माफ करना 6 दिसंबर, मुसलमान भी तो इस ज़िंदगी का हिस्सा हैं, कैसे अलग कर दे

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निमिष कुमार
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निमिष कुमार

जब होश संभाला तो टोस्ट देने वाले एक अब्बाजी आते थे। बड़े हुए तो ब्रेड वाले अंकल की दुकान पर जाना होता रहा। ब्रेड और बेकरी वाले बिस्किट्स। प्राइमरी स्कूल के दिनों में क्लॉस में एक मुसलमान लड़का था, बहुत बड़ा और बदमाश। टीचर्स से खूब मार खाता। आज भी याद जब अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मर्द’ रिलीज हुई तो उसने शर्ट का एक बटन खोलकर सीने पर बॉलपेन से लिखा- मर्द। फिर उसकी खूब पिटाई हुई। प्राइमरी स्कूल के बाद वो नहीं दिखा। पता चला कि उसके अब्बा ने उसे किसी काम पर लगा दिया था। मिडिल स्कूल में आए, तो क्लॉस में बहुत ही सीधे और शर्मीले मुस्लिम लड़के से मुलाकात हुई। पढ़ने में अच्छा था, सुशील औऱ संस्कारी। अपनी दोस्तों की गैंग में शामिल हुआ। साथ में टिफिन में लाया खाना खाते, वो भी मिलबांटकर। तब ये नहीं पता था कि हिंदू क्या होता है और मुसलमान। एक औऱ लड़का था मुस्लिम। पढ़ने में कमजोर। खूब मार खाता। लेकिन बहुत शांत था। सो अपन ने उसे भी अपने दोस्तों की गैंग में शामिल कर लिया। टीचर्स में एक मुस्लिम सर थे। बहुत लंबे, ताड़ जैसे। खूब पिटाई करते थे। अपन क्लॉस टॉपर थे। मॉनिटर थे। खूंखार कड़क डॉमिनेटिंग वाइस प्रिसिंपल के लाड़ले स्टूडेंट थे, तो कोई डर नहीं था। उनकी क्लॉस मतलब निमिष। आज लगता है वो गलत होता था, लेकिन तब लाइब्रेरी के पीरियड में बुक डिस्ट्रिब्यूशन निमिष करेगा, बागवानी की पीरियड में निमिष बताएगा कि लड़के क्या करेंगे और लड़कियां क्या। डिबेट, ओरेशन की क्लॉस में तो निमिष ही निमिष होते थे। उनके इतने लाड़ले थे कि उनके घर जो स्कूल के पास था, बेधड़क जाया करते। उनकी नई नई आई बेगम हमें बढ़िया नाश्ता कराती और सर हमारी पढ़ाई की प्रॉब्लम्स सॉल्व करवाते।

हायर सेकेंडरी क्लॉसेस के दिनों में अंग्रेजी के टीचर मुसलमान थे। पूरी क्लॉस कुछ करें मतलब नहीं, लेकिन निमिष बिलकुल बेस्ट होना चाहिए। सो स्कूल में लड़कपन के दिनों की धींगामस्ती मास्टरजी के चलते ना हो सकी। क्लॉस में एक लड़की थी मुसलमान। हम मैथ्स-साइंस वाले, वो होमसाइंस की। सिर्फ लैंग्वेज़ की क्लॉसेस में आते थे वो लोग। पढ़ने में बहुत होशियार। इंग्लिश क्लॉस में अपन को टक्कर देने वाली। उन्हीं दिनों एक मुस्लिम लड़के ने एडमिशन लिया। मालूम चला पिता पुलिस इंस्पेक्टर हैं, और अभी-अभी ट्रांसफर होकर आया है। दोस्ती हुई। उसके घर आना-जाना हुआ। उसके अब्बा से तो एक-दो बार मुलाकात हुई, लेकिन उसकी अम्मी के हम लाड़ले हो गए। कहती- बेटा, इसे हमेशा अपनी संगत में रखना। थोड़ा पढ़ लिख लेगा। उन दिनों मां-बाप का ज़ोर इस बात पर ज्यादा रहता कि उनका लड़का क्लॉस के अच्छे मतलब टॉपर्स के साथ ही रहे। खैर, वो जनाब पढ़ने तो लगे, लेकिन लड़ाई झगड़े में भी शामिल रहते थे। पहली बार उसके घर जाते-जाते लगा कि मुस्लिम धर्म (इस्लाम तब भी समझ से परे था) अलग होता है। क्योंकि तब उन्हें नमाज पढ़ते देखा। मौलवी साहब को देखा। पहली बार स्कूल के दिनों में ही अपने एक मिडिल स्कूल के दिनों के साथी जो पढ़ने में कमजोर था, का निकाह हुआ। तब मालूम चला कि शादी को मुस्लिम लोग निकाह कहते हैं। जिससे निकाह हुआ वो हमसे एक क्लॉस पीछे थे, मतलब जूनियर।

