अखबारों ने गांव में बदला खबरों का कलेवर

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प्रमोद जोशी,वरिष्ठ पत्रकार

कुछ साल पहले पंजाब के एक हिंदी अखबार के पहले पेज पर चार तस्वीरों के साथ एक खबर छपी थी, जिसका शीर्षक था ‘मुझे घर जाने दो, नहीं तो जान दे दूंगी.’ खबर एक छोटे शहर की थी, जहां की पुलिस सार्वजनिक स्थानों पर घूमते जोड़ों की पकड़-धकड़ कर रही थी.

खबर के साथ लगी पहली तीन तस्वीरों में एक लड़की पुलिस वालों से बात करती नजर आ रही थी. मुख्य शीर्षक के ऊपर शोल्डर था ‘मोरल पुलिसिंग! प्रेमी जोड़ों पर कार्रवाई के दौरान छात्र हुई प्रताड़ित, फिर आ गयी ट्रेन के नीचे.’ खबर में चौथी तस्वीर रेल की पटरियों के बीच पड़ी लाश की थी. पुलिस की कार्रवाई, लड़की का घबराना और अखबार में खबर का ट्रीटमेंट तीनों को बदलते वक्त की रोशनी में देखना चाहिए.

मीडिया तकनीक और कवरेज में बदलते वक्त का आईना दिखाई देता है. एक अखबार ने महिलाओं की किटी पार्टी की कवरेज में विशेषज्ञता हासिल कर ली. पंजाब और दिल्ली का एक अखबार संयुक्त परिवारों पर विशेष सामग्री छापता है. ऐसे जमाने में जब परिवार छोटे हो रहे हैं, यह द्रविड़ प्राणायाम अलग किस्म का नयापन लेकर आया है. एक और अखबार सीनियर सिटिजन यानी वयोवृद्धों पर अलग से पेज छापता है.

युवाओं पर अलग पेज तो तकरीबन सभी अखबारों ने शुरू किये हैं. धर्म और धार्मिक कर्मकांड भी हिंदी अखबारों का एक अनिवार्य हिस्सा है. वैसे ही जैसे विज्ञान-तकनीक और गैजेट्स का पेज.

नये लोकतंत्र का उदय

रॉबिन जेफ्री की किताब ‘इंडियाज न्यूजपेपर रिवॉल्यूशन’ सन् 2000 में प्रकाशित हुई थी. 21वीं सदी के प्रवेश द्वार पर आकर किसी ने संजीदगी के साथ भारतीय भाषाओं के अखबारों की खैर-खबर ली. रॉबिन जेफ्री ने किताब की शुरुआत करते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि अखबारी क्रांति ने एक नये किस्म के लोकतंत्र को जन्म दिया है. उन्होंने वर्ष 1993 में मद्रास एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश की अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है. उनका एक सहयात्री एक पुलिस इंस्पेक्टर था. बातों-बातों में अखबारों का जिक्र हुआ तो पुलिसवाले ने कहा, अखबारों ने हमारा काम मुश्किल कर दिया है. पहले गांव में पुलिस जाती थी तो गांव वाले डरते थे, पर अब नहीं डरते. बीस साल पहले यह बात नहीं थी. तब सबसे नजदीकी तेलुगु अखबार तकरीबन 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा से आता था. सन् 1973 में ईनाडु (अखबार) का जन्म भी नहीं हुआ था, पर 1993 में उस इंस्पेक्टर के हल्के में तिरुपति और अनंतपुर से अखबार के संस्करण निकलते थे.

