पत्रकारिता का राजेश खन्ना न बने रवीश कुमार !

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रवीश कुमार, संपादक,एनडीटीवी इंडिया
रवीश कुमार, संपादक,एनडीटीवी इंडिया
PRIME TIME में RAVISH KUMAR का ड्रामा !
PRIME TIME में RAVISH KUMAR का ड्रामा !




-वेद उनियाल-

आज की पत्रकारिता का सबसे भयानक पक्ष यह है कि दिल्ली के चंद पत्रकारों की बातें पूरे देश के पत्रकारों की बात मान ली जाती है। और विद्रुप यह है कि इनमें ज्यादातर पत्रकार किसी न किसी पोलिटिकल पार्टी, नेता से अपनी साठंगांठ के साथ हैं। उनके हित बंधे हुए हैं। वे उसी तरह अपनी व्यूह रचना सजाते हैं। वैसे ही बोलते हैं देखते हैं लिखते हैं दिखते हैं।

वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार
वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार

1 – शायद यही वजह है कि अचानक लगने लगता है कि कोई रविश देश के सबसे क्रांतिकारी किस्म के पत्रकार है। या कहिए भूतो न भविष्यति। इस पत्रकारिता के लिए लोग न जाने क्या क्या संघर्ष करते हैं। एक सज्जन की याद आती है वह श्रीनगर में रहते हुए सत्तर अस्सी के दशक में उत्तराखंड के गांव गांव में एक अखबार दिया करते थे। आज वह अखबार एक मीडिया कारपोरेट हाउस बन गया। उनका बेटा आज भी शालीनता से उसी अखबार में काम कर रहा है । बिना अपने पिता के नाम का जिक्र किए हुए। पत्रकारिता में यह भी देखा कि किस तरह दिल्ली में बम विस्फोट ने एक होनहार पत्रकार की जान ले ली थी। वह दश्य भी हमारे सामने था कि मुंबई के दंगे में अगर एक सिपाही धक्का न देता तो मेरे साथी पत्रकार को गोली लग जाती। बमुश्किल एक फूट की दूरी से गोली निकली थी। कितना मेहनत करते हैं कस्बों के पत्रकार। कितनी संजीदा स्टोरी जुटाते हैं। बहुत से किस्से हैं। मगर तस्वीर क्या। दिल्ली के पत्रकार वो भी कुछ चुनिंदा , वही पत्रकारिता की आवाज। नहीं, ये गलत है। ये देश भर के पत्रकारों के ऊपर दिल्ली के कुछ चालाक किस्म के पत्रकारों का हाइजैक हैं। इनकी आवाज सबकी आवाज नहीं।

2- बहुत जरूरी है पारदर्शिता। अगर यह नहीं तो पत्रकारिता के कोई मतलब नहीं। यह अलग विवाद का विषय है कि सरकार ने एनडीटीवी पर जो एक दिन का प्रतिबंध लगाया वह जरूरी या पूर्वााग्रह से ग्रसित। लेकिन इसे प्लीज क्रांति का रूप न दीजिए। एनडीटीवी के लिए मनन चिंतन का भी विषय है कि क्यों तथ्यों से रहित ऐसी रिपर्टिंग की गई । खासकर इतने संवेदनशील मामले में। क्या हम इस तरह जाएंगे। दोनों लडाइयों को एक साथ मत देखिए। यह काम ओम थानवी जैसे लोग कर सकते हैं। हम और आप नहीं। सोचना यह है कि ऐसा क्यों हो जाता है। अगर विमान आंतकी अड्डों को उडाने के लिए उडान भी भर रहा था और रिपोर्टर को जानकारी मिल जाती है तो क्यों इसकी सूचना देनी चाहिए। किसे सूचना दे रहे हैं क्या आतंकियों को सजग कर रहे हैं कि विमान चल पडे हैं। और फिर इस भूल को क्रांति का रूप देते हैं। इसे अभिव्यक्ति की आजादी का नारा देते हैं। माफ करना सवा करोड का भारत आपकी अभिव्यक्ति के चक्कर में मुसीबत में नहीं फंस सकता। एक रवीश या ओम थानवी सवा करोड लोगों के हितों से भारी नहीं हो सकते।

3- यह सवाल भी आना चाहिए। बहुत समय नहीं गुजरा दिनमान नवभारत टाइम्स. हिंदुस्तान सारिका, जनसत्ता धर्मयुग बिलिट्स माया कांदबनी कई पत्र पत्रिकाओं में पत्रकारों ने श्रेष्ठ लेखन किया है। बहुत सारगर्भित रिपोर्टिंग की है। लेख लिखे हैं। इस पत्रकारिता में वह क्षण भी आया जब भारत पाकिस्तान युद्ध में धर्मवीर भारती ने युद्धस्थल में जाकर रिपोर्टिंग की। वह भी आज के हालातों में नहीं । पत्रकारों लेखकों साहित्यकारों ने पत्रकारिता के स्तर को बनाए रखा। उनका लेखन समाज को दिशा देता रहा। लेकिन खुद को महिमामंडित नहीं किया। नायक बनाने , पत्रकारिता में रातों रात नायक गढने की कोशिश इस तरह से नहीं हुई जैसे रविश के मामले में दिखती है। क्यों और क्या ऐसा हुआ है कि यह व्यक्ति आज के दौर का नायक दिखे। कौन सी स्टोरी, कौन सा स्केंडल, कौन सी तथ्यपरक रिपोर्ट , कौन सा सनसनीखेज मामला, कौन सा झकझोरने वाला पहलू लेकर रविश आएं है कि हम सब सचिन तेंदुलकर की तरह उन्हें आज की पत्रकारिता का नायक माने। ऐसा क्या उन्होने किया जो अब तक पत्रकारिता में नहीं हुआ हो। पर दिखना और कुछ बातें कह जाना वो भी अपने स्वार्थों के साथ। अपने हितों के साथ। क्या कुछ कह पाए हैं रविश कभी नितिश की सरकार पर। ममता बनर्जी के कलकत्ता पर। लालू यादव पर। राहुल के बयानों पर। कांग्रेस के ढलान पर। उत्तराखंड के विडियो पर। पत्नी को कुत्ते से कटवाते नेता पर । दिल्ली में मंत्री के नीले विडियो पर । बिहार में मेधावी दलित लडके की पिटाई पर। सब सामने दिखता है और हम कहे पत्रकारिता का नायक। कुछ कह पाए है रविश और ओम थानवी दिल्ली के संदीप के चलचित्र पर। तब निर्जला का व्रत। मौन धारण। पत्रकारों की ये चालाकियां भी सामने आनी चाहिए। बहुत आसान है

पत्रकारिता का राजेश खन्ना बनना । माफ करना यह झूठ हमें तसल्ली नहीं देता। वो अच्छे पत्रकार हैं जानकार है और बहुत शाानदार पत्रकार हो सकते थे। लेकिन ऐसा अभी कुछ नहीं कि ऐतिहासिक क्रांति अदभुत शब्दो को कहकर अपने से छल करे। माफ करना दिनमान रविवार की कोई पुरानी रिपोर्ट लेख पढ लीजिए हर पन्ने में आपको वो पढने को मिलेगा कि महसूस करेंगे आज कुछ छूट रहा है। राजेंद्र माथुरजी के पुराने संपादकीय को पढने पर लगता है कि आज कुछ अधूरा है। कहां है हम सबको विनम्रता से मनन करना है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




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