तुम मंदिर बना लो,नहीं तुम मस्जिद बना लो
तुम मंदिर बना लो,नहीं तुम मस्जिद बना लो

स्कूल के बाद एक बार उस होम साइंस वाली मुस्लिम लड़की से एक दूसरे शहर में मुलाकात हुई। कॉलेज में आ गए थे, तो थोड़ा बोल्ड भी और थोड़ा बिंदास भी हो गए थे। उसे पहली बार बुरके में देखा। उसने अपनी चाची या मौसी किसी से मिलाया। वो मुझे जानती थी, सो अपनी उस क्लॉसमेट से थोड़ी देर बात करने की इज़ाजत मिल गई। उसके बाद फिर उसे नहीं देखा। जिस दोस्त का निकाह स्कूल के दिनों में हो गया था, सुना है वो फर्नीचर का काम करता है। पुलिस इंस्पेक्टर पिता वाला दोस्त अब किसी चिटफंड कंपनी का पार्टनर है। वो शर्मीला सा मुस्लिम लड़का मालूम नहीं कहां है। लंबे ताड़ जैसे मुस्लिम सर शायद वापस अपने गांव चले गए। अंग्रेजीवाले मुस्लिम सर रिटायर हो गए। सुना है बेकरी वाले अंकल अब बहुत बूढ़े हो गए हैं।
कॉलेज के दिनों में प्रोफेसर मुसलमान थे और यहां भी अपन उनके पैट स्टूडेंट। एकदम चम्मच। इतने की सर घर पर बुलाते और खूब खिलाते। बच्चों को डांटते कि देखो ऐसे पढ़ना चाहिए। कॉलेज के दिनों में ना कोई मुसलमान दोस्त बना ना मुसलमान गर्ळफ्रेंड। दिल्ली स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स आए, तो गाइड प्रोफेसर मुसलमान थे। एचओडी मुसलमान थे। गाइड वामपंथी थे, सीताराम येचुरी के जेएनयू के चड्डी-बड्डी यार थे, सो कभी वो फिलिंग नहीं आई। क्लॉस के बाद वो प्रोफेसर नहीं होते, खुलकर बात करते। किस लेक्चर का किस प्रोफेसर से लफड़ा है, कौन प्रोफेसर पैसे को लेकर भ्रष्ट्र है, कौन पोस्टिंग के जुगाड़ में रहता है, वगैरह वगैरह। एचओडी प्रोफेसर को अपन से बहुत प्रॉब्लम थी। पहला कि अपन नार्थ एवेन्यू में कई बीजेपी सांसदों के घर खूब जाया करते थे। दूसरा उन्हें शक था कि जिस हिंदू लड़की से वो अपने बेटे की शादी करवाने के फिराक में थे, वो अपन को पसंद करती है। सो उनकी क्लॉस, उनके पेपर्स, उनके असाइनमेंट में नंबर देते वक्त वो सारा गुस्सा निकलता। तू-तू मैं-मै हुई। हिंदु-मुसलमान होने की बात भी स्टूडेंट-प्रोफेसर के बीच आई। पहली बार लगा कि धर्म के नाम पर भी इंसान बंट सकता है, दुराभावी हो सकता है।

