मायावती के संदर्भ में पत्रकार नितिन ठाकुर का दिलीप मंडल पर कटाक्ष

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फेसबुक पर नितिन ठाकुर की टिप्पणी और उसपर दिलीप मंडल का जवाब –

नितिन ठाकुर –

न्यूज़ चैनल कितना भी अच्छा हो सबका भला नहीं हो सकता। कभी मंडल तो कभी मोदीभक्त उसे गाली देंगे ही। ये लोग चाहते हैं कि सिर्फ उनके नेताओं की खबरें ही टीवी पर चलती रहें मगर चैनल की मजबूरी ये है कि उनका दर्शक हर तरह का है, तो सिर्फ एक नेता को चलाकर ना वो भरोसा हासिल कर सकते हैं और ना अपने हर वर्ग के दर्शक को बांधकर रख सकते हैं। न्यूज़ चैनल मंडल जी की नेता का ज़्यादा भाषण इसलिए भी नहीं दिखाते क्योंकि दशकों की राजनीति के बावजूद वो तीसरी क्लास की स्टूडेंट की तरह पर्चा पढ़ती हैं। मंडल जी ने टीवी में नौकरी की है, वो जानते हैं कि ‘टीवी एलिमेंट’ क्या होता है। इसमें बुरा मानने जैसा कुछ नहीं है.. वो खुद प्रोफेसर रहे हैं। अगर बीएसपी में आधिकारिक तौर पर शामिल होकर भाषण देने लगें तो शायद मायावती से बेहतर बोलेंगे। भले ही अच्छा भाषण देना अच्छा नेता होने की गारंटी ना हो, मगर अच्छा भाषणकर्ता लोगों तक अपनी बात बेहतर ढंग से पहुंचाकर अपनी पार्टी और अपना दोनों का फायदा करता है.. इसी में थोड़ा-बहुत टीवी का फायदा भी हो जाता है। सीधासादा गणित है जिसके हिसाब से मंडल जी ने भी लाखों रुपए की नौकरी की है, इसमें चालबाज़ी जैसा कुछ नहीं है।

दिलीप मंडल-

बहनजी वोट के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी चला रही है। उनकी आलोचना करते हुए आपके अंदर की जाति चेतना सतह पर आ गई है। यह चेतना होती है सबमें। शातिर लोग उसे छिपा ले जाते हैं। आपसे नहीं हो पा रहा है।

नितिन ठाकुर-
मैं मायावती का वोटर भी हो सकता हूं लेकिन यहां उनका प्रवक्ता नहीं हो सकता। अगर वो भाषण देना नहीं जानती तो ये दबी छिपी बात नहीं है। हर आलोचना का आधार जाति को बनाकर आप किसी और का फायदा नहीं कर पा रहे, अपना छोड़कर। ये हर बीजेपी विरोधी को गद्दार कहने जैसी बात से अलग नहीं है। आप प्रतिक्रिया में इतने भोथरे साबित होंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी।

दिलीप मंडल –
नितिन आप अपनी जाति घृणा छिपा नहीं पाए। बहनजी के बारे में आपने जो कहा, उसका स्रोत क्या है, यह सोचिएगा। कोई फ़र्राटे से क्यों बोलता है, और कोई क्यों नहीं, यह जानने के लिए आपको अलग से पढ़ाई करनी होगी। शुरुआत के लिए मेरी सलाह है कि कल्चरल कैपिटल की अवधारणा पर कुछ पढ़ें। मैं पियरे बॉरदियू को रेफर करूँगा।
जिनका उच्चारण सही नहीं है, उनके प्रति घृणा का स्रोत क्या है? जिसे सही उच्चारण कहते हैं, वह बचपन में मिले वातावरण से आता है। इतनी सी बात समझ में आनी चाहिए।

