मालिन का दर्द केवल महाराष्ट्र के मीडिया तक सिमट कर रह गया

सुजीत ठमके

trasdiदर्द मालिन हादसे का और नेशनल मीडिया के कवरेज का भी।

टेलीविज़न न्यूज़ चैनल के क्रांति से खबरों के मायने बदले है। इतिहास बदला है। भूगोल बदला है। खबरों की थेओरी बदली है। पलपल या यू कहे मिनिट दर मिनिट खबरों का फ्लो, अपडेट, विजुअल आदि लगातार बदलते रहते है। खबर राजनीति से जुडी हो, चुनाव से सामाजिक सरोकार, आतंकवाद, नक्सलवाद, अर्थनीति, ग्लोबल मार्केट, ग्लैमर गॉसिप, मनोरंजन, शेयर मार्केट, विदेशनीति, अन्तराष्ट्रीय कूटनीति, युवा तबको, क्राइम जगत, ग्रामीण भारत से या फिर किसी हादसे की। हादसा रेल दुर्घटना हो, कोई एक्सीडेंट , बारिश, ठण्ड या धुप के चपेट में आकर बेसहारा, गाँव, कसबे, ग़ुरबत में जिंदगी बसर करने वाले लोगो की मौत। यह तो बाजार का सच है की टीआरपी और बेहतर रेवेन्यू के बैगेर मीडिया हाउस चलाना मुश्किल है। किन्तु जब टीआरपी के लिए टीवी चैनेलो में अंदाधुंध मुठभेड़, कॉर्पोरेट एव रेव्हेन्यू के दबाव के बीच जब जनहित, जनसरोकार से जुडी खबर दम तोड़ देती है तब टीवी पत्रकारिता के लिए वाकई चिंता का विषय है। समूची टीवी पत्रकारिता कठघरे में खड़ी होती है। जी हां….. टीवी पत्रकारिता कठघरे। सही सुना आपने।

टीवी पत्रकारिता के जरिये हम बाजार में एक ऐसी फसल बो रहे जिसको प्रोसेसिंग के जरिये तुरंत रिज़ल्ट तो मिलता है किन्तु बेहतर स्वाथ्य और अच्छे परिणामो की उम्मीद ना के बराबर है। खबर जब एक गाँव देश के नक़्शे से मिटने की हो, सैकड़ों जान मौत के आगोश में समाने की हो तो वो केवल खबर नहीं “बड़ी खबर” होनी चाहिए। घटना के पीछे का विश्लेषण, तथ्यों के साथ, बहस आदि न्यूज़ चैनलों पर होनी चाहिए थी। यह वक्त था सरकार, नौकरशाही, भूमाफिया आदि को आईना दिखाने का किन्तु नेशनल चैनल की बाजार की मज़बूरी देखिये। उत्तरप्रदेश या दिल्ली में एक क़त्ल होता है तो समूचा नेशनल मीडिया घटना के हर पहलू को खंगालता है। लॉ एंड ऑर्डर्स से लेकर राष्ट्रपति शासन लगाने तक बहस चली जाती है। नेशनल मीडिया १ सप्ताह तक टीवी चैनेलो पर बहस करता है, 27X7 न्यूज़ पैकेज बनाकर प्रसारित करता है। करंट अफेयर प्रोग्राम से लेकर प्राइम टाइम शो मुद्दे को लगातार उछालता है। घटना को केंद्रीय मंत्री, सत्ता पक्ष और विपक्ष, कद्दावर नेता, एक्सपर्ट आदि संज्ञान में लेते है। टीवी पर बाइट देने के लिए होड़ मचती है।

किन्तु मालिन हादसा नेशनल मीडिया के लिए नाही चिंता का विषय है। ना ही टीआरपी और नाही रेव्हेयु का जरिया। मराठी चैनेलो ने किस हादसे के कई पहलू पर लगातार चर्चा की। किन्तु जितना असर नेशनल चैनल के खबरों का होता है उसके तुलना में क्षेत्रीय मीडिया का सरकार, नौकरशाहों पर नहीं होता। पुणे से नजदीक आम्बेगाव तहसील में प्रकृति के खूबसूरत वादियों में सदियों से बसा था मालिन गाँव। लगभग ८०० ग्रामीणो इस गाँव सदियों से रहते थे। कुछ मिनिटो में देश के नक्श से लापता हो गया मालिन गाँव। देश के नेशनल मीडिया ने इस घटना को १-२ दिन एक आम हादसा बताकर थोड़ा बीच बीच में कवरेज तो दिया किन्तु खबर के पीछे की “बड़ीखबर ” को किसी भी नेशनल मीडिया ने खंगाला नहीं। और असल खबर यही थी। खबर केवल ग्रामीणो की भूस्खलन हुई मौत इतनीही नहीं है। इस बेगुनाह लोगो के मौत के गुनाहगार कोई और भी है। यह गुनाहगार सरकारी दफ्तरों में बैठे है। नेता है। मंत्री है। बाबू है और बिल्डरभी। सिंचाई, पर्यावरण से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर गाडगिल साहब और कई विशेषज्ञों ने सरकार को कई बार चेताया था किन्तु “ढाक के तीन पात” । मालिन हादसे पर चर्चा, डिबेट आदि करने के लिए किसी भी नेशनल मीडिया के पास वक्त नहीं है। एकतरफ दर्द मालिन हादसे का है। तो दूसरी तरफ त्रासदी नेशनल मीडिया कवरेज की है। जो इस गंभीर घटना पर चर्चा, डिबेट आदि करने को तैयार नहीं। टीआरपी के खेल में मालिन का दर्द केवल महाराष्ट्र के मीडिया तक सिमट कर रह गया।

सुजीत ठमके
पुणे-411002

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