मुखर्जी नगर में रहते हुए सबसे दिलदार, शानदार दोस्त बना वो मुसलमान ही था। जो एक शाम उसके कमरे पर चाय पीने नही जाओ, या एक हफ्ते उसके साथ खाना नहीं खाओं, तो गरिया देता था- का बे, बड़के साला धरम-वरम तो नही पाल लिए हो। माना कि हम मुसलमान है, लेकिन साला तुम कौन से मुसलमान, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौध्द…दलित-सवर्ण नहीं हो। सब तो हो बे भौकाली। आ जाओ। बंगाली साला चाय चढ़ा दिया है, मालूम नहीं बंगला में तूझे और मुझे गरिया रहा है।…और अपन दौड़कर उसके दरवाजे पहुंच जाते। बेहतरीन कढ़ाई पनीर कैसे बनाया जाता है, ये उसने ही सिखाया। वो नमाज पढ़ता था, पांचों वक्त की। जज का बेटा था। और धर्मों को लेकर बहुत बहस करता था।

चैनलों की दुनिया में आए, तो उससे मुलाकात हुई। लगता था मानों कश्मीर की वादियों के सारे फूल खुदा ने एक टोकनी में रखे और फूंक मारकर उसे बना दिया। बहुत कम बोलती थी। बहुत कम। छोटी बहन को मालूम था कि वो लड़का आपा का बस कुलीग नहीं है। अम्मी को भी मालूम था, और अब्बा को भी खबर थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पहली बार लगा कि हिंदुस्तान में धर्म दिलों के रास्तों को नहीं पहचानता। सो इससे पहले की दिल मिलते या सपने बुनते, धर्म की दीवार खड़ी हो गई। कुछ कहता इससे पहले ही एक दिन जवाब मिल गया। ‘ ये सब इतना आसान नहीं है..’ कार का दरवाजा बंद हुआ और वो उसके घर की ओर जाने वाली गली में मुड़ गई। ना उसने पलटकर देखा ना मैं पलटा, और जिंदगी आगे बढ़ गई, उस दिन उस कार की तरह।

वो न्यूज़ चैनलों की दुनिया का बहुत बड़ा नाम है। पहली मुलाकात में ही कब एकलव्य से अर्जुन बना लिया, मालूम ही नही चला। बहुत सी बातें सिखाई। समझाई। आज भी गुरु द्रोणाचार्य की तरह अपने इस अर्जुन का राह बता रहे हैं, इस सब से परे कि मेरा धर्म क्या है, और उनका क्या। क्योंकि गुरु अपने शिष्यों का धर्म जात देश नहीं पूछते, वो तो बस बच्चे की लगन देखते हैं। शायद उन्होंने भी यही देखी होगी।

मुंबई आया तो लोकल में चढ़ते वक्त कई बार गिरा। ट्रेन के पहियों के बीच आते आते बचा। ट्रेन में लटककर जाते लोगों को चिल्लाते सुना- ओ भाउ मरेगा का। और एक दिन भीड़ से खचाखच उस ट्रेन से एक हाथ निकला। आईए। और मैं ट्रेन में था। फिर शुरु हुआ ज़िंदगी का अब तक का सबसे यादगार सफर। जब तक मुंबई में रहा, वो लोकल, वो डिब्बा तय हो गया। ट्रेन स्टेशन पर लगती इससे पहले अपना लोकल का नाम- आईबीएन आला रे- सुनाई देने लगता। लोकल में मेरा वो ग्रुप आज भी साथ है, वॉट्सअप पर हम आज भी बात करते हैं। वो हाथ, जो दुनिया के लिए एक मुसलमान का हो सकता है, मेरे अजीज दोस्त हैं। मुंबई से दूर उनके शहर आजमगढ़ में कितने ही मेरे नाम से वाकिफ हो गए। कितनों से बातें हुई।

बचपन के स्कूल की रिसेस में वो दोस्त के टिफिन का पोहा, स्कूली दोस्त का स्कूल के दिनों में ही निकाह में शामिल होने की गुदगुदी, वो टीचर्स का दुलार, वो कड़ाही पनीर और चाय की आवाज, वो दो दिलों का कुछ ना कहकर कुछ कह जाना, वो लोकल से बढ़कर निकला हाथ, मैं नहीं जानना चाहता कि हिंदु क्या है मुसलमान क्या, मैनें सिर्फ इतना जाना कि रिश्तों में मोहब्बत शायद सबसे बड़ा धर्म होता है। माफ करना 6 दिसंबर।

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