संजय दुबे,विकास बहुगुणा और अतुल चौरसिया ने तहलका हिंदी में जान फूंक दी

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तरुण जीत तेजपाल, संपादक, तहलका

अपने जन्म के समय तहलका अपने ऑनलाइन अवतार में था. तमाम बाधाओं से जूझते हुए इसने एक अंग्रेजी साप्ताहिक के रूप में दोबारा जन्म लिया. लेकिन इसका दिल जिस ताल में धड़कता है वह अंग्रेजीदां नहीं है. दरअसल अंग्रेजी बोलने वाला इस देश का संपन्न तबका क्या खाना-पीना और पहनना-ओढ़ना पसंद करता है या उसकी दिलचस्पी किन जगहों पर छुट्टियां बिताने में है, यह तहलका का सरोकार कभी नहीं रहा. इसके सरोकार हमेशा न्याय और समानता, जल-जमीन और जंगल, शिक्षा और शोषण जैसे जरूरी मुद्दों से जुड़े रहे. इसलिए जैसे भी हो सके तहलका का हिंदी संस्करण निकालना हमारे लिए एक अनिवार्यता थी. शोमा, नीना और मेरा हमेशा से यही मानना था कि हिंदी भाषा में ही तहलका सही मायने में उस व्यक्ति तक पहुंचेगा जिस तक हम इसे पहुंचाना चाहते हैं—भारत के उस आम आदमी तक जो मुश्किलों से जूझ रहा है, जिसकी जिंदगी को राहत चाहिए, जिसकी चिंताएं कोई माध्यम ढूंढ़ रही हैं.

तहलका हिंदी संस्करण का पहला अंकफिर भी हमारी इनवेस्टिगेशन टीम के एक जुनूनी रिपोर्टर के बिना तहलका का हिंदी संस्करण सिर्फ हमारे सपनों में रह जाता. 2008 में नाममात्र के संसाधनों और गगनचुंबी आदर्शों के साथ संजय दुबे ने हिंदी पत्रिका निकालने का अभियान शुरू किया. इंजीनियरिंग में जमा-जमाया करियर छोड़कर पत्रकारिता में आए इस जोशीले युवा को मैं तब थोड़े से प्रोत्साहन और पीठ पर हल्की सी थपकी के अलावा ज्यादा कुछ नहीं दे पाया था. उन्होंने दो और साथी जुटाए जो देखने में हमारे संसाधनों जैसे ही दुबले-पतलेे, लेकिन कार्यक्षमता में असाधारण थे. ये थे विकास बहुगुणा और अतुल चौरसिया. इसके बाद यह तिकड़ी अपने काम में जुट गई और हिंदी संस्करण को सोच से उतारकर जमीन पर ले आई.

आज इस बात को पांच साल हो चुके हैं. मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि इस छोटी सी ही अवधि में इस पत्रिका ने हिंदी पट्टी में एक ऊंचा मानक स्थापित कर दिया है. अपनी अंग्रेजी पत्रिका का जस का तस अनुकरण करने के बजाय इस छोटी सी टीम ने अपनी पत्रकारिता का एक नया मुहावरा गढ़ा और पाठकों के बीच एक अलग पहचान बनाई. इस टीम ने न सिर्फ कई बड़ी खबरें सबसे पहले प्रकाशित की हैं बल्कि शानदार जमीनी रिपोर्ताज और पैनी टिप्पणियों के लिए भी खूब तारीफ बटोरी है. और मैं तो यहां तक कहूंगा कि इसने हिंदी पत्रकारिता में एक नई जान फूंकने का काम भी किया है. अपनी इस छोटी सी यात्रा में ही तहलका के हिंदी संस्करण ने भारतीय पत्रकारिता के लगभग सभी प्रतिष्ठित पुरस्कार अपनी झोली में डाले हैं.

इस टीम की एक असाधारण सफलता यह भी है कि आज तहलका की अंग्रेजी पत्रिका अक्सर ही अपनी कई रपटें हिंदी संस्करण से लेती है और इनका अंग्रेजी में अनुवाद करती है. मुझे संजय दुबे और उनकी इस ड्रीम-टीम पर बहुत गर्व है जिसमें कुछ बेहद प्रतिभाशाली महिलाएं भी शामिल हैं. प्रियंका दुबे उनमें से एक हैं. इस टीम की सफलता एक बार फिर यह याद दिलाती है कि उत्कृष्ट पत्रकारिता दूरदृष्टि, साहस, संकल्प और दिल से निकलती है, न कि पैसे, कागज और आलीशान दफ्तरों से.

(तहलका से साभार)

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