अरविंद केजरीवाल के समर्थन में ओम थानवी कुछ ज्यादा ही चापलूसी पर उतर आए

अरविंद केजरीवाल को ज़ी न्यूज़ के संपादक का नाम ही याद नहीं रहता

वेद विलास उनियाल

संदर्भकेजरीवाल के कंधे पर हाथ रखकर सुधीर चौधरी ने बदतमीजी की हद पार कर दी – ओम थानवी

अरविंद केजरीवाल को ज़ी न्यूज़ के संपादक का नाम ही याद नहीं रहता
अरविंद केजरीवाल को ज़ी न्यूज़ के संपादक का नाम ही याद नहीं रहता

ओम थानवीजी कुछ ज्यादा ही चापलूसी पर उतर आए हैं। अरविंद केजरीवालजी का सम्मान होना चाहिए। वे जनसंघर्ष के नेता है। लेकिन जी टीवी के सुधीर चौधरी ने कंधे पर हाथ रख दिया तो आसमान नहीं टूट पड़ा। आखिर नेता भी इंसान है सामंती नहीं।

खुद अरविंदजी कहते आए हैं कि वह आम आदमी है, आम आदमी की पार्टी के नेता हैं। फिर थानवी क्यों इतना तूल देना चाहते हैं। यह उनका बड़प्पन होता कि वह सुधीर चौधरी को फोन करते और समझाते कि अरविंदजी ही नहीं किसी भी नेता के कंधे पर हाथ नहीं रखना चाहिए।

पर जिस तरह उन्होंने अपने को अभिव्यक्त किया उससे यही लगता है कि यह भी चापलूसी का चरम है। इससे बचना चाहिए।

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अजब था कि इधर भाजपा ने दिल्ली में किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रत्याशी घोषित किया उधर उन्होंने एक विदेशी इंटरनेट पर एक लेख लिख मारा कि किरण बेदी क्यों मुख्यमंत्री के लायक नहीं। शायद ही उन्होंने कभी इतनी तत्परता और शीघ्रता से अपने पत्रकारिता जीवन में कोई लेख लिखाा होगा। जिसने उसे प्रकाशित किया वो भी भाजपा विरोधी खबर देने के लिए जाना जाता है। क्या ये सब कुछ। क्या किसी खास ऐजेंड के तहत काम हो रहा है। या तय करके बैठे हैं कि कुछ खास शब्द लिखने हैं, कुछ खास बातें खास संदर्भ में ही लिखनी है। भाजपा हो या राजद या सपा जहां गलत है लिखना चाहिए। जरूर लिखना चाहिए। नितिश की अवसरवादिता से लेकर मोदी के दस लाख के सूट तक। अमित शाह की एरोगेंसी पर। कुछ भी नहीं छूटना चाहिए।

पर किसी एक पर ही केंद्रित हो जाए तो कई प्रश्न उभरते हैं। फिर सवाल पलटकर हम पर भी आते हैं । क्या थानवीजी पूरे विधानसभा चुनाव के दरम्यान कोई एक प्रसंग बता सकते हैं जब उन्होंने आप पार्टी को सवालों में ठीक तरह से घेरा हो। हमेशा वो टीवी पर या फेसबुक पर भाजपा के खिलाफ बोलते हैं। हम एक दर्शक के नाते और फेसबुक के पाठक के नाते इन्ही दो माध्यमों के आधार पर अपनी बात कह रहे हैं। वो अपने अखबार में ( जो कभी सौभाग्यवश हमारा भी था ) क्या छापते हैं क्या पढ़वाते हैं इस पर हम नहीं जाते। क्योंकि यह अखबार दिल्ली के ही कुछ इलाकों में बिकता है। यह गाजियाबाद में नहीं आता। हम इसे पढ नहीं पाते।

आखिर अरविंदजी की पार्टी के किसी नेता कार्यकर्ता ने नहीं कहा , लेकिन ओमथानवी को दिक्कत हो गई। क्या सिखाना चाहते हैं थानवीजी। उन्हें यह अजीब लगा। और हमें यह अजीब लगता है कि थानवीजी हमेशा एक ही पक्ष में बोलते हैं। खुलेआम आप पार्टी की चापलूसी करते हैं। टीवी के दर्शक और फेसबुक के पाठक के नाते हम यह बात कह सकते हैं।

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