बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है

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बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है
बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है
बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है
बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है




इटली में भूकंप से आयी तबाही पर बीबीसी संवाददाता जेनी हिल जब बोल रहीं थी तो लग रहा था वो खुद भी गहरे सदमे में है. आवाज में कोई अलग से प्रॉप्स नहीं, न ही मेलोड्रामैटिक अंदाज.

बावजूद इसके आप देखते हुए,चेहरे के हाव-भाव से ही अंदाजा लगा लेते हैं कि कोई शोक से जुड़ी खबर है. टीवी की यही ताकत है जो हमारे चैनल तेजी से खोते चले जा कहे हैं. वो हम दर्शकों की बौद्धिक क्षमता पर यकीन ही नहीं करते.

उन्हें कृष्ण जनमाष्टमी से जुड़ी खबर दिखाने के लिए वैसी ही कॉस्ट्यूम पहनने की जरूरत पड़ती है. मानो उसके बिना वो एक वाक्य तक नहीं बोल पाएंगे. बाढ़ की विभीषका दिखाने के लिए रोमांटिक अंदाज मे नाव की सवारी करनी पड़ जाती है.

जिसे आप और हम लाइव और ग्राउंड जीरो रिपोर्टिंग समझकर सराह रहे होते हैं वो दरअसल टेलिविजन की ताकत की सांकेतिक हत्या हुआ करती है.

(मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से)




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