मीडिया का भी सोशल आॅडिट जरूरी

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अमित चमड़िया

media natak 1भारत की ज्यादातर आबादी आज भी मीडिया द्वारा परोसी गई सामाग्री को स्वाभाविक मानती है। शायद उसमें खबरों के विश्लेषण की क्षमता विकसित नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थानों पर बातचीत के क्रम में लोग अपनी बात को जायज ठहराने के लिए अक्सर कहते हैं, यह बात फलां अखबार में छपी है या फलां चैनल में दिखाई गई है। इससे जाहिर है कि लोगों के बीच आज भी खबरों की विश्वसनीयता कायम है। दरअसल, खबरों का विश्लेषण करने की स्थिति तब बनती है, जब आप खबरों के संदर्भ में लिए कई प्रकार मीडिया को देखते और पढ़ते हैं। मीडिया के संचालकों को यह यकीनन पता है कि उनकी खबरों को लोग बहुत ही स्वाभाविक तौर पर ग्रहण करते हैं। इसीलिए मीडिया खबरों को परोसते वक्त इस बात का ध्यान रखता है कि खबरों की स्वाभाविकता बनी रहे।

अखबार में छपने वाली या चैनलों में दिखाई जाने वाली सामग्री महज उसी जानकारी को नहीं देती है। लेकिन कई बार खबरों के बहाने समाज में कई चीजें छोड़ी जाती हैं। कई बार यह भी होता है कि खबर की परिधि में रहने वाली चीजें ज्यादा प्रमुखता से सामने आती हैं। इस स्थिति में मीडिया का उद्देश्य भी यही होता है। इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि मीडिया की भूमिका समाज में विचार और अवधारणा बनाने में महत्त्वपूर्ण है। इसको आसानी से देखा और समझा जा सकता है। मीडिया अघोषिततरीके से एक समूह के बारे में खास तरह की धारणा बनाता है। यह बात केवल भारत में लागू नहीं होती। यूरोपीय देशों के मीडिया ने अश्वेतों के बारे में एक नकारात्मक छवि बनाई है। कई अध्ययनों में इस बात की पुष्टि हुई है।

मुसलिम समुदाय के बारे में कई पूर्वग्रह पोसे गए हैं। एक धारणा के अनुसार यह माना जाता है कि मुसलिम पुरुष एक से ज्यादा शादी करते हैं। वैसे आंकड़ों में इसके कोई प्रमाण नहीं मिलते। दूसरी धारणा यह है कि इस्लाम धर्म जनसंख्या बढ़ाने में मदद करता है। बल्कि यों कहें कि मुसलिम आबादी बढ़ाने में इस्लाम धर्म जिम्मेवार है। ज्यादातर लोग यही समझते हैं। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ने वाले ज्यादातर लोग यही मानते हैं। महाविद्यालय में अपनी पढ़ाई के आखिरी दौर तक मैं भी इसी पूर्वग्रह का शिकार था।

दरअसल, धारणा का बनना एक प्रक्रिया का हिस्सा है। इसमें वक्त लगता है। धारणा बनाने में मीडिया की भूमिका बहुत ज्यादा है, अलबत्ता मीडिया के रूप अलग-अलग हो सकते हैं। इसके लिए एक खबर का विश्लेषण जरूरी है।

जनवरी के महीने में अंगरेजी के एक बड़े अखबार में पहले पेज पर मुसलिम समुदाय की जनसंख्या बढ़ने की खबर छपी। इस खबर का छपना अनायास नहीं था। सरकार ने भी ये आंकड़े आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किए थे। शायद इस खबर के छपने के पीछे सरकार और मीडिया का उद्देश्य एक रहा होगा।

इस खबर का एक हिस्सा पहले पेज पर था और शेष हिस्सा अंदर के पेज पर। पहले पेज पर खबर के साथ एक छोटे बच्चे की तस्वीर भी प्रकाशित की गई थी, जिसमें उसके पहनावे से साफ था कि वह लड़का इस्लाम धर्म को मानने वाला है। अंदर के पेज पर शेष खबरों के साथ भी एक तस्वीर प्रकाशित की गई थी जिसमें एक महिला को बुरके में दिखाया गया है। महिला का बुरके में होना भी इस्लाम धर्म को चिह्नित करता है। इस तरह की तस्वीरों का छपना कोई संयोग नहीं हो सकता, क्योंकि मीडिया में दिखाई गई या प्रकाशित सामग्री एक प्रक्रिया से गुजरती है। इस तरह की तस्वीरों का छपना कई सवाल पैदा करता है। क्या इस तरह की तस्वीरों के बगैर खबरों को प्रकाशित नहीं किया जा सकता? क्या ऐसी तस्वीर के छपने से खबर को ज्यादा प्रमाणिकता मिलती है, खासकर जब खबर यों भी आंकड़ों में हो?

दरअसल, खबरों में इस तरह की तस्वीरों का छपना आम धारणा को मजबूती प्रदान करता है कि इस्लाम धर्म जनसंख्या बढ़ाने में जिम्मेवार है। अमेरिका के चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर भी 2011 के जनवरी महीने में इसी तरह की खबर दिखाई गई थी, जिसके शीर्षक का हिंदी अनुवाद था ‘विश्व में मुसलिम आबादी दुगुनी: रिपोर्ट’। निश्चित तौर पर इस जानकारी में खबर के गुण मौजूद हैं, खासकर जब जानकारी आंकड़ों में हो। लेकिन इस खबर के साथ जो तस्वीर प्रकाशित हुई वह चिंता का विषय है। इस तस्वीर में बड़ी संख्या में मुसलिम समुदाय के लोगों को नमाज अदा करते हुए दिखाया गया है।

क्या मुसलमानों की जनसंख्या-वृद्धि के बारे में बताने के लिए इस तस्वीर को दिखाना जरूरी था? क्या किसी समुदाय की आबादी बढ़ने के बारे में बताने वाली खबर के साथ क्या और कोई तस्वीर नहीं हो सकती? क्या केवल एक भीड़ की तस्वीर नहीं दिखाई जा सकती थी?

