बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष चंद्रभूषण राय और पटना प्रवास से जुड़ी मेरी यादें

0
444

श्रीकांत सौरभ

किसी भी पद के लिए चयन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है उसकी गरिमा को बचाएं रखना. और यह तभी मुमकिन है जब उस पद पर किसी योग्य व्यक्ति को चुना जाए. ‘बिहार भोजपुरी अकादमी’ भी एक मर्यादित संस्था है. जिसका जुड़ाव या यूं कहें कि सरोकार करीब 20 करोड़ भोजपुरी भाषियों से है. पिछले दिनों अकादमी के अध्यक्ष बक्सर निवासी रविकांत दूबे ने लखनऊ की अवधी-भोजपुरी गायिका मालिनी अवस्थी को संस्था का ब्रांड एम्बेसडर क्या बनाया. अच्छे-खासे विवादों में घिर गए. चौतरफा आलोचनाओं में घिरे रविकांत दूबे का कार्यकाल तीन वर्ष पूरा होते ही पद छोड़ना पड़ा. फिलहाल इनकी जगह जदयू के सक्रिय युवा कार्यकर्ता चंद्रभूषण राय को अध्यक्ष चुना गया है. इस बारे में मैं और कुछ लिखूं यहां स्पष्ट करना चाहुंगा.

मैं खुद भोजपुरी भाषी इलाके मोतिहारी से हूं. मेरा ननिहाल व ससुराल पश्चिमी चंपारण (बेतिया) है. इसी कारण भोजपुरी मेरे रग-रग में रची बसी है. भोजपुरी से इस कदर लगाव है कि मैं किसी से तब तक हिंदी में बात नहीं करता. जब तक इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ ना हो जाऊं. कि सामने वाला बंदा भोजपुरी नहीं समझ सकता. हालांकि अपनी इस आदत के कारण कई बार शर्मिन्दा भी हुआ हूं. क्योंकि यह जानते हुए कि अगला भोजपुरी जानते हुए भी मुझे हिंदी में जवाब दे रहा है. काफी ग्लानि महसूस होती. पर गुजरते वक्त और भोजपुरिया सुद्दिजनों की संगत में इतना परिपक्व जरूर हो गया हूं. कि अब किसी से भी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी मातृभाषा में बात करता हूं. इस हद तक कि सामने वाला खुद मजबूर होकर भोजपुरी में बात करने लगे. सही भी है जब मारीशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका आदि जगहों पर कई वर्षों पहले जाकर बस गए लोग अपनी भाषा नहीं भूले. तो मैं क्यों ना इस पर गर्व करूं.

कुछ चीजों को बताने के लिए गुजरे अतीत की जिक्र यहां अवश्य करना चाहुंगा. वर्ष 2002-10 तक अकादमिक पढ़ाई के लिए अपने पटना प्रवास के दौरान वर्ष 05 में पत्रकारिता से जुड़ा. वह भी हिंदुस्तान, पटना के फीचर डेस्क से एक फीचर लेखक के तौर पर. इस दौरान महेन्द्रू के बाजार समिति में रहते हुए छपरा, आरा, सासाराम, कैमूर, बक्सर, बलिया व बनारस आदि भोजपुरी क्षेत्रों के लड़कों से संगत हुई. फिर तो जब भी चंडाल चौकड़ी बैठती जमकर भोजपुरी में बहस चलती. साथ ही निर्गुण, दू गोला, सोहर, पूर्वी से लेकर लोकगीत तक गाए जाते. इन्हीं के शागिर्द में ठेठ भोजपुरी बोलना भी सीख गया. यह बात भी जेहन में अच्छी तरह समझ में आ गई कि गंगा के पार उत्तरी जगहों सारण, चम्पारण, दक्षिण में शाहाबाद और यूपी के पूर्वाचल वाली भोजपुरी में क्या विविधता है?

