रहा गर्दिशों में हरदम…न किसी का ठौर न ‘सहारा’

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सहारा समय
सहारा समय
MEDIA KHABAR EXCLUSIVE : देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्क होने का दावा करने वाला सहारा मीडिया एक बार फिर अंदरुनी पेंचोखम में उलझा हुआ नजर आ रहा है। तिस पर सहारा नेटवर्क पर चल रहे सेबी और सुप्रीम कोर्ट की चाबुक ने कमोबेश सहारा मीडिया की राह भी मुश्किल कर दी है। मीडिया से इतर सहारा के बड़े साम्राज्य के हिचकोले खाने और इस साम्राज्य के सहारा मीडिया के कामकाज पर पड़ने वाले असर की गहन पड़ताल की जा सकती है। लेकिन फौरी तौर पर सिर्फ सहारा मीडिया के कामकाज पर निगाह डालें तो सवाल उठता है कि आखिर कौन सी वजहें हैं कि बड़े नेटवर्क, अत्याधुनिक मशीनों के जंजाल और बड़ी श्रमशक्ति के बावजूद सहारा मीडिया को वो मुकाम हासिल नहीं हो सका जिस पर आज तक, एबीपी न्यूज या इंडिया टीवी जैसे न्यूज चैनल कायम हैं।
दरअसल, सहारा को उसकी एक खास कार्यसंस्कृति ने ही बनाया और अब उसी खास कार्यसंस्कृति की वजह से सहारा तंगोतबाह होने को अभिशप्त है। सहारा मीडिया के प्रमुखों-संपादकों के कार्यकाल पर गौर करें तो हालात आया राम गया राम (देखें, ’सहारा इंडिया मीडिया के प्रमुख- तू चल मैं आया !’) जैसे ही हैं। सहारा में शायद ही किसी को टिककर काम करने का मौका मिला हो। जाहिर है, ऐसे में वे पत्रकार-कर्मचारी हमेशा अपनी नौकरी बचाने या निष्ठा बदलने की फिराक में रहे जिन पर चैनल को चलाने की जिम्मेदारी होती है।

पिछले आठ साल में सहारा मीडिया के प्रमुखों के कार्यकाल पर नजर दौड़ाएं तो साफ है कि सहारा का प्रबंधन सहारा मीडिया के उन्हीं प्रमुखों पर भरोसा नहीं रख पाया जिसकी नियुक्ति खुद सहारा प्रबंधन ने की थी। अगर ऐसा नहीं है तो आखिर क्या वजह है कि महज आठ सालों में प्रबंधन को आठ संपादकों को आजमाने की जरूरत पड़ गई। जाहिर है, ऐसे में सहारा प्रबंधन पर लगते रहे उन आरोपों में दम नजर आता है जिसमें कहा जाता है कि प्रबंधन को मीडिया प्रमुख के तौर पर अच्छे पत्रकार या प्रबंधक नहीं मिलते या फिर मिलते हैं तो प्रबंधन उन्हें संभाल कर नहीं रख पाता।

