हिंदुस्तान से सेवानिवृति के बाद नयी भूमिका की तलाश में वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत

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श्रीकांत सेवानिवृत बिहार की जनपक्षीय पत्रकारिता को एक विशेष आयाम देने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने दैनिक हिंदुस्तान के विशेष संवाददाता के पद से सेवानिवृति के बाद पत्रकारों, साहित्यकारों के साथ बैठकर अपने अगले और नई पारी पर विमर्श किया। जहाँ लोग किसी सेवा से सेवानिवृति के बाद मुख्य धारा से कट जाते हैं, वहीं यह विमर्श गोष्ठी पत्रकारिता को और मजबूत बनाने की शुरुआत के लिए थी। जैसा कि इस दौरान श्रीकांत ने कहा अब स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य जारी रखने की बारी है। किसानों और सामाजिक परिवर्तन के लिए कलम उठाने वाले श्रीकांत कहते हैं कि पत्रकार कभी सेवानिवृत नहीं होता और जहां तक मेरे लेखन का सवाल है, वो बाजारवाद के खिलाफ है। साथ ही त्रिवेणी संघ पर काम चल रहा है और सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई जारी रखनी है।

नई पारी की शुरुआत के इस मौके पर बिहार के चर्चित पत्रकार-साहित्यकार-बुद्धिजीवी शामिल हुए। इनमें सुरेन्द्र किशोर, नवेन्दु, डी.एन.गौतम, शेखर, ऋषिकेश सुलभ, कन्हैया भेलारी, अरुण अशेष, शशि, कमलांकात, इर्शादुल हक, अजय कुमार, संजय कुमार, श्रीकांत प्रत्युष, मनीष, अनीश अंकुर, ब्रजेश कुमार, अशोक, अरविंद सहित अन्य शामिल थे।

श्रीकांत ने कहा कि हिन्दुस्तान में काम करते हुए कई उतार चढ़ाव देखा, पर उनकी बेबाक रिपोर्टें छपती ही रहीं। उनकी रिपोर्ट और पुस्तकों में सामाजिक सरोकार के मुद्दे हमेशा देखने को मिले। उनकी पुस्तकें,बिहार में चुनाव-जाति,बूथ लूट और हिंसा, बिहार में दलित आंदोलन, 1857 बिहार-झारखंड में महायुद्ध , सामाजिक परिवर्तन के आयाम आदि काफी चर्चित रही हैं।

वे कहते हैं,1983 से पहले जुल्म सितम के खिलाफ पत्रकारिता का एक अलग दौर था। 1983 से 1992-93 तक किसान आंदोलन का समय था। इधर अखबारों में सामंती घराने के लोग काबिज थे। उस दौर के जमीन से जुड़े पत्रकारों ने उनका काउंटर किया और गरीब-पीड़ितों की आवाज को बुलंद किया। 85 के बाद बिहार की पत्रकारिता में जबरदस्त बदलाव आया। गरीब गुरबों के हक के लिए पत्रकारों की एक फौज खड़ी हुई, हालांकि धीर-धीरे अखबार बाजारवाद की गिरफ्त में फंसता गया। लेकिन पत्रकारों की इस फौज ने जमकर उसका मुकाबला किया।

श्रीकांत केवल अपनी पत्रकारिता के लिए ही नहीं बल्कि साहित्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। भोजपुर की चर्चित नाट्य संस्था युवानीति के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं। नाटककार राजेश कुमार और सिरिल मैथ्यू के निर्देशन में कई जनवादी नाटकों में अभिनय तो किया ही, इनकी कहानियाँ “मै बिहार हूँ” और “कुत्ते” का नाटकीय मंचन काफी चर्चित रहा है। “कुत्ते” का रूसी भाषा में अनुवाद भी हुआ। पत्रकारिता के पहल श्रीकांत लेखन से जुड़े थे। कमलेश्वर, मिथिलेश्वर सहित अन्य चर्चित कथाकारों के सानिध्य में भी वे रहे और कई कहानियां भी लिखीं, जो सारिका सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई। श्रीकांत का कहानी संग्रह ‘टुकड़ों में बंटी जिंदगी’ चर्चित रही। लेखन के बाद पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ। शोषण उत्पीड़न के खिलाफ 1981 में ‘‘समकालीन जनमत’’ से जुड़ कर, नवेन्दु के साथ खोजपरक रिपोर्ट लिखना शुरू किया। बिहार की पत्रकारिता में उनकी रिपोर्टों ने सत्ता को घेरे में लेना शुरू किया। देखते ही देखते नवेन्दु-श्रीकांत की जोड़ी ने भारतीय मीडिया में पहचान बना ली। उस दौर की चर्चित पत्रिकाओं रविवार, दिनमान सहित अन्य पत्रिकाओं में भी उनकी रिपोर्टें छपने लगी। बाद में वे पटना से प्रकाशित होने वाले पाटलिपुत्र टाइम्स से जुड़े। बिहार का ‘‘जनसत्ता’’ के रूप में चर्चित इस अखबार में उनकी कई रिपोर्टाें ने खलबली मचाई।

4 अगस्त 1986 जबसे हिंदुस्तान के पटना संस्करण का प्रकाशन शुरू हुआ, तब से श्रीकांत इस पत्र से जुड़े रहे थे। बिरला फाउंडेशन से फेलोशिप पाने वाले वे पटना हिंदुस्तान के अब तक के एकलौते पत्रकार हैं। पत्रकारिता में उनकी उपलब्धि के लिए श्रीकांत को बिहार राजभाषा परिषद, बिहार सरकार से राजेन्द्र माथुर पुरस्कार भी मिल चुका है।

(सभी तस्वीरें फॉटोग्राफर शेखर जी की हैं )

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