भारत की कुल आबादी बढ़ने की खबर में कोई तस्वीर क्यों नहीं? जबकि भारत में पचासी प्रतिशत हिंदू धर्म को मानने वाले हैं। जाहिर है आबादी बढ़ाने में इनका बड़ा योगदान होगा। अंगरेजी के इसी अखबार की वेबसाइट पर भारत की आबादी बढ़ने से जुड़ी खबर के साथ उस तस्वीर को दिखाया गया है, जो केवल एक भीड़ के होने की पुष्टि करती है। इससे भीड़ के किसी धर्म-विशेष के होने का पता नहीं चलता है।

जनसंख्या विज्ञान के जानकारों के अनुसार, जनसंख्या बढ़ाने में धर्म की कोई भूमिका नहीं है; अगर ऐसा होता तो विश्व में हर जगह मुसलिम आबादी की वृद्धि दर में तेजी से बढ़ोतरी होती और वृद्धि दर में समानता नजर आती। लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि भारत में ही मुसलिम आबादी की वृद्धि दर हर राज्य में अलग-अलग है। इसी अंगरेजी अखबार के अनुसार, मणिपुर में मुसलिम आबादी की वृद्धि दर में गिरावट आई है। कई देश ऐसे हैं, जहां मुसलिम जनसंख्या की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज हुई है। मसलन, कई अरब देशों में। जनसंख्या का बढ़ना और जनसंख्या की वृद्धि दर में बढ़ोतरी, दो अलग-अलग चीजे हैं। लेकिन चिंता का विषय वृद्धि दर में बढ़ोतरी है।

जनसंख्या विज्ञान के जानकारों के अनुसार गरीबी और अशिक्षा जनसंख्या बढ़ाने में प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। और ये आयाम जिस किसी भी धर्म को मानने वाले समाज में होंगे उसकी जनसंख्या वृद्धि दर में बढ़ोतरी होगी। जनसंख्या विज्ञान से जुड़ी किताबें भी यही बताती हैं।
निश्चित तौर पर भारत में मुसलिम समुदाय की बड़ी आबादी गरीबी और अशिक्षा से ग्रसित है। सच्चर समिति की रिपोर्ट भी यही कहती है। इसीलिए इनकी जनसंख्या दर में वृद्धि दिखाई देती है। वैसे इसी अखबार के आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक (2001-2010) की तुलना में मुसलिम समुदाय की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है।

बिहार जैसे राज्य में, जहां गरीबी और अशिक्षा दोनों बड़े पैमाने पर हैं, वहां की कुल जनसंख्या-वृद्धि में वे तमाम लोग शामिल हैं जो गरीब और अशिक्षित हैं, चाहे वे हिंदू हों या मुसलिम। लेकिन इस तरह के विषय से जुड़ी खबरों में यह सच्चाई नहीं बताई जाती है। जाहिर तौर पर इसके पीछे प्रयोजन एक समुदाय के प्रति इस धारणा को ज्यादा से ज्यादा स्वीकृति दिलवाना है कि उनका धर्म जनसंख्या बढ़ने में बड़ी भूमिका निभाता है।
दरअसल, मीडिया का उद्देश्य इस तरह के विषयों में केवल आंकड़े पेश करना नहीं होता, बल्कि इस खबर की परिधि में रहने वाली बात को बहुत सावधानी या चतुराई के साथ लोगों के पास पहुंचना होता है, ताकि लोग इसे स्वाभाविक तौर पर स्वीकार कर सकें। इस खबर का भी उद््देश्य यही था कि जो बात तस्वीर कह रही है वही ज्यादा प्रमुखता से उभरे। दरअसल, इस तरह की खबरों के साथ ऐसी तस्वीर दिखाई जानी चाहिए, जो गरीबी और अशिक्षा को दर्शाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

इस तरह की खबरों का आना मीडिया में मुसलिम समुदाय के प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा मामला है। लगभग सभी बड़े मीडिया के मालिक गैर-मुसलिम हैं। एक शोध के अनुसार, भारत के हिंदी क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर और मध्यप्रदेश को छोड़ कर) के सात राज्यों की राजधानियों, जिनमें दिल्ली शामिल है, से निकलने वाले प्रमुख इकहत्तर हिंदी और अंगरेजी अखबारों के तिरानबे वरिष्ठ पत्रकारों में (मुख्य संपादक या संपादक या स्थानीय संपादक) मुसलिम समुदाय का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जब तक मीडिया में मुसलिम समुदाय की पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं होगी, मीडिया द्वारा इसी तरह की नकारात्मक सामाजिक छवि उनके बारे में बनती रहेगी। ब्रिटेन और अमेरिका में अश्वेतोंकी मीडिया में भागीदारी बढ़ने से उनकी सामाजिक छवि में बदलाव महसूस किया गया है। इसलिए मीडिया का भी सोशल आॅडिट जरूरी है। मैक ब्राइड आयोग की रिपोर्ट ने भी, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद से जुड़ी समस्याओं की विस्तार से चर्चा करती है,मीडिया में समाज के हर समूह के प्रतिनिधित्व की वकालत की है ताकि मीडिया ज्यादा वस्तुनिष्ठ हो सके।

(जनसत्ता से साभार)

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