टाइम्स ऑफ इंडिया में लंबे समय तक बड़ी जिम्मेदारियां संभाल चुके वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय फरवरी 2005 में सहारा इंडिया मीडिया के हेड बने, लेकिन वो एक साल भी सहारा को अपनी सेवा नहीं दे पाए। अमर सिंह के साथ विवाद की वजह से महज नौ महीने में ही उन्हें सहारा को अलविदा कहना पड़ा। इसके बाद नवंबर 2005 में डीडी न्यूज से वीआरएस ले चुके प्रभात डबराल को सहारा मीडिया का प्रमुख बनाया गया। डबराल को भी सहारा में लंबे समय तक काम करने का मौका नहीं मिला। करीब डेढ़ साल के कार्यकाल के बाद जुलाई 2007 में प्रभात डबराल की भी छुट्टी कर दी गई। प्रभात डबराल के जाने के बाद आज तक और एनडीटीवी से जुड़े रहे देश के जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी को सहारा की कमान सौंपी गई, लेकिन महज सात महीनों में ही पुण्य प्रसून को सहारा का साथ छोड़ना पड़ा। इसके बाद, आज तक से जुड़े रहे संजय बरागटा को सहारा का कप्तान बनाया गया। नवंबर 2009 में करीब डेढ़ साल बाद बरागटा भी सहारा से अलग हो गए। इसके बाद बारी आई उपेन्द्र राय की। सबसे कम उम्र में सहारा जैसे मीडिया नेटवर्क के मुखिया बनने वाले उपेन्द्र का अनुभव मीडिया में महज आठ सालों का ही था। डेढ़ साल तक मीडिया प्रमुख के तौर पर काम करने के बाद नीरा राडिया मामले में फंसने की वजह से उपेन्द्र को बाहर का रास्ता तो नहीं दिखाया गया लेकिन मीडिया के कामकाज से इन्हें दूर जरूर कर दिया गया। उपेन्द्र राय के बाद सहारा के पुराने धुरंधर स्वतंत्र मिश्र को सहारा मीडिया का जिम्मा सौंपा गया। स्वतंत्र मिश्र के महज नौ महीने के कार्यकाल के बाद एक बार फिर उपेन्द्र राय सहारा की सत्ता हथियाने में कामयाब हो गए। लेकिन दूसरी बार उपेन्द्र राय भी सिर्फ सात महीने तक ही सहारा मीडिया के मुखिया पद पर काबिज रह पाए।

पिछले साल नवंबर में सहारा के पुराने और आजमाए हुए सिपाही संदीप बधवा को सहारा की कमान सौंपी गई। संदीप बधवा प्रबंधन, वित्त और बाजार जैसे क्षेत्रों में अपने कौशल और कामयाब रणनीति के लिए जाने जाते हैं। बधवा ने कई बार सहारा के वित्तीय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया है। बावजूद इसके, सहारा के अंदर हमेशा जारी रहने वाली पॉवर पॉलिटिक्स खत्म होने का नाम नहीं ले रही। बताया जा रहा है कि कुछ लोग अंदरखाने ही संदीप बधवा के खिलाफ सक्रिय हैं और सहारा प्रबंधन को उनके खिलाफ भड़काने में दिन-रात जुटे हैं।

दरअसल, अस्थिरता और अनिश्चितता सहारा का पर्याय बन चुकी हैं। जबकि, किसी भी न्यूज चैनल या अखबार की कामयाबी इस बात पर निर्भर करती है कि दर्शकों और पाठकों से उसके रिश्ता कितना सीधा और गहरा है। ये इससे भी तय होता है कि कोई खास व्यक्ति कैसे किसी चैनल और अखबार की पहचान बन जाता है। ये तभी संभव है जब एक दूरगामी रणनीति के तहत किसी खास शख्स पर भरोसा जताकर उसे काम करने की आजादी दी जाए। इस परिस्थिति के अभाव की वजह से ही आज तक, एनडीटीवी या इंडिया टीवी जैसे दूसरे सफल चैनलों की तरह सहारा एक ब्रांड के तौर पर अपनी पहचान बनाने में नाकामयाब रहा ।

सहारा इंडिया मीडिया के प्रमुख- तू चल मैं आया !

नाम कब से कब तक कार्यकाल
1 अंबिकानंद सहाय फरवरी 2005 अक्टूबर 2005 नौ महीना

2 प्रभात डबराल नवंबर 2005 जुलाई 2007 बीस महीना

3 पुण्य प्रसून वाजपेयी अगस्त 2007 फरवरी 2008 सात महीना

4 संजय बरागटा मार्च 2008 नवंबर 2009 बीस महीना

5 उपेन्द्र राय दिसंबर 2009 जून 2011 अठारह महीना

6 स्वतंत्र मिश्र जुलाई 2011 मार्च 2012 नौ महीना

7 उपेन्द्र राय अप्रैल 2012 अक्टूबर 2012 सात महीना

8 संदीप बधवा नवंबर 2012 अब तक

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