बाबा आपके साथी ही आपको कहेंगे , जिनके घर शीशे होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते. (मॉडरेटर)

न्यूज चैनलों की पत्रकारिता पर क्यों भारी पड़ा लड़के का इंटरव्यू

अगर ब्राडकास्ट एडिटर एसोशियसेशन [बीईए] की चलती तो बलात्कार की त्रासदी का वह सच सामने आ ही नहीं पाता जो लडकी के दोस्त ने अपने इंटरव्यू में बता दिया। दिल्ली की लडकी के बलात्कार के बाद जिस तरह का आक्रोष दिल्ली ही नहीं समूचे देश की सडको पर दिखायी दिया उसे दिखाने वाले राष्ट्रीय न्यूज चैनलो ने ही स्वयं नियमन की ऐसी लक्ष्मण रेखा अपने टीवी स्क्रिन से लेकर पत्रकारिता को लेकर खिंची कि झटके में पत्रकारिता हाशिये पर चली गई और चैनलो के कैमरे ही संपादक की भूमिका में आ गये। यानी कैमरा जो देखे वही पत्रकारिता और कैमरे की तस्वीरो को बडा बताना या कुछ छुपाना ही बीईए की पत्रकारिता। जरा सिलसिलेवार तरीके से न्यूज चैनलो की पत्रकारिता के सच को बलात्कार के बाद देश में उपजे आक्रोष तले स्वय नियमन को परखे। लडकी का वह दोस्त जो एक न्यूज चैनल के इंटरव्यू में प्रगट हुआ और पुलिस से लेकर दिल्ली की सडको पर संवेदनहीन भागते दौडते लोगो के सच को बताकर आक्रोष के तौर तरीको को ही कटघरे में खडा कर गया। वह पहले भी सामने आ सकता था।

पुलिस जब राजपथ से लेकर जनपथ और इंडियागेट से लेकर जंतर-मंतर पर आक्रोष में नारे लगाते युवाओ पर पानी की बौछार और आंसू गैस से लेकर डंडे बरसा रही थी अगर उस वक्त यह सच सामने आ चुका होता कि दिल्ली पुलिस तो बलात्कार की भुक्तभोगी को किस थाने और किस अस्पताल में ले जाये इसे लेकर आधे घंटे तक भिडी रही तो क्या राजपथ से लेकर जंतर मंतर पर सरकार में यह नैतिक साहस रहता कि उसी पुलिस के आसरे युवाओ के आक्रोष को थामने के लिये डंडा,आंसूगैस या पानी की बौछार चलवा पाती। या फिर जलती हुई मोमबत्तियो के आसरे अपने दुख और लंपट चकाचौंध में खोती व्यवस्था पर अंगुली उठाने वाले लोगो का यह सच पहले सामने आ जाता कि सडक पर लडकी और लडका अद्दनग्न अवस्था में पडे रहे और कोई रुका नहीं। जो रुका वह खुद को असहाय समझ कर बस खडा ही रहा। अगर यह इंटरव्यू पहले आ गया होता तो न्यूज चैनलो पर दस दिनो तक लगातार चलती बहस में हर आम आदमी को यह शर्म तो महसूस होती ही कि वह भी कहीं ना कही इस व्यवस्था में गुनहगार हो गया है या बना दिया गया है। लेकिन इंटरव्यू पुलिस की चार्जशीट दाखिल होने के बाद आया। यानी जो पुलिस डर और खौफ का पर्याय अपने आप में समाज के भीतर बन चुकी है उसे ही जांच कार्रवाई करनी है। सवाल यही से खडा होता है कि आखिर जो संविधान हमारी संसदीय व्यवस्था या सत्ता को लेकर चैक एं
ड बैलेस की परिस्थिया पैदा करना चाहता है , उसके ठीक उलट सत्ता और व्यवस्था ही सहमति का राग लोकतंत्र के आधार पर बनाने में क्यो लग चुकी है और मीडिया इसमें अहम भूमिका निभाने लगा है।

