दिल्ली का दंगल आसान नहीं,AAP को लेकर न्यूज़ चैनलों का सर्वे गलत भी हो सकता है

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दिल्ली चुनाव के मद्देनज़र न्यूज़ चैनलों पर सर्वे का बाजार गर्म है, लेकिन ज्यादातर सर्वे संदेहास्पद

नदीम एस अख्तर

नदीम एस अख्तर
नदीम एस अख्तर
दिल्ली चुनाव के मद्देनज़र न्यूज़ चैनलों पर सर्वे का बाजार गर्म है, लेकिन ज्यादातर सर्वे संदेहास्पद
दिल्ली चुनाव के मद्देनज़र न्यूज़ चैनलों पर सर्वे का बाजार गर्म है, लेकिन ज्यादातर सर्वे संदेहास्पद

जो लोग-मीडिया संस्थान अपने-अपने सर्वे या आंकलन में ये बता रहे हैं कि इस दफा दिल्ली विधानसभा का चुनाव आम आदमी पार्टी जीत रही है, वो चूक कर रहे हैं. पिछली दफा सर्वे और चुनाव नतीजों के आंकलन में आम आदमी पार्टी को जब कोई तवज्जो नहीं दी जा रही थी (सारे Pre poll Survey हवा का रूख देखते-भांपते हुए ही किए जाते हैं और इनको मैं ज्यादा अहमियत नहीं देता) तब मैंने लिखा था कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पक्ष में लहर है और ये एकदम नई-नवेली पार्टी कोई चमत्कार करने जा रही है. हुआ भी यही और आम आदमी पार्टी ने उस चुनाव में कांग्रेस को चारों खाने चित कर, शीला दीक्षित को हराकर दिल्ली में सरकार बनाकर सबको अचंभित कर दिया.

लेकिन इस बार नजारा एकदम अलग है. आम आदमी पार्टी अब कुछ पुरानी हो चुकी है, उसके नेता भी थोड़ा मैच्योर हो चुके हैं, वे राजनीति करना और इसकी भाषा बोलना भी सीख गए हैं, सो उन्होंने चुनाव से पहले मीडिया से लेकर सारे उपलब्ध स्थानों पर अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज कर दी है. पब्लिक में भी इस पार्टी को लेकर पहले से ज्यादा awareness और उत्साह है. और यहीं से इस दफा का दिल्ली चुनाव पिछली बार वाले चुनाव से एकदम अलग हो जाता है और यहीं से आम आदमी पार्टी की मुश्किलें शुरु होती हैं.

दरअसल आप जितनी सुर्खियों में रहेंगे, उतने ही संकट से भी घिरे रहेंगे. इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ यही हो रहा है. बीजेपी और कांग्रेस, दोनों को पता है कि अबकी बार आम आदमी पार्टी की लहर है और ये पार्टी जीतकर सत्ता में आ सकती है. सो इतिहास की वह कहावत यहां लागू हो जाती है कि सामने आए दुश्मन को मारना आसान है, छिपे दुश्मन को नहीं. यानी पिछली बार अरविंद केजरीवाल, बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए छिपे हुए घात लगाए दुश्मन थे और दोनों पार्टियां ये सोचने को भी तैयार नहीं थीं कि केजरीवाल को दिल्ली चुनाव में बड़ी सफलता मिल सकती है. इससे केजरीवाल का काम बहुत आसान हो गया. कांग्रेस और बीजेपी सीधे तौर पर एक-दूसरे से भिड़ीं और फायदा केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को हो गया.

पर अबकी बार सीधे निशाने पर केजरीवाल हैं. बीजेपी-कांग्रेस उस पर डायरेक्ट अटैक कर रही हैं और दोनों पार्टियां चुनाव जीतने के लिए आम आदमी पार्टी की ऐसी-तैसी करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहीं. हालांकि कांग्रेस की हालत काफी खस्ता है इस बार, पर बीजेपी और नरेंद्र मोदी-अमित शाह के लिए दिल्ली का चुनाव नाक की लड़ाई बन चुका है. सार्वजनिक तौर पर वे भले ही इसे ना स्वीकारें लेकिन सच यही है कि अगर बीजेपी दिल्ली में हारती है, तो भारत की वर्तमान राजनीति इससे बहुत ज्यादा प्रभावित होगी. केंद्र में फिलहाल निष्प्राण पड़े विपक्ष में एक नई जान आएगी और फिर सारे दल मिलकर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने की नई रणनीति बना सकते हैं. मोटे तौर पर कहें तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत, मोदी सरकार की मुखालफत का एक नया अध्याय खोलेगी और विपक्ष को संगठित होकर नए सिरे से एकजुट करेगी.

जाहिर है, मोदी ऐसा कभी नहीं चाहेंगे, सो वह दिल्ली का चुनाव जीतने की हर संभव कोशिश करेंगे. कहते हैं कि राजनीति और जंग में सब जायज है, सो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी कोई कसर नहीं छोड़ने वाले. (वैसे उनका ट्रैक रिकॉर्ड इसकी तस्दीक करता है). और इसी पायदान पर आम आदमी पार्टी की जीत पर ग्रहण के बादल मंडराने लगते हैं.

