क्या बेरोजगार युवाओं से भी बड़ी खबर है जिंटा- वाडिया की ?

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सुजीत ठमके

पिछले सप्ताह महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से दो बड़े खबरे आई। एक खबर थी बॉलीवुड अदाकारा एवं किंग-११ के आईपीएल टीम की ऑनर प्रीटी जिंटा और उद्यमी नेस वाडिया की। दूसरी खबर थी मुंबई में पुलिस भर्ती के लिए आये लाखो बेरोजगार युवाओ की। पुलिस भर्ती के समय फिज़िकल परीक्षा के दौरान ४ बेरोजगार युवाओ की मौत। कई बेहोश हो गए। और कई निराश हताश होकर घर लौटे। यह युवा घर से तो आये थे कई उम्मीदों के साथ किन्तु हार गए ज़िंदगी की जंग। पुलिस भर्ती को लेकर कमिश्नर राकेश मारिया और राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटिल पर कई संगीन आरोप लगे। गृहमंत्री ने बयान दिया भविष्य में जब कभी पुलिस भर्ती होगी तब सभी बातो का ख़्याल रखा जाएगा। पुलिस भर्ती के दौरान मारे गए पीड़ित परिवार को ना तो कोई मंत्री ने मुआवजा दिया ना ही उनके परिवार को साहस दिलाने के ढांढस दिखाया। भविष्य में २-४ लाख रुपये पीड़ित परिवार को सरकार दे भी सकती है। क्या जिंदगी की कीमत महज २-४ लाख रुपये है ?सरकार एवं आला अधिकारी बेरोजगार युवाओ के मामले में कितने संवेदनशील है इसका फैसला आप खुद करो। मुंबई से दो खबरों के बीच एक सेतु है। एक खबर ग्लैमर वर्ल्ड से थी इसीलिए नेशनल और क्षेत्रीय मीडिया ने भरपेट कवरेज दिया। बॉलीवुड अदाकारा प्रीति जिंटा और बॉम्बे डाइंग ब्रांड के मालिक नेस वाडिया के बीच झगड़ा। खबर को इतना तूल दिया गया की नेशनल मीडिया ने एफआईआर से भी दो कदम आगे जाकर वाडिया पर कौनसे सेक्शन लगाए गए , घटना कैसे हुई होंगी । नेस वाडिया को कौनसे सेक्शन के तहत गिरफ़्तारी हो सकती है। दोनों का ब्रेक- अप क्यों और कैसे हुआ। वाडिया के कंपनी के कर्मी क्यों आये सड़को पर। किंग-११ में किसकी इतनी हिस्सेदारी है। इस वर्ष प्रॉफिट कितना हुआ। जिंटा कहा शिफ्ट होने जा रही है। वीमेन इम्पावरमेंट को लेकर सरकार क्यों गंभीर नहीं आदी। नेशनल टीवी चैनल्स पर नेस-जिंटा की खबर इतनी चली की राष्ट्रीय महिला आयोग को भी इस मसले को गंभीरता से लेना पड़ा। चैनेलो ने केवल हेडलाइन्स दिखाकर श्रोताओ को इस घटना से अवगत नहीं कराया बल्कि हर २ घंटे के बाद ३० मिनिट का जिंटा-वाडिया पर स्पेशल प्रोग्राम दिखाकर टीवी पत्रकारिता किस स्तर पर पहुंच चुकी है इसका दिवालियापन दिखा दिया।

