मीडिया की खुद की रीढ़ कितनी मजबूत है ?

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नीतिश का  मीडिया मैनेजमेंट

बिहार में मीडिया की स्थिति और सरकारी दबदबे,अंकुश को लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद चैनलों ने लोकतंत्र के चौथे खंभे को लेकर फिर से बहस शुरु कर दी है. मार नीतिश सरकार को कोसने,गरिआने का काम युद्ध स्तर पर जारी है. मुझे इससे न तो कोई दिक्कत है और न ही मैं नीतिश के उन तमाम रवैये के प्रति किसी भी तरह की सहमति रखता हूं जिसमें उन्होंने अखबारों को विधान सभा की इनहाउस मैगजीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन सरकार की आलोचना हो इसके पहले मैं सिर्फ एक सवाल रख रहा हूं- आप बताइए तो सही कि किस राज्य में,यहां तक कि किस देश की सरकारें मीडिया को मैनेज करने,दबाने,कुचलने और पैसे के दम पर अपने पक्ष में बनाने का काम नहीं करती है..फिर ये खबर कब-कब और कितनी बार आपने अखबारों और चैनलों में देखा ? अगर रिपोर्ट न भी आती तो क्या नेशनल चैनलों और अखबारों के जो ब्यूरो बिहार में काम कर रहे हैं, उन्हें इन सब बातों की कोई जानकारी नहीं थी लेकिन एकदम सन्नाटा. इतना ही नहीं, इन सरकारी विज्ञापनों और टुकड़ों के दम पर कई टटपुंजिए चैनलों और अखबारों ने दनादन ब्यूरो खोलने और संस्करण निकालने शुरु किए. उठा कर देख लीजिए दैनिक जागरण,हिन्दुस्तान,दैनिक भास्कर और प्रभात खबर भी, आपको अंदाजा लग जाएगा कि कैसे ये अखबार सरकार की तो छोड़िए औने-पौने छोटे-मोटे व्यवसायियों और उन्हें द्वारा आयोजित जागरण,संध्या वंदना की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते आए हैं. कितनी बार आवाज उठाया मीडिया ने कि मेरा दम घुट रहा है, यहां पत्रकारिता मर रही है..नहीं,इक्का-दुक्का घटना को छोड़कर कभी नहीं. बताएं तो सही कि दिल्ली-नोएडा डेस्क ने निगेटिव स्टोरी होने पर किस तरह कुचला है और डस्टबिन में डाल दिया है.

 

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आज नहीं, आज से एक साल पहले इसी फरवरी महीने में जस्टिस काटजू ने जब पटना का दौरा किया तो बताया कि बिहार में मीडिया के हाथ बंधे हुए हैं,आजाद नहीं है. इसके बाद आपने इस पर कितनी बार चर्चा देखी-सुनी..उल्टे नामचीन टीवी और अकादमिक दुनिया के चेहरे वहां सरकार के पैसे से आयोजित सेमिनारों में जाकर चारण-वंदना कर आए. सवाल बिहार में सरकार द्वारा मीडिया को मैनेज करने का नहीं है, सवाल उससे भी बड़ा है कि मीडिया की खुद की रीढ़ कितनी मजबूत है कि वो इसका प्रतिरोध कर पाते हैं ?

दूसरा कि अब अगर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 11 महीने लगाकर रिपोर्ट तैयार की है तो इसमें मीडिया के चरित्र की व्याख्या किस तरह से होगी ? क्या मीडिया इतना मासूम बबुआ है कि उसे जैसे-जैसे नीतिश सरकार ने मैनेज करने की कोशिश की,होता गया. कहां तो ये अपने को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहता आया है और कहां एक राज्य की सरकार से मैनेज हो जाता है. अगर ऐसा है तो इसके प्रति हमदर्दी जताने के बजाय इसकी कड़ी आलोचना की जानी चाहिए कि अग आपकी रीढ़ इतनी कमजोर है तो ऐसे दावे करने छोड़ दें.

आप याद कीजिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की उस रिपोर्ट को जिसमें दैनिक जागरण और अमर उजाला सहित दर्जनभर अखबारों के इस धंधे में शामिल होने की बात रिपोर्ट में शामिल की गई. नतीजा प्रेस काउंसिल पर इस रिपोर्ट से अखबारों के नाम हटाने के दवाब बनाए गए. नाम हटाए भी गए और रिपोर्ट मरी हुई मछली की तरह मेनस्ट्रीम मीडिया के बीच तैरती रही. बाद में करीब एक साल बाद जस्टिस काटजू ने उस रिपोर्ट को जारी किया. इधर चुनाव आयोग ने संबंधित विधायक उमलेश यादव की अगले पांच साल के लिए चुनाव लड़ने की योग्यता खत्म कर दी लेकिन अखबार….? अखबार उसी तरह सीना तानकर खड़ा है और उसमें वही सारे नामधन्य पत्रकार,स्तंभकार लेख लिख रहे हैं, जिन्होंने की गर्दन की नसें फुला-फुलाकर पेड न्यूज का विरोध किया था.

