बरखा दत्त और दूसरे पत्रकारों को सीख देने के पहले नरेंद्र मोदी अपना राष्ट्रधर्म समझें

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उर्मिलेश,वरिष्ठ पत्रकार

बीते शनिवार न्यूयार्क में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से दो पत्रकारों की नाश्ते पर हुई अनौपचारिक मुलाकात के बाद थोड़ी देर के लिए चाय की प्याली में तूफान खड़ा होता नजर आया।

यह सब एक पाकिस्तानी टीवी पत्रकार की खास टिप्पणी की वजह से हुआ, जिसमें उन्होंने दावा किया कि ‘आॅफ द रिकार्ड बातचीत’ के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने डॉ मनमोहन सिंह की तुलना ‘देहाती औरत’ से की। अच्छी बात हुई कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने प्याली में उठे इस तूफान को कोई तवज्जो नहीं दी। इसलिए न्यूयार्क में तो कुछ नहीं हुआ, पर दिल्ली के रोहिणी स्थित जापानी पार्क में इसकी सीधी प्रतिक्रिया हुई। इस पार्क में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली थी। प्रधानमंत्री पद का पार्टी-प्रत्याशी बनने के बाद वे पहली बार दिल्ली में किसी रैली को संबोधित कर रहे थे।

तीसों दिन-चौबीसों घंटे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोसते रहने वाले भाजपा नेता ने पहली बार उनके प्रति सदाशयता, बल्कि यों कहें, उन पर दया दिखाई। मोदी की देशभक्ति अचानक जाग गई कि न्यूयार्क में उनके देश के (‘कमजोर’) प्रधानमंत्री को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री (अमेरिकी या इजराइली नेताओं ने कहा होता तो बात भले काबिले-बर्दाश्त होती!) ने ‘देहाती औरत’ कहने का दुस्साहस कैसे किया! उन्होंने नवाज शरीफ को तो लताड़ा ही, उनके साथ नाश्ते पर मिलने गए भारतीय टीवी पत्रकार (छद्म-सेक्युलर!) को भी खूब खरी-खोटी सुनाई। कुछ देर को तो ऐसा लगा कि मोदी साहब वरिष्ठ संपादक या मीडिया-शिक्षक बन गए। उन्होंने रैली-मंच से ही ‘पत्रकारिता के सरोकार और पत्रकारों के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दायित्व’ पर अपने ‘देशभक्त-परिप्रेक्ष्य’ का खुलासा किया। पत्रकारों के लिए उसमें ‘अच्छी-खासी नसीहत’ थी।

उनके मुताबिक पत्रकार को ऐसे अंतरराष्ट्रीय मौके पर अपनी राष्ट्रभक्ति का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के नाश्ते को ठोकर मार कर वापस लौट आना चाहिए था, उसे वहां बैठ कर मिठाई नहीं खानी चाहिए थी। उनके अनुसार नवाज शरीफ भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसी ‘देहाती औरत’ की तरह बता कर न सिर्फ उनका, बल्कि संपूर्ण भारतीय जनता का अपमान कर रहे थे, और नाश्ते पर आमंत्रित भारतीय पत्रकार ने चुपचाप वहां देश का अपमान बर्दाश्त किया। बकौल मोदी, ऐसे पत्रकार को देश के समक्ष सफाई देनी चाहिए।

पत्रकार और पत्रकारिता के सरोकार को लेकर मोदी की चिंता पर विचार करने से पहले ‘देहाती औरत’ के रूपक और इस बारे में उनकी धारणा पर बात करें। यह तो सिर्फ पाकिस्तानी टीवी पत्रकार हामिद मीर और भारतीय टीवी पत्रकार बरखा दत्त बता सकते हैं कि नाश्ते पर उनसे हुई अनौपचारिक मुलाकात में नवाज शरीफ ने मनमोहन सिंह की तुलना किसी ‘देहाती औरत’ से की या नहीं, लेकिन ‘देहाती औरत’ की कथित तुलना पर मोदी का भड़कना कुछ समझ में नहीं आया!
हम इस बहस में नहीं जा रहे कि नवाज शरीफ ने उक्त तुलना की या नहीं? पर मोदी साहब, क्या ‘देहाती औरत’ को इतना तुच्छ या हेय प्राणी समझते हैं, जिससे किसी ‘बड़े राजनेता’ की तुलना करने मात्र से उनका अपमान हो जाएगा? क्या देहाती-औरतें मोदी साहब की नजर में ओछेपन या तुच्छता का प्रतीक हैं? किसी का अपमान करना हो तो उसे ‘देहाती औरत’ कह दो? आखिर नरेंद्र मोदी या नवाज शरीफ (अगर उन्होंने डॉ सिंह के लिए इस जुमले का इस्तेमाल किया तो) को ‘देहाती औरत’ में ऐसा क्या अवगुण नजर आता है? क्या उनका सीधा-सरल होना या अनपढ़ होना? अगर वे अनपढ़ हैं तो इसके लिए वे खुद दोषी हैं या मोदी साहब और शरीफ साहब की प्रजाति (लिंग और पेशा, दोनों स्तर पर)?