अखबारों ने गांव में बदला खबरों का कलेवर

शैवंती नैनन ने ‘हैडलाइंस फ्रॉम द हॉर्टलैंड’ में ग्रामीण क्षेत्रों के संवाद संकलन का रोचक वर्णन किया है. उन्होंने लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्र में अखबार से जुड़े कई काम एक जगह पर जुड़ गये. सेल्स, विज्ञापन, समाचार संकलन और रिसर्च सब कोई एक व्यक्ति या परिवार कर रहा है. खबर लिखी नहीं एकत्र की जा रही है. उन्होंने छत्तीसगढ़ के कांकेर-जगदलपुर हाइवे पर पड़ने वाले गांव बानपुरी की दुकान में लगे साइनबोर्ड का जिक्र किया है, जिसमें लिखा है-‘आइये अपनी खबरें यहां जमा कराइये.’

खबरों के कारोबार से लोग अलग-अलग वजह से जुड़े हैं. इनमें ऐसे लोग हैं, जो तपस्या की तरह कष्ट सहते हुए खबरों को एकत्र करके भेजते हैं. नक्सली खौफ, सामंतों की नाराजगी और पुलिस की हिकारत जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार हैं. और ऐसे भी हैं, जो टैक्सी चलाते हैं, रास्ते में कोई सरकारी मुलाजिम परेशान न करे, इसलिए प्रेस का कार्ड जेब में रखते हैं. ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की आड़ में वसूली, ब्लैकमेलिंग और दूसरे अपराधों को चलाते हैं.

बहरहाल, रॉबिन जेफ्री की ट्रेन यात्रा के 21 साल बाद आज कहानी काफी बदली हुई है. मोरल पुलिसिंग, खाप पंचायतों, जातीय भेदभावों के किस्से बदस्तूर हैं, पर प्रतिरोधी ताकतें भी खड़ी हुई हैं, जो इस नयी पत्रकारिता की देन हैं. लोगों ने मीडिया की ताकत को पहचाना और अपनी ताकत को भी. मीडिया और राजनीति के लिहाज से पिछले चार साल गर्द-गुबार से भरे गुजरे हैं. इस दौरान तमाम नये चैनल खुले और बंद हुए. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए. खासतौर से अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान यह बात भी कही गयी कि भ्रष्ट-व्यवस्था में मीडिया की भूमिका भी है. लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा. पर मीडिया व्यवस्था का हिस्सा है और कारोबार भी.

खबर और विज्ञापन के बीच का फर्क

नवंबर, 2012 में गौरी भोंसले नामक लड़की से जुड़ी एक खबर ने पाठकों को कुछ समय के लिए परेशानी में डाला था. दुर्भाग्य से मीडिया ने इस खबर को लेकर विमर्श नहीं बढ़ाया, पर इसकी बुनियाद में कुछ जरूरी तत्व छिपे थे. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मूलत: मनोरंजन का मीडिया है, खबर का नहीं. वहां खबर और विज्ञापन का भेद नहीं है. गौरी भोंसले वाली खबर के लपेटे में कुछ बड़े अखबार भी आ गये थे. अक्तूबर, 2012 के अंतिम सप्ताह में एक विज्ञापन छपा. इसमें गौरी भोंसले नामक लड़की के लंदन से लापता होने की जानकारी दी गयी थी. विज्ञापन देखने से ही पता लग जाता था कि यह किसी चीज की पब्लिसिटी के लिए है. इस सूचना की क्लिप्स लगभग खबर के अंदाज में एक चैनल में आ रही थी, पर वह खबर नहीं विज्ञापन था. विज्ञापन को खबर के फॉर्मेट में देना मार्केटिंग रणनीति थी.

अचानक 31 अक्तूबर को दिल्ली के कुछ अखबारों ने खबर छापी कि वह लड़की उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक गांव से बरामद की गयी है. अगले रोज यानी एक नवंबर को तीनों अखबारों ने बताया कि लड़की मिली तो है, पर वह नहीं है. उसने अपना नाम यही बताया था. इस खबर से कई सवाल पैदा हुए. क्या यह पब्लिसिटी के लिए हुआ? या उस लड़की ने बचने के लिए गांव वालों को अपना नाम गौरी भोंसले बता दिया? या कोई और बात थी. इसके बाद एक अखबार ने इनवेस्टिगेशन किया और पता लगा कि यह तो सीरियल की पब्लिसिटी के लिए था. टीवी के खबरचियों को अपनी साख को लेकर फिक्र नहीं, लेकिन चार सौ साल में बनी साख को खत्म करने पर उतारू प्रिंट मीडिया भी टीवी के रास्ते पर जाता नजर आता है, तब परेशानी होती है.