ऐसे में सवाल सिर्फ बिहार सरकार का मीडिया पर अंकुश लगाना और मैनेज करने का नहीं है, सवाल है कि स्वयं मीडिया उनके आगे बिछने के बजाय किस तरह का प्रतिरोध करता आया है ? बार-बार बिहार कह देने भर से ये मामला बिहार भर का नहीं रह जाता. मैंने खुद एनडीटीवी इंडिया की एक परिचर्चा में महाराष्ट्र के एक सांसद की लेटरपैड पर लोकमत समाचार के लिए विज्ञापन मांगते दिखाया था. पंजाब में पीटीसी न्यूज और शिरोमणि अकाली दल के खेल से आप सब परिचित हैं. हमें ये बात किसी भी स्थिति में नहीं भूलनी चाहिए कि जब तक आप मीडिया को एक पार्टी की तरह, बराबर का दोषी माने बिना मीडिया की आजादी पर बहस करते हैं, तब तक आप सिर्फ मेनस्ट्रीम मीडिया के सिरे से ही सोचकर सरकार को कोसते रहेंगे. नीतिश सरकार ने हिन्दुस्तान,दैनिक जागरण के बिहार संस्करण को मैनेज करने की कोशिश की, देश के बाकी संस्करण तब क्या कर रहे थे, राष्ट्रीय संस्करण तब इस बात पर कितनी आपत्ति जता रहे थे, कितने अखबारों और चैनलों ने खुलेआम घोषणी की कि इस राज्य में हमारा रहना असंभव हो गया है, केन्द्र सरकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में बात करनेवाले लोग आगे आएं. नहीं तब वो गुपचुप तरीके से सरकार के साथ समझौते पर समझौते करते रहे, व्यावसायिक रणनीति तैयार करते रहे और अब जब रिपोर्ट आयी है तो ऐसे बहस कर रहे हैं जैसे वो भारत के मीडिया यानी अपने आप के बारे में नहीं पाकिस्तान में मीडिया की स्थिति पर बात कर रहे हों.

तीसरी जरुरी बात कि जब चैनलों पर इस रिपोर्ट को लेकर बहस हो रही है तो मीडिया और सरकार को ऐसे अलगकार देख रहे हैं जैसे सचमुच इतना अलग होकर काम होता है ? क्या प्रेस काउंसिल ने इस रिपोर्ट में मीडिया ऑनरशिप को लेकर अलग से कोई सूची जारी की है, बताया है कि किस विधायक का,किस सांसद का पैसा किस अखबार,चैनल में लगा है. किस कार्पोरेट के श
ेयर किस चैनल और मीडिया संस्थान में लगे हैं ? मुझे उम्मीद तो नहीं है कि काउंसिल ने इस दिशा से भी सोचने का काम किया होगा ? अगर इस सिरे से रिपोर्ट बनायी जाती है तो मीडिया और सरकार या राजनीतिक व्यक्ति एक दूसरे से बिल्कुल अलग दिखने के बजाय एक ही दिखेंगे..ये बहस मीडिया की आजादी की नहीं, सरकार और कार्पोरेट मीडिया के बीच के गणित के गड़बड़ा जाने का मामला ज्यादा है या फिर उस गणित पर जस्टिस काटजू की नजर पड़ने का ज्यादा है.

मुझे पूरा यकीन है कि इस रिपोर्ट को लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया एक-दो दिन तक हो-हो करेंगे, सरकार के खिलाफ माहौल बनाएंगे और ऐसा करते हुए अपनी ही पीठ ठोकेंगे और उसके बाद मैनेज होने की दरें पहले से ज्यादा बढ़ेगी क्योंकि ये मुद्दे और सरोकार को लेकर मीडिया की तरफ से किया जानेवाला विरोध नहीं है बल्कि अपने ही राजस्व के मॉडल पर कुल्हाड़ी मारनी है और जाहिर है मेनस्ट्रीम मीडिया इतना वेवकूफ नहीं है. आप खुद सोचिए न प्रकाश झा जैसा फिल्मकार जिसने एक के बाद एक बिहार की बदहाली,अपराध और भ्रष्टाचार पर फिल्में बनायी लेकिन जब मौर्या टीवी लांच किया तो उसी बिहार में टीआरपी के लिए केबल ऑपरेटरों को इस तरह से मैनेज किया कि आप मौर्या टीवी के अलावे कुछ और देख ही नहीं सकते थे और चैनल नंबर वन हो गया. तो जब एक फिल्मकार इतना तिकड़मी हो सकता है तो बाकी जो धंधेबाज मीडिया चला रहे हैं, वो क्या सदाव्रत खोलकर बैठे हैं. जब तक आप मीडिया और उस पर आयी इस तरह की रिपोर्ट में मेनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े नहीं करते, “चौथा खंभा” बचाने के नाम पर रायता फैलाने का उनका काम जारी रहेगा.

(विनीत कुमार- युवा मीडिया समीक्षक, टीवी कॉलमनिस्ट( तहलका हिन्दी) और मंडी में मीडिया किताब के लेखक.)

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