दूसरी खबर थी मारे गए युवाओ की। जिसकी सूद लेने के लिए कोई नेशनल मीडिया तैयार नहीं है। कुछ मराठी चैनेलो ने इस खबर को गंभीरता से उठाया। किन्तु सरकार और नौकरशाहों पर जितना असर नेशनल मीडिया का होता है उसकी तुलना में उतना असर क्षेत्रीय मीडिया का नहीं होता। महज चंद पदे और डेढ़ लाख बेरोजगार युवा। यह समस्या कितनी विक्राल, भयावह है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है की केवल १२ पास कक्षा की शैक्षिक योग्यता होने के बावजूद एमए, बीएड, एमएससी, एमकाम, एमएड, कुछ इंजीनियरिंग के डिग्री धारक भी भर्ती में शामिल हुए। जी… यह हाल है देश के युवाओ का। जिंदगी की दौड़ जितने के लिए आये युवा जिंदगी गवां बैठे। खबर काफी बड़ी थी किन्तु नेशनल चैनल को लगा इस खबर से कौनसी टीआरपी नहीं आएगी। टीआरपी के अंधी दौड़ ने डेढ़ लाख बेरोजार युवाओ की खबर ना ही हेडलाइन्स बन पाई और ना ही नेशनल मीडिया बेहतर स्पेस मिला । गौरतलब है भारत और अमेरिकन सरकार में बेरोजगारी के मसले, नीति, पॉलिसी में जमींन आसमान का फर्क है। अमेरिका में मजदूरो को प्रति घंटा १३ यूएस डॉलर यानी ७८० रुपये आय होती है। कुछ संघठनो के मांगो के चलते अमेरिकन सरकार लगभग १५ यूएस डॉलर यानी ९०० रुपये प्रति घंटा करने पर सोच रही है। अगर ७८० रुपये आय को ८ घंटे में कन्वर्ट किया जाय तो यह आकड़ा जाता है प्रति दिन ६२४० रुपये। चुकी अमेरिका मानवाधिकार के मामले में काफी सख्त है। अगर महीने के बीस दिन में कन्वर्ट होता है तो जाता है १ लाख २४ हजार ८०० रुपये। अगर साल में कन्वर्ट होता है तो अमेरिका के मजदूर का पैकेज होता है १४ लाख ९७ हजार ६०० रुपये। भारत में शहरी इलाके में एक मजदूर की आय है ३०० रुपये प्रति दिन। अगर यह आकड़ा २० दिन में कन्वर्ट होता है तो महीने में जाता है ६००० रुपये। साल में कन्वर्ट होता है तो ७२ हजार रुपये। अमेरिका के एक मजदूर को जितना सालाना पैकेज मिलता है उतना पैकेज भारत के बढे स्तर के वैज्ञानिक, सेक्रेटरी लेवल के लोगो को मिलता है। दरअसल सरकार किसी की भी रही हो पिछले ६० वर्षो में बेरोजगारी को लेकर किसी भी सरकार ने स्पष्ट रोडमैप बनाया ही नहीं। स्माल और मीडियम स्केल मंत्रालय हो या हर जिले में बनाया गया एम्प्लोमेन्ट एक्सचेंज ऑफिस, या सिडबी बैंक यह महज एक सरकारी दफ्तर है। बेरोजगार युवाओ के लिए अब तक के बजेट में भी कोई प्रावधान नहीं है। विकसित देशो में बेरोजगार युवाओ को सरकार द्वारा विशेष रूप से बिना ब्याज ऋण दिया जाता है। भारत में बेरोजगार किसी बैंक में लोन माँगने के लिए जाते है तो बैंक के अफसर उनके तरफ संदेह के नजर से देखते है। देश के १० बड़े उद्यमी विजय माल्या समेत बैंको का १ लाख हजार करोड़ गबन कर चुकी है किन्तु ना तो सरकार उनका कुछ बिगाट पाती नाही बैंक के अफसर। किन्तु देश के बेरोजगारो को बैंक लोन देने से मना करती है। देश में बेरोजगारी का आकड़ा काफी बड़ा है। पिछले ६० वर्षो में किसी भी सरकार ने इस मसले को गंभीरता से लिया नहीं। ऐसेमे मुंबई पुलिस भर्ती में आये डेढ़ लाख बेरोजगार युवाओं से भी बड़ी खबर बनी जिंटा- वाडिया की। क्या बेरोजगार युवाओं से भी बड़ी खबर हो सकती है जिंटा- वाडिया के बीच की दरार ?

@सुजीत ठमके

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