तब हिद्स्तान के फीचर संपादक व पत्रकारीय गुरू श्री अवधेश प्रीत से भोजपुरी में अभिवादन करते हुए ‘गोड लागअ तानी’ कहता तो वे ठठाकर हंसते. इसलिए की मुझे पता था वह भी गाजीपुर से हैं और भोजपुरी पर उनकी अच्छी पकड़ है. इसी दरम्यान पटना में रह रहे बलिया निवासी पत्रकार व रंगकर्मी हरिवंश तिवारी से मुलाकात हुई. उनका बोरिंग रोड में ‘भिखारी ठाकुर स्कूल ऑफ़ ड्रामा’ नामक संस्थान संचलित था. उनसे भी महेंद्र मिश्र व भिखारी ठाकुर की रचनाओं के बारे में बहुत-कुछ जानने को मिला. वर्ष 07 में भोजपुरी.कॉम वेबसाइट व इसके मॉडरेटर सुधीर कुमार से रू-ब-रू हुआ. निश्चय ही उन दिनों यह भोजपुरी का पहला समर्पित व चर्चित पोर्टल था. भोजपुरी गायक व अभिनेता मनोज तिवारी पर नीदरलैंड सरकार द्वारा जारी डाक टिकट के फर्जीवाड़े के खुलासे व ऑनलाइन छठ पूजा के प्रसाद वितरण के कारण यह वेबसाइट काफी सुर्ख़ियों में था. बाद के दिनों में इसी पोर्टल पर रविकांत दूबे के बारे में छपी कई तरह की नकारात्मक खबरों से वाकिफ हुआ. और धीरे-धीरे आम लोग भी उनके काले-कारनामे को जानने लगे. यहां तक की श्री दूबे के गृह शहर बक्सर में भी उनका विरोध हुआ.

ये तो हुई रविकांत दूबे की बात. जहां तक वर्तमान अध्यक्ष चंद्रभूषण राय के बारे में मेरी जानकारी है. मैं उनसे पटना के राजेंद्र नगर स्थित विपिन पतंजलि के ‘नव जीवन योग’ केंद्र में अक्सर मिलते रहता था. पर यह मुलाकात औपचारिक ही होती थी. योग गुरू विपिन जी ने ही मुझसे उनका परिचय एक कर्मठ जदयू नेता व श्रीश्री रविशंकर के शिष्य के तौर पर करवाया था. लंबा कद, गोरे चेहरे पर बेमेल चिरकुटिया दाढ़ी पर रोबीला व्यक्तित्व और आरा के होने के कारण भोजपुरी भाषी, यहीं पहचान थी उनकी. शायद कुंवारे भी रहे होंगे. तब राय जी बगल के संदलपुर छात्रावास में रहते थे. एक हीरो हौंडा डबल एस बाइक भी रखे हुए थे घूमने के लिए. कुछ वर्ष पहले ही नितीश कुमार सत्ता में आए थे. हालांकि राय जी को कोई जिम्मेवार पद उस वक्त तक पार्टी ने नहीं दिया था. लेकिन पार्टी के सत्ता पक्ष में होने की बात ही और होती है. इसी कारण वे भी काफी व्यस्त हो गए. बाद के दिनों में विपिन जी दिल्ली चले गए. और मैं मोतिहारी चला आया.

आज सुबह अपने परिचित व तहलका के पत्रकार निराला के फेसबुक वाल पार चंद्रभूषण राय के बारे में पढ़ा. कि उन्हें रविकांत दूबे के बाद भोजपुरी अकादमी का अध्यक्ष चुना गया है. मैंने फोन कर उन्हें बधाई दी. और पुराने दिनों के मुलाकात का हवाला दिया तो वे पहचान भी गए. खैर, अब मैं मूल मुद्दे पे आना चाहुंगा. श्री राय के अध्यक्ष पद पर चयन होते ही सोशल साइट्स पर उनके बारे में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई है. एक जागरूक लोकतंत्र में ऐसी चर्चाओं का होना स्वाभाविक भी है. वैसे भी पूर्व अध्यक्ष श्री दूबे की ओछी हरकतों से खार खाए बुद्दिजीवियों में कई तरह की चिंताओं का होना भी जायज है. ऐसे में यह बड़ी चुनौती है चंद्रभूषण राय के लिए कि पद के गलैमर में ना उलझ ग्रास रूट पर भोजपुरी की उत्थान की दिशा में क्या कर पाते हैं?

चाहे भोजपुरी को संविधान की अष्टम अनुसूची में जगह दिलाने की बात हो, भोजपुरी फिल्मों व गानों में में अश्लीलता पर रोक लगाने या बिहार में भोजपुरी फिल्म स्टूडियो खुलवाने की पहल हो. करने के लिए बहुत कुछ है अकादमी के पास. इसके लिए इस समाज के अनुभवी व योग्य व्यक्तियों से परामर्श लेना पड़े तो उन्हें गुरेज नहीं करना होगा. खुद को एक बेहतर प्रशासक साबित करने के लिए एक मिशन के तौर पर काम करना होगा उनको. वरना पावर की चकाचौंध में मदमस्त होकर पद के दोहन करने वाले का हश्र क्या होता है? यह हर कोई जानता है.

(लेखक श्रीकांत सौरभ ‘मेघवानी ब्लॉग’ के मॉडरेटर है. यह आलेख वहीँ से साभार है. उनसे मोबाइल नंबर- 9473361087 पर संपर्क किया जा सकता है)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.