अखबार से आइएएस

मई, 2010 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम आने के बाद एनडीटीवी के अंगरेजी चैनल ने पंजाब की एक सफल प्रतियोगी संदीप कौर से बात प्रसारित की. संदीप कौर के पिता चौथी श्रेणी के कर्मचारी थे. यह सफलता बेटी की लगन और पिता के समर्थन की प्रेरणादायक कहानी थी. जिस इलाके में स्त्री-पुरुष अनुपात बहुत खराब है और जहां से बालिका भ्रूण हत्या की खबरें बहुत ज्यादा आती हैं, वहां संदीप कौर ने समाज के सामने नया आदर्श पेश किया. संदीप कौर ने यह परीक्षा बगैर किसी कोचिंग के पास की. उसने कहा, मेरी तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व था दैनिक अखबार ‘द हिंदू’ को नियमित रूप से पढ़ना. संदीप के पिता या चचेरा भाई घर से करीब 20 किमी दूर खरड़ कस्बे से अखबार खरीद कर लाते थे. रोज अखबार नहीं मिलता था, तो अखबार का एजेंट उसके लिए दो-तीन दिन का अखबार अपने पास रखता था.

संपादक के नाम पत्र

दिल्ली के व्यापारी सुभाष अग्रवाल को हाल में दिल्ली सरकार ने जानकारी पाने के अधिकार के सिलसिले में सलाह देने के लिए विशेष नियुक्ति दी है. आरटीआइ से जुड़े सबसे सक्रिय कार्यकर्ताओं में से वे एक हैं. वे अब तक 6000 आरटीआइ प्रार्थना पत्र दाखिल कर चुके हैं. सन् 2006 में उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्डस में शामिल किया गया. यह उपलब्धि दुनिया में संपादक के नाम सबसे ज्यादा पत्र लिखने के कारण हासिल हुई थी. जनवरी, 2006 तक उनके 3699 पत्र विभिन्न अखबारों में छप चुके थे. सुभाष अग्रवाल का पहला पत्र सन् 1967 में दिल्ली के एक हिंदी दैनिक में छपा था. संयोग से उनकी पत्नी मधु अग्रवाल का नाम भी गिनीज बुक में है. सन् 2004 में उनके लिखे 447 पत्र विभिन्न अखबारों में छपे थे.

इसी तरह कुछ समय पहले आरटीआइ कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल को ‘टू सर्किल्स डॉट नेट’ ने ‘पर्सन ऑफ द इयर’ का खिताब दिया. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र रहे अफरोज दिल्ली में सक्रिय पत्रकार हैं और आरटीआइ से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. लोकतंत्र के ऐसे तमाम सेनानी हमारे अखबारों की देन हैं.

अखबार पाठक का विश्वकोश है. हालांकि, पाठक जमीन से आसमान तक की बातों को जानना चाहता है, अखबार उसे फैशन परेड की तस्वीरें, पार्टियां, मस्ती वगैरह भी पेश कर रहे हैं. एक जमाना था जब पाठकों के लिए अखबार में छपा पत्थर की लकीर होता था. पाठक का गहरा भरोसा अपने अखबार पर आज भी है. उसका इतिहास ज्ञान, सांस्कृतिक समझ और जीवन दर्शन गढ़ने में अखबारों की भूमिका है. कई किस्म के अंतर्विरोधों ने अखबारों को भी घेरा है, पर यह भूमिका कायम रहेगी. (साभार-प्रभात खबर)

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