दीपक चौरसिया और अजय कुमार ने राहुल गांधी का दिलचस्प इंटरव्यू लिया

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विनीत कुमार, मीडिया विश्लेषक

ऐसे इंटरव्यू से मीडिया और राजनीति दोनों के प्रति चार्म बचा रहता है :

न्यूज नेशन के दीपक चौरसिया और अजय कुमार के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इंटरव्यू दिलचस्प है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू लेकर चैनल ने जो अपनी भद्द पिटवायी, इस इंटरव्यू में काफी हद तक डैमेज कंट्रोल होता नजर आ रहा है. इसकी एक वजह ये भी है कि दीपक चौरसिया की जितनी नजदीकी भाजपा से रही है, इस मुकाबले कांग्रेस से नहीं. लिहाजा, पूरी बातचीत में अपने पेशे के प्रति एक ठसक दिखती है जो कि जरूरी भी है. बस ये सब जगह बरकरार रह जाय,बस..

टीवी पर किसी भी कार्यक्रम को देखने का मेरा अपना तरीका है. मैं बोले गए शब्दों से पहले जो बोल रहे होते हैं, उनकी देहभाषा पढ़ने का कोशिश करता हूं जिसे कि बॉडी लैंग्वेज या गेस्चर कहते हैं. इस इंटरव्यू में लगा कि दोनों मीडियाकर्मी की हैसियत से बात कर रहे हैं जिसकी अपनी एक सत्ता है..नहीं तो आप इस चैनल पर नरेन्द्र मोदी से लिया गया इंटरव्यू दोबारा से देखिए, लगेगा दीपक चौरसिया जी हुजूर कहने की मुद्रा में हैं. आपको गोदान का दृश्य याद हो आएगा. खैर

पूरी बातचीत में सबसे अच्छी पंक्ति लगी जब दीपक चौरसिया ने एक से ज्यादा बार दोहराया- नहीं, आपने जो कहा है, उससे एक सेकण्ड भी कुछ एडिट नहीं होगा. राहुल गांधी ने नोटशीट पर कविता के अलावा क्या लिखा था कहकर चैनल की विश्वसनीयता को लेकर जो संदेह किया, ऐसा कहने के अलावा कोई चारा भी नहीं था. दीपक पुराने लोगों में से हैं. वो जानते हैं, मीडिया के प्रति लोगों का भरोसा कैसे बरकरार रखना है?

पूरे इंटरव्यू में जो सबसे अच्छा सवाल लगा वो अजय कुमार का- आपने संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गले लगाया. संसद में आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, आपके दिमाग में उस वक्त क्या चल रहा था ?

रही बात राहुल गांधी की तो पांच साल में बीजेपी ने एक ऐसे व्यक्ति को गहरे आत्मविश्वास से भर दिया जो खुद भी कभी इतना प्रभावशाली शायद नहीं पाता. इन्हें बोलना सिखा दिया.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के खाते में झोल नहीं है. एक से एक गड़बड़ियां है लेकिन राहुल गांधी के भीतर ये कला आ गयी है कि किस बात पर एक पंक्ति में अपनी /कांग्रेस की गलती मान लेनी है और किस मुद्दे पर मौजूदा सरकार की नाकामियों को सामने रखना है ?

इस तरह की बातचीत से गुजरने पर हम एक दर्शक के तौर पर खुद को ठगा महसूस नहीं करते, हमारे भीतर चालीसा और इंटरव्यू का स्वाद अलग-अलग समझने की क्षमता बची रहती है. बाकी मीडिया तो मंडी है ही…

(लेखक के फेसबुक वॉल से साभार)

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