यह सवाल इसलिये क्योकि मीडिया की भूमिका मौजूदा दौर में सबसे व्यापक और किसी भी मुद्दे को विस्तार देने वाली हो चुकी है। इसलिये किसी भी मुद्दे पर विरोध के स्वर हो या जनआंदोलन सरकार सबसे पहले मीडिया की नब्ज को ही दबाती है। मुश्किल सिर्फ सरकार की एडवाइजरी का नहीं है सवाल इस दौर में मीडिया के रुख का भी है जो पत्रकारिता को सत्ता के पिलर पर खडा कर परिभाषित करने लगी है। बलात्कार के खिलाफ जब युवा रायसीना हिल्स के सीने पर चढे तो पत्रकारिता को सरकार की धारा 144 में कानून उल्लघन दिखायी देने लगा। लोगो का आक्रोष जब दिल्ली की हर सडक पर उमडने लगा तो मेट्रो की आवाजाही रोक दी गई लेकिन पत्रकारिता ने सरकार के रुख पर अंगुली नहीं उठायी बल्कि मेट्रो के दर्जनो स्टेशनो के बंद को सुरक्षा से जोड दिया। जब इंडिया-गेट की तरफ जाने वाली हर सडक को बैरिकेट से खाकी वर्दी ने कस दिया तो न्यूज चैनलो की पत्रकारिता ने सरकार की चाक-चौबंद व्यवस्था के कसीदे ही गढे।

न्यूज चैनलो की स्वयं नियमन की पत्रकारिय समझ ने न्यूज चैनलो में काम करने वाले हर रिपोर्टर को यह सीख दे दी की सत्ता बरकार रहे। सरकार पर आंच ना आये। और सडक का विरोध प्रदर्शन हदो में चलता रहे यही दिखाना बतानी है और लोकतंत्र यही कहता है। इसलिये सरकार की एडवाइजरी से एक कदम आगे बीईए की गाईंडलाइन्स आ गई। सिंगापुर से ताबूत में बंद लडकी दिल्ली कैसे रात में पहुंची और सुबह सवेरे कैसे लडकी का अंतिम सस्कार कर दिया गया। यह सब न्यूज चैनलो से गायब हो गया क्योकि बीईए की स्वयंनियमन पत्रकारिता को लगा कि इससे देश की भावनाओ में उबाल आ सकता है या फिर बलात्कार की त्रासदी के साथ भावनात्मक खेल हो सकता है। किसी न्यूज चैनल की ओबी वैन और कैमरे की भीड ने उस रात दिल्ली के घुप्प अंधेरे को चीरने की कोशिश नहीं की जिस घुप्प अंघेरे में राजनीतिक उजियारा लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी और दिल्ली की सीएम से लेकर विपक्ष के दमदार नेता एकजूट होकर आंसू बहाकर ताबूत में बंद लडकी की आखरी विदाई में शरीक हुये।

अगर न्यूज चैनल पत्रकारिता कर रहे होते तो 28 दिसबंर की रात जब लडकी को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था उससे पहले सफदरजंग अस्पताल में लडकी के परिवार वाले और लडकी का साथी किस अवस्था में में रो रो कर लडकी का मातम मना रहे थे यह सब तब सामने ना आ जाता जो सिंगापुर में 48 घंटे के भीतर लडकी की मौत को लेकर दिल्ली में 31 दिसबंर को सवाल उठने लगे। आखिर क्यो कोई न्यूज चैनल उस दौर में लडकी के परिवार के किसी सदस्य या उसके साथी लडके की बात को नहीं दिखा रहा था। जबकि लडका और उसका मामा तो हर वक्त मीडिया के लिये उपलब्ध था। परिवार के सदस्य हो या लडकी का साथी। आखिर सभी को अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने ही कह रखा था कि मीडिया के सामने ना जाये। मीडिया से बातचीत ना करें। केस बिगड सकता है।

