अर्णब गोस्वामी के नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू के बाद जागा बीबीसी !

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मनमोहन भारत के प्रधानमंत्री थे तो इंटरव्यू के सवाल और जवाब यही तक सिमटते थे कि राहुल आएंगे तो पद खाली कर दूंगा या उन्हें मंत्रीमंडल में आकर अपने अनुभव का लाभ देश को देना चाहिए। बीबीसी ने कभी उन इंटरव्यू पर गौर नहीं किया जो राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के जरिए लिए जाते थे।

वेद उनियाल,वरिष्ठ पत्रकार

वेद विलास उनियाल
वेद विलास उनियाल

बीबीसी का मानना है कि वह पत्रकारिता में निरपेक्षता उत्तरदायित्व स्वतंत्रता को अहमियत देता है। इसी नाते बीबीसी ने कारवां के राजनीतिक संपादक श्री हरतोष बल से बातचीत के आधार पर एक आलेख बनाया। क्या यह आलेख भी अपने आप में प्रोयोजिहत नहीं लगता। इससे पहले बीबीसी ने कभी ऐसी पहल की है किप किरससि प्रधानमंत्री से पूछे गए प्रश्न कैसे थे। हम इसे कारवां के एडिटर के आलेख नहीं बल्कि बीबीसी के एक आलेख के तौर पर ही पढ रहे हैं। क्योकि साफ लगता है कि यह लेख लिखवाया है और बीबीसी की भावनाओं के अनुरूप इसमें बातें कही गई है। उन्होंने बीबीसी डाट काम में कहा है कि टाइम्स नाऊ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अर्नव ने कुछ कठिन सवालों को छोड़ दिया। लगता है कि जैसे इंटरव्यू पहले से तैयार हो। कुछ सवालों के परिप्रेक्ष्य में ऐसा हो सकता है । बीबीसी इस इंटरव्यू के प्रसारित होते ही जिस तरह जाग उठा, वह भी अचरच भरा है। बीबीसी की अपनी खुद की कार्यप्रणाली में कदम कदम पर झोल दिखते हैं। हां, मार्क टुली की बात कुछ और थी।

1- बीबीसी की लंबी पारी में आज तक नहीं देखा कि जब ये सवाल उठा हो कि किस पत्रकार को क्या पूछना चाहिए था या क्या छूट गया। बीबीसी ने जो बातें उठाईं हैं वो उनके अपने मापंदडों में भी खरी नहीं उतरती। जब श्री मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे तो इंटरव्यू के सवाल और जवाब यही तक सिमटते थे कि राहुल गांधीजी आएंगे तो पद खाली कर दूंगा या उन्हें मंत्रीमंडल में आकर अपने अनुभव का लाभ देश को देना चाहिए। बीबीसी ने कभी उन इंटरव्यू पर गौर नहीं किया जो राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त आदि के जरिए लिए जाते थे। बेशक सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं थी, या प्रियंका राजनीति में नहीं थी। लेकिन एनएसी के बतौर किस तरह सोनिया गांधी का वर्चस्व प्रधानमंत्री से उपर था , देश से छिपा नहीं। बीबीसी की अपनी क्या भूमिका थी। जब प्रश्न यह भी होते थे कि सोनियाजी क्या खाना पसंद करती है। जवाब अरहल की दाल ही मिलना था। जहां प्रियंका गांधी से सवाल होता है कि स्व इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व के ज्यादा निकट कौन है आप या राहुल । जाहिर है जवाब यही मिलता कि राहुल गांधी क्योंकी चुनाव में राहुल गांधी को ही लोगों के समक्ष खड़ा होना था। भारत में सुविधाजनक सवालों की शैली प्रधानमंत्री तक ही नहीं आती, वह मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेताओं तक भी आती है। लेकिन बीबीसी नहीं बता पाया कि अरविंद केजरीवाल के संसदीय सचिव केकिस्से और तीन बड़े घोटालों के आरोपों के बीच उसने प्रश्नों की कोई सूची तैयार की है या नहीं। निरपेक्ष पत्रकारिता का दंभ भरने वाली बीबीसी ने अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में जब देश संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर बहस कर रहा था तब एक छोटी सी खबर बना कर टाल दिया। बीबीसी पूछ पाई अरविंद केजरीवाल से जिन चीजों की आलोचना करते हुए आप पार्टी को खडा किया गया था, राजनीति के वही सस्ते और भद्दे नुस्खे आपने भी क्यों अपना लिए।

