कलर्स पर सीरियल शुरू होने के 120 दिन बाद भी कलाकारों को अठन्नी नहीं मिली

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विनीत कुमार

vani*कलर्स टीवी चैनल पर प्रसारित वाणी( इश्क द कलमा) सीरियल के कलाकारों को सीरियल शुरु होने के करीब 120 दिन बाद भी अठन्नी नहीं मिली, छोटा सा हिस्सा जून में वादा करके 15 जुलाई को दिया गया. इस दौरान कई जूनियर कलाकारों को घर का किराया देने तक के पैसे नहीं थे. जो कॉन्ट्रेक्ट पेपर दिए जाते हैं, उसमे ये साफ लिखा होता है कि प्रसारण के 90 दिन के भीतर उन्हें पैसे दे दिए जाएंगे.

लेकिन मार्च में शुरु हुए इस सीरियल के लिए कलाकार फरवरी से ही काम कर रहे थे लेकिन पैसे के नाम पर टालाटाली चलती रही. प्रोड्यूसर से आपसी रिश्ते और लिहाज के कारण काफी दिनों तक कलाकारों ने कुछ नहीं कहा( देखिए टीवी प्रोफेशनलिज्म कि रिश्ते भी आड़े आ जाते हैं) लेकिन जब देखा कि कहीं कुछ नहीं हो रहा है तो विरोध प्रदर्शन का मन बनाया.

हालांकि इसमे कलर्स चैनल की सीधी-सीधी कोई भूमिका नहीं है लेकिन आपको याद होगा कि 2009 में आयी विश्व आर्थिक मंदी के नाम पर चैनलों ने जब कटौती शुरु की थी और कलर्स ने भी इसी तरह का काम किया था तो जूनियर आर्टिस्ट इसी तरह हड़ताल पर चले गए थे और तब बालिका वधू,उतरन के घिसे पुराने एपीसोड देखकर ही काम चला रहे थे. इसका मतलब है कि चैनल और प्रोडक्शन हाउस के बीच शोषण की चक्की लगातार चलती रहती है, ये अलग बात है कि कभी-कभार वो खबर का हिस्सा बनने पाती है.

हमारे जो दर्शक इस सीरियल को भक्ति-भाव से देखते आए हैं( पहले इसका नाम गुरुवाणी रखा गया था लेकिन सिक्ख संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया), उन्हें जब ये खबर पहुंचेगी कि उसकी वाणी,बिज्जी के साथ ये सब हो रहा है तो कितनी ठेस पहुंचेगी.

*हमारे यहां जो भी मनोरंजन बीट कवर करते हैं, वो ये मानकर चलते हैं कि उन्हें शोषण, मानवाधिकार, हड़ताल, गैरबराबरी आदि जैसे मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है. उनका काम बस पांच सितारा होटल में चलनेवाल प्रेस कॉन्फ्रेस और भटिंडा-मुरैना, बलिया-बक्सर टाइप बनायी सेट पर जाकर चाट खाना और कलाकारों की बांह में बांह डालकर फोटो खिंचाना है. मौके-बेमौके जब मैं भी मनोरंजन से जुड़ी खबर कवर करनेवाले मीडिया साथियों से मिलता हूं तो उनके पूरे हाव-भाव से कहीं से नहीं लगता कि वो आजतक, जी न्यूज, न्यूज नेशन या फिर ऐसे ही किसी दूसरे चैनल के लिए काम करते हैं, वो वॉलीवुड और टेलीवुड के प्रतिनिधि लगते हैं. वैसे ही बात करने का अंदाज और वैसे ही मुद्दे. कभी किसी के मुंह से वहां काम करनेवाले लोगों के साथ पर्दे के पीछे जो कुछ भी हो रहा है, सामने नहीं लाते जबकि प्रोमोशन और पीआर की चढ़ चुकी परत के बीच ये काम भी उन्हीं का है.

लेकिन उनके लिए संघर्ष का मतलब है कौन पहले जेठालाल पर स्टोरी कर लेता है, कौन रणवीर सिंह से सटकर माईक पकड़ सकता है. किसको बिग बॉस की लांचिंग पार्टी में बुलाया गया. माफ कीजिएगा, उनकी हरकत को करीब से देखेंगे तो लगेगा कि वो स्टोरी के नाम पर तंबू लगाने-खोलने का काम करते हैं.नतीजा, मनोरंजन की दुनिया गुडी-गुडी दिखती है. एकाध बार कोई हादसे के दौरान खबर आ गयी तो आ गयी, बाकी सन्नाटा.

*इस देश में यौन हिंसा- फर्जी मुठभेड, आतंकवादी हमले( अक्सर बिना जांच के करार दिए जाने की मीडिया आदत) जैसी घटनाएं होंगी तो उन सिने-सितारों को खोज-खोजकर पैनल में शामिल किया जाएगा जिनका कि इससे जुडी प्लॉट पर फिल्में आयीं है. भ्रष्टाचार और कुपोषण के सबसे बड़े वक्ता आमिर खान हैं, मानवता और अमन चैन पर जावेद अख्तर और ये सूची लंबी है..बस फिल्म आने की देरी भर होती है, कलाकार मुद्दे का विशेषज्ञ हो जाता है. लेकिन
जरा पूछिए तो जाकर की यही काम अगर उनकी इन्डस्ट्री में हो रहा है तो उनकी क्या राय है, क्यों 120 दिनों से कलाकारों को पैसे नहीं दिए गए और वो किराये तक का पैसा नहीं जुटा रहे हैं..अजी पूछने की तो छोड़िए जी, इन सितारों की सुविधा के लिए मीडिया स्टोरी ही नहीं करेंगे.

(एफबी से साभार)

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