कालेधन पर प्रहार से परेशान क्यों एनडीटीवी ?

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अभय सिंह ,राजनैतिक विश्लेषक
अभय सिंह,
राजनैतिक विश्लेषक

देश के चौथे स्तम्भ मीडिया पर बड़ी जिम्मेदारी है कि भ्रष्टाचार, कालेधन के खिलाफ मुहिम में बढ़ चढ़कर भाग ले। परंतु जब सरकार ने ये मुहिम शुरू कर दी तो कुछ मीडिया चैनल,पत्रकार कालेधन के समर्थन में बड़ी चालाकी से सरकार की कोशिशों को नाकाम करते दिखे ।

नोटबन्दी के बाद एनडीटीवी के एंकरों को देखें तो ऐसा लगेगा की देश में आपातकाल लगा है ,लोग भूखे मर रहे है,चारों और मारकाट मची है अनगिनत लाशें सरकार ने बिछा दी है ।क्या ये सत्य है या किसी सरकार या शासक के प्रति घोर घृणा का परिचायक है ।

Ndtv के मालिक प्रणव राय पर 2500 करोड़ के मनी लांड्रिंग,फर्जी कम्पनियो,धोखाधड़ी कर चोरी के अनेक मामले दर्ज़ है।नोट बंदी से उनके चैनल की नकारात्मक प्रतिक्रिया उनकी बौखलाहट को प्रदर्शित करता है।

नोटबंदी से बागों में बहार तो नहीं आयी लेकिन उनके खिले चेहरे एकाएक मुरझा गए ।उन्हें कुछ सूझा नहीं तो कालेधन के फायदे बताने लगे यहाँ तक की पीएम के आर्थिक सलाहकारो को जेल में डालने की सलाह देने लगे ।
Ndtv आज इसी मुहिम में जुटा है की किस तरह सरकार को नीचा दिखाया जाय कालेधन के खिलाफ लड़ाई को कैसे कमजोर किया जाय ।



इनके पक्षपातपूर्ण टीवी डिबेट में जेएनयू के वामपंथी शिक्षको,सरकार विरोधी पत्रकारों,बुद्धिजीवियो का जामवाड़ा लगा रहता है जो हमेशा आपातकाल,अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देशहित भूल जाते है।कुछ दिनों से कादम्बिनी शर्मा के डिबेट में बेशर्मी की पराकाष्ठा दिखी उनके असन्तुलित पैनल में सरकार को नीचा दिखाने की भरपूर कोशिश हुई।

हर बात में चोर चोर की रट लगाने वाले इसके पत्रकार रवीश कुमार कालेधन के समर्थन में जी जान से लगे हैं जिससे जगजाहिर होता है की चोर कौन है ।कुछ बड़े क्रांतिकारी पत्रकार पुण्य प्रसून,राजदीप सरदेसाई प्राइम टाइम के जरिये सरकार की कोशिशो को पलीता लगाते दिखे।

कई दिनों से न्यूज़24 की कालेधन पर रिपोर्टिंग बड़ी नकारात्मक है संदीप चौधरी की कालेधन पर डिबेट तो अत्यंत संदेहास्पद लगी।क्या काले धन की चोट इस चैनल को बहुत तगड़ी लगी है या कुछ और बात है।
अगर सरकार कोई अत्यंत साहसिक एवं देशहित के कदम उठाती है तो मिडिया के समर्थन के बिना ये मुहिम कभी सफल नहीं हो सकती ।निजी स्वार्थों,कटुता को त्यागकर हम अभी राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान करें यही समय की मांग है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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