2- बीबीसी की निरपेक्ष पत्रकारिता नहीं बता पाएगी कि मुलायम सिंह या अखिलेश से कोई ऐसा इंटरव्यू कर पाए हैं कि जिसमें पूछा जाता कि परिवार के 28 लोगों को सुख देना ही क्या समाजवाद है। न हीं बिहार मे नितिश के सत्ता संभालने के बाद के बिखरते राजकाज और माहौल पर कोई धारदार इंटरव्यू की तैयारी बीबीसी कर पाया। क्या स्वतंत्र पत्रकारिता की बात करने वाले बीबीसी ने कभी मायावती के सत्ता में रहते कोई इंटरव्यू लेने की कोशिश की।

3- बीबीसी डाट काम में कहा गया प्रधानमंत्री को एनएसजी पर चीन केसामने गिड़गिड़ाना पड़ा। क्या बीबीसी जैसा स्थापित संस्थान एनएसजी के सदस्य देशों के प्रावधानों से अंजान है। क्या बीबीसी को नहीं लगता कि भारत को एनएसजी में शामिल होने के लिए ऐसे माहौल को बनाना ही पड़ेगा। उसमें हर सदस्य की अपनी अहमियत है फिर चीन का तो बीत ही अलग। क्या वार्ता के बजाय भारत के प्रधानमंत्री को चीन के प्रमुख से आंख तरेर कर कहना चाहिए था कि एनएसजी में उनकी सदस्यता पर रोड़े अटकाए तो लाल सागर के पास निपट लेंगे। अजब इसी युद्ध के डेढ दशक बाद राजीव गांधी की चीन यात्रा पर गए तो इसी बीबीसी ने कहा था कि जमी बर्फ टूटी है। आखिर कहीं से तो कोशिश करनी पडेगी। तब बीबीसी को राजीव गांधी गिड़गिडाने वाले प्रधानमंत्री नजर नहीं आए।

4- सोनियाजी ने प्रेस को आज तक समय नहीं दिया है। वह हमेशा राजपरिवारों की तरह टीवी मीडिया के माइक सामने लाने पर दो तीन लाइन का कोई व्यक्तत्व देकर आगे बढ जाती थी। उनकी डेढ़ दशक की राजनीति में क्या किसी बड़ी प्रेस काफ्रेस की याद है बीबीसी को। क्या बीबीसी ने अपने निरपेक्ष स्वतंत्र पत्रकारिता के नाते कभी यह सवाल उठाया। उठाया होता तो आज उनकी बात और अच्छी लगती। लेकिन अचानक उन्हें बोध कैसे हुआ कि कोई पत्रकार क्या पूछे और क्या नहीं।

5- बीबीसी डाट काम को लगता है कि अर्णव गोस्वामी को रिर्जव बैंक के गर्वनर मुक्त प्रशसा होने पर दूसरी पारी न दिए जाने पर सवाल करना चाहिए था। बेशक सवाल हो सकता है। लेकिन मुक्त प्रशंसा तो भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम की भी हुई थी। क्या बीबीसी ने इसपर किसी कांग्रेसी नेता का साक्षात्कार लेने की जरूरत समझी कि प्रखर वैज्ञानिक और चिंतक को राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी एक बार और क्यों नहीं सौंपी गई।