नितिन ठाकुर-
आप चार किताबें और रिकमेंड कीजिए मैं वो भी पढ़ूंगा, लेकिन मेरी दिलचस्पी उस किताब में अधिक है जो किसी भाजपा के आलोचक को गद्दार और मायावती आलोचक को जातिवादी ठहराने में अधिक मदद करती है। हां, मेरी उतनी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद कुछ प्रश्न बराबर खड़े रहेंगे क्योंकि दरअसल उनका उत्तर देने का ज़िम्मा ना मेरा था और ना है। उनमें एक बड़ा सवाल यही होगा कि मीडिया से दूरी बनाए रखनेवाले नेता को मीडिया गले से क्यों लगाए ? वो भी तब जब ना तो वो खुद मीडिया को तवज्जो देना पसंद करें और ना बात करने के लिए कायदे के प्रवक्ता खड़ा करें। अगर उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं तो फिर स्पेस और कवरेज के बारे में किसी का विलाप करना तर्कसंगत नहीं। बाकी रहा उच्चारण तो वो तो नरियल भी हो रहा है.. चल भी रहा है।

दिलीप मंडल-
मेरे उच्चारण पर ग्रामीण या निम्नवर्गीय, निम्नवर्णीय प्रभाव है। इसलिए मेरी हैसियत तीसरी कक्षा वाली हो गई? शर्मनाक है नितिन। प्रछन्न जनेऊ से मुक्ति कितनी मुश्किल है? आप इसके उदाहरण हैं।

नितिन ठाकुर-
उच्चारण उन नेताओँ का भी उच्च कोटि का नहीं है जिन्हें कवरेज मिल रहा हो और आपसे बेहतर कौन जानता है कि ये देश मोदी को भारी गुजराती टोन और लालू को भारी बिहारी टोन के बावजूद सुनता रहा है।

दिलीप मंडल-
धंधा है, धंधे की तरह करनी चाहिए। निष्पक्षता का ढोंग नहीं करना चाहिए।

नितिन ठाकुर-
बेशक, जैसे राजनीति भी राजनीति की ही तरह करनी चाहिए ना कि राजनीतिक विश्लेषक के चोगे में। मैं खुद इस बात का हिमायती हूं कि जो किया जाए वो खुलकर किया जाए लेकिन ना उनका धंधा खुलकर हो रहा है और ना आपकी राजनीति।

दिलीप मंडल-
हम सब कल्चरल कैपिटल और सोशल कैपिटल पर बात कर रहे हैं और इस बारे में आपने कुछ भी नहीं पढ़ा है। कैसे बात हो पाएगी? पढ़कर आइए। फिर चर्चा करेंगे।

नितिन ठाकुर-
Mandalजी, मायावती में सिर्फ दोष हों ऐसा नहीं है। मोदी में सिर्फ गुण हों ऐसा भी नहीं है। विश्लेषण में सुविधा बस यही होती है कि आप प्रशंसा और आलोचना दोनों कर सकते हैं और समर्थक होने में धर्मसंकट ये होता है कि दोष देखकर भी आप उसे जस्टिफाई करते चले जाते हैं।

दिलीप मंडल-
पढ़िए-लिखिए। पॉलिमिक्स से क्या हासिल होगा? सुकरात से उधार लेकर कह रहा हूँ – आपको संतुष्ट करके मुझे क्या मिलेगा। मुश्किल यह है कि मेरे इस मज़ाक़ पर आप हंस भी नहीं पाएँगे। क्योंकि आपने सुकरात को भी नहीं पढ़ा होगा।

नितिन ठाकुर-
आप एकतरफा तय कर रहे हैं कि सामनेवाला क्या है और उसने क्या पढा है और क्या नहीं। मैं वाकई जवाब ना मिलने की जगह आपको किताबें और दर्शन फेंकते देख हैरत में हूं। मैं भी उन्हीं सुकरात के शब्द उधार लेकर आपसे कहना चाह रहा हूं कि आपक संतुष्ट करके मुझे क्या हासिल होगा लेकिन इतना अवश्य है कि अगर मायावती कुछ कमियां ठीक कर लें तो संभव है भारत को कुछ हासिल हो जाए। अब आप इस पर हंस भी सकते हैं।

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