यहां बता दें कि पाकिस्तान और भारत में महिला-साक्षरता दर क्रमश: छियालीस फीसद और 65.46 फीसद है। छियासठ साल में अब तक इसे सौ फीसद होना चाहिए था, अगर नहीं है तो इसके लिए दोनों देशों के शासक-राजनेता जिम्मेदार हैं, देहाती औरतें नहीं। अगर देहाती औरतें सहज और सरल होती हैं तो निस्संदेह यह श्रेष्ठ मानवीय गुण है। इस पर मोदी साहब और शरीफ साहब को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

अब पत्रकारिता के सरोकार और उन अन्य संदर्भों पर, जिनका नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में उल्लेख किया। न्यूयार्क में नवाज शरीफ से पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर और एनडीटीवी की बरखा दत्त की उक्त मुलाकात के बारे में अब तक जो बातें सामने आई हैं, वे इस प्रकार हैं: यह मुलाकात नाश्ते पर हुई और पूरी तरह ‘आॅफ द रिकार्ड’ थी। बरखा द्वारा जारी सफाई के मुताबिक शरीफ ने डॉ सिंह के बारे में ‘इस तरह की कोई टिप्पणी’ नहीं की। मीर की सफाई में परस्पर विरोधी बातें हैं। शुरू में उन्होंने अपने चैनल पर कहा कि शरीफ ने डॉ सिंह के बारे में यकीनन उक्त टिप्पणी की थी। मतलब यह था कि डॉ सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपनी मुलाकात में पाकिस्तान की कुछ उसी अंदाज में शिकायत की, जैसे कोई ‘देहाती औरत’ किसी की शिकायत गांव-घर में करती है! मगर मीर ने बाद में सफाई दी कि गांव की कहानी सुनाते हुए उन्होंने कुछ बातें कहीं, लेकिन इसमें डॉ सिंह के खिलाफ कोई अपमानजनक बात नहीं थी। वे बातें बस मजे लेकर कही गर्इं।

अगर हामिद मीर के अंतर्विरोधी बयानों और स्पष्टीकरणों की तह में जाएं तो यह बात साफ है कि पाकिस्तानी पत्रकार से इस प्रकरण में एक साथ कई पेशागत चूकें हुई हैं। एक ‘आॅफ द रिकार्ड’ बातचीत के कुछ चुनिंदा हिस्सों (अगर वह सचमुच कहे गए थे!) को ही उन्होंने क्यों जाहिर किया? क्या यह माना जाए कि उनका इरादा भारत-पाक के रिश्तों में कूटनीतिक-खिंचाव पैदा करना था? क्या पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति के अपने अंतर्विरोधों को व्यक्त करते हुए उनका इरादा किसी

खास वजह से अपने प्रधानमंत्री को मुश्किल में डालने का था। इस कथित खुलासे से वे और क्या हासिल करना चाहते थे? इस बारे में हामिद मीर को एक प्रोफेशनल के तौर पर अपनी बात कहनी चाहिए थी, पर उसकी जगह उन्होंने दो बार सफाई पेश की। दोनों बार उनके बयान अलग थे। इससे उनका पक्ष और उलझता नजर आया।

इधर नरेंद्र मोदी ने पत्रकार के ‘राष्ट्र-धर्म’ को परिभाषित करते हुए कहा कि ऐसे अवसर पर एक भारतीय पत्रकार को विदेशी राजनेता की ‘मिठाई फेंक कर’ विरोध दर्ज कराना चाहिए था। क्या पत्रकार का काम हर हाल में अपने देश की सरकार, प्रधानमंत्री, किसी शासक-राजनेता, किसी नीति या उद्घोषणा के पक्ष में खड़ा होना है? क्या उसे अपने देश की सरकार या उसके प्रधानमंत्री को लेकर देश या विदेश में, किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय आयोजन के दौरान किसी विदेशी राजनेता द्वारा की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी या आलोचना के खिलाफ घटनास्थल पर ही विरोध का झंडा उठा लेना चाहिए?

मैं समझता हूं, किसी राजनेता की तरफ से पत्रकारों को ऐसा ‘प्रशिक्षण’ देने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। यह न तो उसका कार्यक्षेत्र है और न ही इसमें उसकी कोई विशेषज्ञता है। मोदी पत्रकारों को ऐसी नसीहत देकर पत्रकारिता के सरोकार और उसके परिप्रेक्ष्य को बहुत संकरे दायरे में सीमित कर रहे हैं। पत्रकारिता बुनियादी तौर पर सूचना-संप्रेषण, तथ्य-प्रस्तुति, घटनाक्रमों या मसलों की व्याख्या या विश्लेषण का पेशा है। यही उसका कर्म और धर्म है।

पत्रकार किसी देश का निवासी या किसी धर्म का अनुयायी हो सकता है, लेकिन पेशे के तौर पर उसकी न कोई राष्ट्रीय-नागरिकता है न ही कोई धार्मिक-प्रतिबद्धता। दुनिया भर के पत्रकार इसी सोच और परिप्रेक्ष्य के साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को कवर करते हैं।