वहीं जिस तरह बलात्कार को लेकर सडक पर सरकार-पुलिस और व्यवस्था को लेकर आक्रोष उमडा उसने ना सिर्फ न्यूज चैनलो के संपादको को बल्कि संपादको ने अपने स्ंवय नियमन के लिये मिलकर बनायी ब्राडकास्ट एडिटर एसोसियशन यानी बीईए के जरीये पत्राकरिता को ताक पर रख सरकारनुकुल नियमावली बनाकर काम करना शुरु कर दिया। मसलन नंबर वन चैनल पर लडके के मामा का इंटरव्यू चला तो उसका चेहरा भी ब्लर कर दिया गया। एक चैनल पर लडकी के पिता का इंटरव्यू चला तो चैनल का एंकर पांच मिनट तक यही बताता रहा कि उसने क्यो लडकी के पिता का नाम , चेहरे , जगह यानी सबकुछ गुप्त रखा है। जबकि इन दोनो के इंटरव्यू लडकी की मौत के बाद लिये
गये थे। यानी हर स्तर पर न्यूज चैनल की पत्रकारिता सत्तानुकुल एक ऐसी लकीर खिंचती रही या सत्तानुकुल होकर ही पत्रकारिता करनी चाहिये यह बताती रही। यानी ध्यान दें तो बीईए बना इसलिये था कि सरकार चैनलो पर नकेल ना कस लें। और जिस वक्त सरकार न्यूज चैनलो पर नकेल कसने की बात कर रही थी तब न्यूज चैनलो का ध्यान खबरो पर नहीं बल्कि तमाशे पर ज्यादा था।

इसिलिये स्वयं नियमन का सवाल उठाकर न्यूज चैनलो के खुद को एकजूट किया और बीईए बनाया। लेकिन धीरे धीरे यही बीईए कैसे जडवत होता गया संयोग से बलात्कार की कवरेज के दौरान लडकी के दोस्त के उस इंटरव्यू ने बता दिया जो ले कोई भी सकता था लेकिन दिखाने और लेने की हिम्मत उसी संपादक ने दिखायी जो खुद कटघरे में है और बीईए ने उसे खुद से बेदखल कर दिया है। इसलिये अब सवाल कही बडा है कि न्यूज चैनलो को स्वयं नियमन का ऐलान बीईए के जरीये करना है या फिर पत्रकारिता का मतलब ही स्वयं नियमन होता है जो सत्ता और सरकार से डर कर संपादको का कोई संगठन बना कर पत्रकारिता नहीं करते। बल्कि किसी रिपोर्टर की रिपोर्ट भी कभी कभी संपादक में पैनापन ला देती है। संयोग से न्यूजचैनलो की पत्रकारिता संपादको के स्वंय नियमन पर टिक गयी है इसलिये किसी चैनल का कोई रिपोर्टर यह खडा होकर भी नहीं कह पाया कि जब लडकी को इलाज के लिये सिंगापुर ले जाया जा रहा था उसी वक्त उसके परिजनो और इंटरव्यू देने वाले साथी लडके ने मौत के गम को जी लिया था।

(पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार )

 

5 COMMENTS

  1. ये वही है जो सहारा प्रणाम करने गया था पूरी टीम लेकर ..जब लात पड़ी तो ज़ी न्यूज़ भागा लेकिन जिनको अपने साथ ले गया था उन लोगों की इसने कोई सुध नहीं ली ..यह क्या बोलता है क्या लिखता है इसको खुद समझ नहीं आता होगा

  2. आपने पुन्नू बाबा के पोस्ट को ध्यान से नहीं देखा शायद.. दरअसल बीईए को इसलिये गरियाया जा रहा है कि उसने सुधीर चौधरी जैसे योग्य और मेधावी पत्रकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया.. बेशक बाबा अपनी मंडली एक बड़े चोर के घूरे पर जमाने जा रहे हों, लेकिन पुराने छुटभैय्यों से सबंध बिगाड़ना नहीं चाहते.. ऐसी ही दलीलें मनु भैया को बेकसूर और मीडिया को नकारा साबित करने के काम जो आएंगा.. आखिर चोर-चोर मौसेरे भाई ही तो होते हैं..?