6- बीबीसी पत्रकारिता की जिम्मेदारी की बात करती है लेकिन लालू यादव के प्रसंग पर बीबीसी में ज्यादातर चुटकीले, हास परिहासों , जुमलों के आसपास बीबीसी की खबरे घूमती रही । बिहार के लोगों की दिक्कत मुश्किले और सत्ता के अपने तिकडम चालाकियां ये बीबीसी के लिए खबर नहीं बने। यहां तक कि बिहार के लोग मुंबई में कह कह कर अपनानित होते रहे लेकिन बीबीसी ने कभी रिपोर्ट नहीं दी कि किस अदूरदर्शी अयोग्य नेतृत्व के चलते बिहार को ऐसा सहना पडा। क्या कभी बिहार की सत्ताओं के तौर तरीकों पर बीबीसी सवाल उठा पाया। कया लालू से पूछा कि परिवार के हर सदस्य को संसद विधानसभा में लाकर लोहिया और जयप्रकाश नारायण को किस तरह याद कर पाते हो। जिन्होंने कहा था सिंघासन खाली करो कि जनता आती है। क्या बीबीसी लालू के परिवार को ही भारत की जनता मानती है।

7- बीबीसी डाट काम में कहा गया है कि कि आखिर सुब्रमण्यम स्वामी को राज्यसभा में नरंद्र मोदी तो लेकर आए हैं। बेशक लाए हैं लेकिन देश का प्रधानमंत्री ने सीधे टिप्पणी भी तो की है कि प्रचार के लिए गलत संवाद न किया जाए। हां स्वामी उनकी बात न माने तो अगले इंटरव्यू में ये पूछा जा सकता है कि प्रधानमंत्रीजी आपकी बात पर गौर नहीं हुआ। लेकिन यह प्रश्न क्या कि लाएतो आप ही थे। क्या स्वामी किसी अपराधिक मामले से जुड़े हैं कि प्रधानमंत्री पर सवाल हो कि आप उन्हें राज्यसभा में लाए थे।

8- बीबीसी ने यब बात उठाई है कि राहुल गांधी के समय अर्णव गोस्वामी बहुत अलग तेवर में थे, जबकिउस समय राहुल गांधी की पार्टी सत्ता में थी। क्या बीबीसी को उस समय और हालातों का पता नहीं । एक के बाद एक 36 घोटालों से देश में गहरा आक्रोश दिखता था। प्रधानमंत्री एकदम मौन थे। अन्ना हजारे ने हुंकार भरी थी। ऐसे में बीबीसी क्या अपेक्षा करता है कि अर्णव के सवाल कैसे होने चाहिए थे।

9 – क्या बीबीसी को तब सहज और अनुकूल लगता कि अर्णव की जगह आकार पटेल टाइम्स नाऊ में राहुल गांधी का साक्षात्कार लेते। अर्णव ने सभी महत्वपूर्ण सवालों को उठाया। यह अलग बात है कि विपक्ष में होने पर भी कांग्रेस की स्थिति ऐसी बनी है कि तब भी प्रहार उसी पर हो रहे हैं। बीबीसी को जानना चाहिए कि इसकी वजह क्या है। लगातार एक परिवार की निष्ठा से भरी पत्रकारिता के चलते बीबीसी की साख गिरी है। ऐसा दूसरेमाध्यमों को अब भाजपा के साथ भी नहीं करना चाहिए। पत्रकारिता को वास्तव में निरपेक्ष रहना चाहिए। कम से कम आज बीबीसी यह समझाने की स्थिति में नहीं है कि निरपेक्ष पत्रकारिता किसे कहते हैं। कुछ नहीं तो आकार पटेल के ही पिछले पांच दस लेख पढ लीजिए। लगता है कि जैसे हाथ में ओले लेकर एकतरफा प्रहार करने की मंशा हो। वायस्ड पत्रकारिता विश्वास खोती है। फिर चाहे आकार पटेल हों या आशीष खेतान या दीपक चौरसिया । बीबीसी का मौजूदा ढांचे में निरपेक्ष पत्रकारिता की बात नहीं कर सकते। यह अपने ढंग के थोपे विचारों की दुकान चलाने जैसा है।

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