कई अमेरिकी पत्रकार लातिन अमेरिकी या एशियाई देशों में अपने देश के शासकों के जुल्मोसितम पर बेहतरीन कथाएं और किताबें लिख चुके हैं। उनके लेखन के जरिए ही अमेरिका द्वारा मानवाधिकार हनन के अनेक तथ्य पूरी दुनिया के सामने उजागर हुए। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे पत्रकारिता के अपने पेशे के साथ ईमानदार नहीं माने जाएंगे।

पत्रकार का काम तीर-तलवार चलाना नहीं, कलम चलाना या परदे पर सूचना-संदेश-व्याख्या प्रस्तुत करना है। देश के अंदर हो या विदेश में, आयोजन राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय, मसला उसके देश का हो या किसी प्रतिस्पर्धी या प्रतिद्वंद्वी देश का, पत्रकार का काम किसी प्रतिकूल स्थिति या घटनाक्रम पर ‘डंडा भांजने’ का नहीं हो सकता। कहीं उसके देश या क्षेत्र-विशेष के बारे में कोई ऐसी चर्चा हो रही हो, जो निजी तौर पर उसे नापसंद हो तो भी उसका फर्ज सिर्फ सुनने, उसके विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाने, रिपोर्ट करने और उसकी व्याख्या करने का है।

लेकिन ‘आॅफ द रिकार्ड’ बातें आमतौर पर तथ्यों को लेकर अनौपचारिक संवाद के जरिए समझ बनाने में सहायक होती हैं। कई बार ऐसी बातों से पत्रकारों को किसी मसले या घटनाक्रम पर नई जानकारी मिलती है, जो विभिन्न कारणों से आधिकारिक बयानों या प्रेस ब्रीफिंग से नहीं मिलतीं। पर यह भी सही है कि कई बार ऐसी बातचीत में तरह-तरह की खबरें ‘प्लांट’ कराई जाती हैं। हर जगह ऐसा होता है। अमेरिकी हुक्मरानों ने बीते कुछ दशकों के दौरान ईरान, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया, निकरागुआ, वेनेजुएला, क्यूबा, रूस, चीन सहित अनेक मुल्कों को लेकर कई ‘बड़ी खबरें’ प्लांट करार्इं। ऐसी खबरों को आधार बना कर अमेरिकी शासकों ने अपनी भावी रणनीति का निर्धारण भी किया।

कई बार पत्रकार और उसकी पत्रकारिता निहित स्वार्थ आधारित किसी राजनीतिक-कूटनीतिक या व्यावसायिक दुरभिसंधि का शिकार बनती है। कभी अनजाने में भी ऐसा होता है, पर ज्यादातर मौकों पर पत्रकार और उसका संस्थान खुद निहित स्वार्थ की ऐसी योजनाओं का हिस्सेदार होते हैं, तब ऐसा घटित होता है। पत्रकारिता के पेशे के साथ इससे बड़ी दुर्घटना और कुछ नहीं। लेकिन सामान्य परिस्थिति में, जिसमें स्वयं पत्रकार और उसका संस्थान ऐसी किसी योजना का हिस्सा न हों, यह पत्रकार-विशेष पर निर्भर करता है कि वे निहित स्वार्थ से प्रेरित ‘आॅफ द रिकार्ड’ संवादों में किनका, कैसा उपयोग करे! यह पत्रकारिता के पेशे का अपना आंतरिक मामला है। इस बारे में पत्रकार किसी राजनेता, व्यवसायी या धर्मगुरु से उपदेश या निर्देश क्यों लें?

किसी बाहरी हस्तक्षेप के लिए इसमें कोई जगह नहीं बचती। जहां तक पत्रकार की नागरिकता या राष्ट्रीयता का सवाल है, निस्संदेह वह किसी न किसी देश का नागरिक है, लेकिन इससे उसके न्यूज-कवरेज के चरित्र की कोई खास राष्ट्रीय पहचान नहीं बनती। अगर कोई पत्रकार अपने देश या दुनिया के किसी भी हिस्से में अपनी या किसी अन्य देश की सरकार या फौजों की तरफ से मानवाधिकार हनन, ज्यादती या अन्यायपूर्ण आचरण देखता है तो क्या वह सिर्फ इसलिए उसे खबर नहीं बनाएगा या उसकी उल्टी तस्वीर पेश करेगा कि यहां खुद उसका देश या उसकी कोई पसंदीदा सरकार शामिल है?

हर क्षेत्र की तरह पत्रकारिता में भी तमाम तरह की विकृतियां देखी जा सकती हैं, पर पत्रकारिता में गुणवत्ता और जवाबदेही का तकाजा है कि निहित स्वार्थ या संकीर्ण राजनीतिक हितों के आधार पर किसी घटनाक्रम की रिपोर्टिंग नहीं होनी चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं वे पत्रकार के नाम पर अपनी सरकार, सेना या सत्ता-तंत्र की किसी अन्य एजेंसी की तरफ से कहीं ‘नत्थी’ जरूर हो सकते हैं, पत्रकार हरगिज नहीं। इस मायने में पत्रकार के लिए कोई सरहद नहीं होती। वह मनुष्यता का संदेशवाहक है।

(जनसत्ता से साभार)

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