पब्लिक का मूड भले ही आपके पक्ष में हो, ओपिनियन पोल भले ही आपकी जीत का दावा कर रहे हों, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप वाकई में उतनी सीटें जीतकर ला ही रहे हैं. एक बहुत छोटे मार्जिन से आप लगभग जीती हुई कई सीटें हार सकते हैं और चुनाव में एक बड़ा झटका खा सकते हैं. ये बहुत महीन बात है और अगर आम आदमी पार्टी व अरविंद केजरीवाल इसको नहीं समझ पाए, तो उनकी दिख रही कामयाबी एक क्षण में भरभराकर गिर जाएगी.

बस दो दिन बाद चुनाव होने हैं, सो जिसको जितना प्रचार करना था, हो गया. अब जो होगा, वो बोनस ही होगा. ज्यादातर लोगों ने भी अपने फेवरिट कैंडिडेट और पार्टी को वोट देने का मन बना लिया होगा. पर असल इम्तिहान यहीं से शुरु हो रहा है और वह है बूथ मैनेजमेंट का. यह बात दीगर है कि बीजेपी के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक बड़ा नेटवर्क और कार्यकर्ताओं का हुजूम है, जो आखिरी पल में उनके बड़े काम आ सकते हैं और बाजी पलट सकते हैं. आम आदमी पार्टी चूंकि अभी नई है, सो जाहिर सी बात है कि उनकेपास कार्यकर्ताओं की वैसी फौज नहीं. इसी बिंदु पर बीजेपी, आम आदमी पार्टी पे बहुत भारी पड़ रही है और यहीं पे बूथ मैनेजमेंट पर बीजेपी को upper edge मिलता है.

मैंने सुना है कि शाम को बूथों पर बड़ा खेल हो सकता है. अगर शाम को अचानक बूथों पर मतदाताओं की भीड़ बढ़ जाए तो चुनाव आयोग वोटिंग का समय बढ़ा सकती है. ऐसे में रात तक वोटिंग हो सकती है. और यदि ज्यादातर बूथों पर ऐसा हुआ, तो जान लीजिए कि किसे, कैसा और क्या नुकसान हो सकता है. ये नुकसान बहुत बड़ा होगा और सबकुछ लोकतंत्र के निर्धारित मापदंडों के अंदर ही होगा.

वैसे भी ओपिनियन पोल्स, मीडिया कवरेज और पब्लिक से मिले फीडबैक के बाद आम आदमी पार्टी ने जिस तरह नरेंद्र मोदी और बीजेपी को हल्के में लेना शुरु कर दिया है, वह घातक हो सकता है. हुजूर, मोदी जी बड़े मजे हुए खिलाड़ी हैं और हो सकता है कि बीजेपी कोई ऐसा दांव अब तक छुपा कर रखी हो, जिस पे आपका ध्यान ही नहीं गया है. जिस चुनाव में पार्टी और पीएम का इतना कुछ दांव पे लगा हो, केंद्र में उनकी सरकार हो, वो क्या इतनी आसानी से आपको चुनाव जीत लेने देंगे ??!! मुझे तो नहीं लगता. तो पता लगाइए कि बीजेपी के पास छिपे हुए कौन-कौन से ब्रह्मास्त्र हैं, जो आम आदमी पार्टी पर भारी पड़ सकते हैं.

कल एक खबर आई कि केंद्र सरकार ने केंद्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी को तत्काल हटाने का फैसला किया और आनन-फानन में गोस्वामी ने इस्तीफा भी दे दिया. कारण बताया गया कि गोस्वामी ने शारदा चिटफंड घोटाले के आरोपी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिन्ह को बचाने के लिए उनसे पूछताछ कर रही सीबीआई टीम को फोन किया था और सीबीआई के कार्य में हस्तक्षेप भी करने की कोशिश की.

लेकिन मैं इस खबर को किसी और नजर से देख रहा हूं. क्या अब तक सीबीआई, केंद्र सरकार का तोता नहीं रही है, क्या अब तक सीबीआई के कामकाज में सीधे तौर पर केन्द्र सरकार ने दखल नहीं रखा है??!!. रखा है ना, तभी तो सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ गया कि सीबीआई, केन्द्र सरकार के तोते की तरह बर्ताव करती है.

फिर अगर केंद्रीय गृस सचिव गोस्वामी ने कथित रूप से मतंग को बचाने के लिए सीबीआई को फोन किया, तो इसमें क्या अप्रत्याशित था!!. या फिर उनका यह कदम केंद्र सरकार को -सूट- नहीं कर रहा था!!! या फिर कोई और बात है, जो पर्दे में छिपी हुई है. और मतंग वाले मामले को जानबूझकर मीडिया में लीक कराकर, खबर बनाकर, एक भूमिका बनाकर गोस्वामी को हटाया गया. दिल्ली का चुनाव सिर पर है और ऐसे में गोस्वामी प्रकरण मुझे कुछ समझ नहीं आया.

मीडिया में कहते हैं, Read between the lines. तो दोस्तों ! भावनाओं को समझिए. लिखी बातों के अंदर छिपी बातों को पढ़िए. दिल्ली का दंगल इतना आसान भी नहीं. बहुतों का बहुत कुछ दांव पर लगा है. और यही राजनीति है जी. यही लोकतंत्र है. शह और मात. एक चाल गलत चले नहीं कि गए काम से. बिसात बिछ चुकी है और जिसकी चाल धारदार होगी, वही जीतेगा.

आखिर पब्लिक के मूड को वोट में बदलना भी एक कला है, चैलेंज है और यही राजनीति की इस बिसात पर गेम चेंजर होने जा रहा है. कई बार जो दिखता है, वो होता नहीं और जो होता है…..वो दिखता नहीं. जय हो.

(लेखक अध्यापन कार्य में संलग्न हैं)

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