प्रधानमंत्री ने किया नेपाल का दिल विजय

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वेद प्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली यात्रा में ही नेपाल का दिल विजय कर लिया। दिग्विजय नहीं, दिल्विजय! नेपालियों का दिल जीतने के लिए मोदी ने क्या-क्या नहीं कहा और क्या-क्या नहीं किया? उन्होंने नेपाल की सबसे ज्यादा दुखती रग पर हाथ धर दिया। उन्होंने 1950 की भारत-नेपाल संधि के बारे में वही बात बोल दी, जो अब तक भारत का कोई प्रधानमंत्री नहीं बोल सका था। यह संधि प्रतिरक्षा और विदेश नीति के मामले में नेपाल के लिए बंधनकारी थी। नेपाली लोग यह मानते थे कि इस संधि में भारत ने नेपाल के हाथ-पांव बांध रखे थे। भारत को बताए बिना या भारत की मर्जी के बिना नेपाल किसी देश के साथ अपने सामरिक संबंध नहीं बना सकता था या सैन्य-सहायता नहीं ले सकता था।

इस संधि को 2008 में लगभग रद्द कर दिया गया था। लेकिन यह अभी तक अधर में लटकी हुई है। नरेंद्र मोदी ने उदारता की हद कर दी। उन्होंने कहा कि नेपाल नई संधि का जो भी मसविदा पेश करेगा, हम मान लेंगे। नेपाली जनता को खुश करने और नेपाली नेताओं का मुंह बंद करने के लिए इससे बढ़िया तदबीर क्या हो सकती थी?

मोदी ने दूसरा बड़ा काम यह किया कि नेपाल को लगभग 6 हजार करोड़ रु. की सहायता की घोषणा कर दी। इस पैसे से पनबिजली घर, सड़कें, रेल्वे, पुल, बांध, अस्पताल, कालेज- याने नेपाल जो भी चाहेगा, वह बनेगा। मोदी ने यह भी कहा कि अभी तो हम आपको कुछ सौ मेगावाट बिजली देते हैं लेकिन शीघ्र ही एक दिन ऐसा आएगा कि आप हमें हजारों मेगावाट बिजली देंगे। मोदी ने भारत-नेपाल मैत्री को हिमालय से ऊंची और गंगा से अधिक गहरी बताया। गोरखों की बहादुरी पर चार चांद लगाए। उस नेपाली युवक जीत बहादुर को साथ ले गए, जिसे उन्होंने अहमदाबाद में पाल-पोसकर बड़ा किया। उन्होंने नेपाली नेताओं को अपने फैसले खुद करने के लिए कहा लेकिन हर मुसीबत में उनके साथ खड़े होने का वादा किया। माओवादियों को यह कहकर नरेंद्र मोदी ने मुग्ध कर दिया कि आप लोग ‘शस्त्र’ का मार्ग छोड़कर ‘शास्त्र’ का मार्ग अपनाए। नेपाल की संसद को संबोधित करने वाले नरेंद्र मोदी पहले विदेशी नेता हैं। उन्होंने अपने हिंदी भाषण से नेपाली संसद को ही नहीं, पूरे नेपाल को मंत्र-मुग्ध कर दिया। उनका पशुपतिनाथ के मंदिर जाना और वहां उनका सम्मान नेपाल-नरेश की तरह होना भी अपने आप में अद्वितीय घटना है। ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी की यह नेपाल-यात्रा दोनों राष्ट्रों के इतिहास को नया मोड़ देगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह लेख उनके वेब पेज से लिया गया है)

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