  3. पुण्य बाबा अब इंडिया न्यूज जा रहे हैं . जानकारी के मुताबिक 15 जनवरी को वहां ज्वाइन करने वाले हैं . दीपक चौरसिया के नेतृत्व में बाबा वहां मनु शर्मा के पापा विनोद शर्मा और भाई कार्तिकेय शर्मा की तनख्वाह पर देश हित में पत्रकारिता करने वाले हैं . इन शर्माओं के बारे में आप सब जानते ही होंगे . बाबा कितने नैतिक हैं और कितने पाखंडी ये तो आपने जी न्यूज पर उनके आखिरी शो में भी देखा होगा . पहले तो उन्होंने एक घंटे तक पत्रकारिता के हित में प्रवचन दिया , जब चारो तरफ से गालियां पड़ी तो घर में बैठ गए फिर खिसक लिए . लेकिन उससे पहले इंडिया न्यूज में इतजाम कर लिए . ताड़ से गिरे तो खजूर पर अटके . अब सुना है कि कह रहे हैं कि वहां जाकर सब कुछ बदल देंगे . यही बातें ये साहब सहारा के लिए कहते थे . सहारा तो नहीं बदला , इन्हें पैदल होकर निकलना पड़ा . वहां कितनी मोटी तनख्वाह पर गए थे , इसका तो आप अंदाजा नहीं लगा पाएंगे . अब इंडिया न्यूज में भी लाखों की सैलरी पर जा रहे हैं . धन्य हैं बाबा ….

  4. Kya aapke andar ka GOD … ShaReeF hai!

    Isska Gyan
    Isska Paachan
    Isske aage kam padh jaaye SarrVaangAasan
    Dhaadhi isski Chaurasia si
    Udhar Ashutosh ke shhwet hain kesh
    Phir bhi tum moorakh kya jaano
    Dr Roy saa laage hai vessh
    Roy ka to SaamRaajya bada
    Innka ek baal bhi naa gaya videshh
    Baatein innki Oprah jaisi
    TRP ko brahhm dete vishesh
    Koi hai bhaiyaa Aamir Khan
    Toh koi bann raha NEWS ka VyakktiVishesh
    “Aamne Saamne” ek PR-Moorakh Bala
    Toh “Point Blank” pe Dalal anekk
    Par inn sab “KalaaKaaron” ki saari kala hai Nisshedh
    Jeewan avvdhi stress lene se-Hoti kam hai
    Keh gaye hamaare SP (S.P.Singh) “vishesh”

    P.S. Yahan “Kalaakaaron” se tera taathparrye agar “patrakaar” se hai… to hai… Mujhe kya
    Jaa khoj le
    Aur Mauj le
    Agar mil jaaye kahin par koi patrakaar 🙁

  5. Kya aapke andar ka GOD … ShaReeF hai!

    Isska Gyan
    Isska Paachan
    Isske aage kam padh jaaye SarrVaangAasan
    Dhaadhi isski Chaurasia si
    Udhar Ashutosh ke shhwet hain kesh
    Phir bhi tum moorakh kya jaano
    Dr Roy saa laage hai vessh
    Roy ka to SaamRaajya bada
    Innka ek baal bhi naa gaya videshh
    Baatein innki Oprah jaisi
    TRP ko brahhm dete vishesh
    Koi hai bhaiyaa Aamir Khan
    Toh koi bann raha NEWS ka VyakktiVishesh
    “Aamne Saamne” ek Moorakh Bala
    Toh “Point Blank” pe Dalal anekk
    Par inn sab “KalaaKaaron” ki saari kala hai Nisshedh
    Jeewan avvdhi stress lene se-Hoti kam hai
    Keh gaye hamaare SP (S.P.Singh) “vishesh”

    P.S. Yahan “Kalaakaaron” se tera taathparrye agar “patrakaar” se hai… to hai… Mujhe kya
    Jaa khoj le
    Aur Mauj le
    Agar mil jaaye kahin par koi patrakaar 🙁

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