टीवी हो या अखबार जब तक बलात्कार न हो,खबर नहीं बनती

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आधी आबादी की संपादक ‘मीनू गुप्ता’ से ‘मीडिया खबर’ की खास बातचीत

 

मीनू गुप्ता,संपादक,आधी आबादी
मीनू गुप्ता,संपादक,आधी आबादी

आज आठ मार्च है यानी कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस। आज सभी समाचार पत्रों ने महिलाओं को केंद्र में रख कर अपने परिशिष्ट के पन्ने रंग डाले हैं! इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं। आज महिलाओं के ऊपर कई पत्रिकाएं भी खास तौर पर निकाली जा रही हैं और जिनकी एक लम्बी फेहरिस्त है। ज़्यादातर पत्रिकाएं साज-श्रृंगार और खाने की रेसिपी तक ही सीमित हैं। किसी किसी में फैशन के नाम पर अश्लीलता ऐसे परोसी जाती है कि कई बार अंतर करना मुश्किल हो जाता है कि पत्रिका महिलाओं के लिए है या पुरुषों के लिए। इसी भीड़ में एक नया लेकिन उभरता हुआ नाम है आधी आबादी। यह पत्रिका अपनी तरह की इकलौती सामाजिक, राजनीतिक पत्रिका है जो सिर्फ महिलाओं पर केन्द्रित है। महिला दिवस पर मीडिया खबर ने ‘आधी आबादी’ पत्रिका की संपादक ‘मीनू गुप्ता’ से बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश :

आज मीडिया में महिलाओं पर जिस तरह की सामग्री आ रही है इस पर क्या कहेंगी?
टीवी हो या अखबार इनके लिए महिलाओं के साथ जब तक बलात्कार न हो खबर नहीं बनती! दामिनी या तरुण तेजपाल काण्ड जब हुआ तब तो ये अपनी कंसर्न दिखाते हैं बाकी समय लगता है जैसे नींद में चले जाते हैं। इन्हें हर बार जैसे एक जघन्य अपराध का इंतज़ार रहता है। जैसे महिलाओं के लिए कुछ और है ही नहीं इस दुनिया में। हम अपनी पत्रिका में महिलाओं से जुड़े तमाम मुद्दों पर बात करते हैं। सिर्फ सवाल ही नहीं उठाते समाधान बताने की भी कोशिश करते हैं। बाकी महिला आधारित पत्रिकाएं खाने की रेसिपी या साज श्रृंगार तक ही सिमित हैं हम उनके सपनों और आकांक्षाओं की बात करते हैं। हम उन्हें सम्मान से जीने की रेसिपी देना चाहते हैं। नारी के सम्पूर्ण विस्तार की बात करना चाहते हैं। हम उन्हें ये भरोसा देना चाहते हैं कि वो किसी से कम नहीं!

‘आधी आबादी’ पत्रिका के पीछे आपका क्या उद्देश्य है?
समय तेजी से बदल रहा है, ऐसे में स्त्री जाति को स्वयं ही अपने अधिकार के लिए खड़ा होना होगा। अपनी पत्रिका में हम सदियों से खामोश पड़ी स्त्री के मन की व्यथा को आवाज़ देने के साथ ही उसकी तमाम राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक हलचलों को प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं। आधी आबादी से जुड़े हर मसले को उचित स्थान देते हैं ताकि धीरे-धीरे ही सही लैंगिक भेदभाव की दीवारें कमजोर हों और ये समाज स्त्री-पुरूष के खांचों में बंटे रहने के बजाय इंसानों के रहने के लिए जाना जाए।

कैसा फीडबैक मिल रहा है पाठकों से?
कमाल की बात ये है कि एक महिला केंद्रित होते हुए भी हमारे पास पुरुष पाठक ज्यादा हैं। कभी-कभी लगता है क्या महिलाएं पढ़ती नहीं? मैं समझती हूँ कि ज्ञान ही एक ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर हम अपनी ज़िन्दगी बदल सकते हैं! अभी तो यात्रा शुरू की है, उम्मीद है समय के साथ-साथ अच्छे परिणाम भी देखने को मिलेंगे!

आगे क्या नया कर रही हैं आप?
aadhi aabadi febमैं आपको बताना चाहूंगी कि हम अलग-अलग क्षेत्रों से उन महिलाओं को चुनकर सम्मानित भी करते हैं जो समाज में एक मिसाल बनी। पिछले चार साल से हम आधी आबादी वीमेन अचीवर्स अवार्ड का भी सफलता पूर्वक आयोजन कर चुके हैं। भविष्य में भी ऐसे कई कार्यक्रम और करने की योजना है। इसके अलावा एक मासिक पत्रिका का अस्तित्व भी बनाये रखना एक बड़ी चुनौती है। बाजार की अपनी मांग है, हमारी कोशिश रहेगी कि हम एक संतुलन बनाने की कोशिश करें और जो पत्रिका का मिशन है नारी सशक्तिकरण का उसे साकार करें!

महिला दिवस पर आज की युवतियों और खासकर मीडिया में करियर बनाने की इच्छुक युवतियों के लिए कोई सन्देश?
उतार-चढ़ाव का नाम ही ज़िन्दगी है। हम सबके जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जब उससे बाहर निकलना मुश्किल मालुम होता है। परिस्तिथियों के सामने हमारा विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। एक के बाद एक ऎसी घटनाएं घटती हैं, जो हमारी उर्जा को सोख लेती हैं। उनके सामने हम अपने को बेबस पाते हैं। ऐसे मौकों पर निराश मत होइए। हिम्मत रखिए सकारात्मक परिणाम ज़रूर मिलेंगे!

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