न्यूज चैनलों पर ललकार के बीच देशभक्ति की बमक !

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-सुधीश पचौरी

चैनलों पर युद्ध की ललकार
चैनलों पर युद्ध की ललकार
टीवी में देशभक्ति। टीवी में ललकार। टीवी में आक्रमण। टीवी में मार काट। कई रिटायर्ड जनरल, लेफ्टिनेंट, ब्रिगेडियर, कर्नल इस पार से और उस पार से टीवी पर आकर वीरता की बातें करते दिखते हैं। यह सैंतालीसवीं बार हो रहा है। इस पार वाले दिल्ली से बमक रहे हैं, उस पार वाले कराची, लाहौर या इस्लामाबाद से हुमक रहे हैं। एंकर टीवी पर ही एक बहस-युद्ध आयोजित करते हैं। यह टीवी की देशभक्ति है, जहां बातों के वीर रिटायर्ड होकर बहुत जोर-जोर से बोला करते हैं।
रिटायर्ड जनरल इस पार से: (टीवी में) मार डालेंगे।

रिटायर्ड जनरल नंबर दो उस पार से: (टीवी में) काट डालेंगे।

रि.ज. इस पार से: हमारी ताकत कम करके मत आंकना।

रि.ज. उस पार से: हमें कमजोर समझने की गलती न करना।

एंकर नंबर एक: मनमोहन ने चुप्पी लगाई हुई है। वे बोलते क्यों नहीं? देश को उनके जवाब की दरकार है।

एंकर दो: सोनिया गरम! मनमोहन नरम! यह क्या बात है? क्या वे नवाज शरीफ से अमेरिका में अब नहीं बात करेंगे। क्या अब भी कोई बात बची है?

एंकर तीन : करन थापर से एक भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद नाराज होकर भिड गए हैं : आप सरकार की वाणी क्यों बोल रहे हैं? करन चुप!

एंकर नंबर वन: रक्षामंत्री एंटनी ने कैसे कहा कि हमलावर पाकिस्तानी सेना की वर्दी में आतंकवादी थे। पाकिस्तान को छूटने का अच्छा बहाना दे रहे हैं अपने रक्षा मंत्री। (धिक्कार है)।

टाइम्स नाउ का एंकर शुरू में बहुत गुस्सा था। चार सौ पचास मीटर अपनी ही सीमा में घुस कर मार दिए जाने पर वह इस कदर गमगीन और क्षुब्ध था कि पाकिस्तान से ज्यादा अपनी ही सरकार पर बरसता दिखाई दिया।

एक टुकड़ा संसद दिखी सब चैनलों पर। एक में अरुण जेटली बोलते दिखे: रक्षामंत्री उन्हें (पाकिस्तानी सेना को) बचने का बहाना दे रहे हैं।

अगले टुकड़े में यशवंत सिन्हा ने सरकार को ललकारा: हम पाकिस्तान को उसी भाषा में जबाव दें।

इसके आगे वीरता के कई एपीसोड आए-गए। कुछ पैंसठ के युद्ध के रहे, कुछ बांग्लादेश, कुछ करगिल, कुछ मुशर्रफ अटल की आगरा वार्ता, कुछ मनमोहन की शर्म-अल-शेख की बारीकियों के जिक्र में नजर आए।

एक घंटे में मारे गए पांच जवानों की हत्या के अवसर पर एक दूसरे पर झपटते हुए सब रिटायर्ड और विशेषज्ञ अपने-अपने एंकरों के ‘थैंक्यू’ को लेकर फ्रेम से गायब हो गए। करन थापर, राजदीप, अर्णव सबकी वीरता आखिर में दुर्गाशक्ति को लेकर चल रहे वाग्युद्ध की ओर मुड़ गई।

सपा सरकार ने, अखिलेश और मुलायम ने, टीवी के मुकदमे का तोड़ निकाला और तीन दिन तक पीछे पड़े रहे सब टीवी कैमरों को, उनमें आकर बहस करने वालों को निरुत्तर कर दिया।

अखिलेश ने सपा का सार कुछ इस तरह कहा: शासन इसी तरह चलता है। स्कूल में मास्टर बच्चों की गलती पर पिटाई करता है। हमें कार्यकर्ताओं का खयाल रखना पड़ता है।

फिर एक चचा ने कहा: ले जाइए अपने कलट्टर। हम अपने हाकिमों से सरकार चला लेंगे!

एक ओर कानून-कायदे की निठल्ली टीवी की बातें, दूसरी ओर अपनी गलती न मान कर दुर्गा की गलती मनवाने वाले, सबको प्रशासन की नसीहत देने वाले सीएम!
टीवी के मुकदमे में आप रक्षात्मक न हों। सतत आक्रामक रहें। टीवी का मुकदमा गिर जाएगा। सपा का यह नया सबक उन सबके लिए है, जो अक्सर टीवी की मुकदमेबाजी से परेशान रहते हैं।

टीवी की बहस में सपा ने जबावदेही का रिकार्ड भी कायम किया: अर्णव ने पता नहीं किस साइत में सपा के नए प्रवक्ता अनुरागी को न्योता भेजा कि वे आते ही सब पर भरी पड़े। एक बार शुरू हुए तो बोलते गए। चुप होने का नाम हीं नहीं लेते थे। वे लगातार पांच मिनट तक बोले।

अर्णव ने बार-बार चुप करने को कहा, लेकिन वे न हुए। अर्णव ने यह भी कहा कि वे उनकी आवाज को काट देंगे, लेकिन किसकी मजाल उन्हें रोके? आखिर में बहस में आए लोगों ने हंस कर उनकी वक्तृता पर जोरदार ताली बजा कर प्रकारांतर से हूट करने की कोशिश की, लेकिन इस पर भी वे चुप न हुए। बाद में पता नहीं चला कि अपने आप कैसे चुप हो गए?

दुर्गा का मुद्दा तीन दिन छाया रहा। हर चैनल दुर्गा के पक्ष में झुका हुआ दिखा। लेकिन सत्ता और नौकरशाही में आखिर में नौकर हारता दिखा, सत्ता ने सत्तापन दिखाया।

सिद्ध हुआ कि ‘एक सड़क सबाल्टर्न’ भी होता है, जो खुद सत्तात्मक होता है और जो सत्ता रोकने वाले को भी सताने वाला होता है। साफ हुआ कि नौकर सिर्फ नौकर है। वह शाह नहीं है। नौकर को कभी अपने को शाह न समझना चाहिए। सबाल्टर्न सत्ता की कबड्डी में कानून का क्या काम? सब बुद्धिमान एंकर, सब रिटायर्ड नौकरशाह मिल कर यही शिकायत-सी करते रहे कि दलों को जो सूट करता है वही कानून है। सारे एंकर मिल कर भी सपा को रक्षात्मक नहीं बना सके। टीवी से निपटने का सपा का मार्ग ही सबका मार्ग है। सबको सबक रहे। आमीन!

एक दिन कैबिनेट ने एक तेलंगाना दिया। बदले में उसे सत्ताईस तेलंगाना मिले। संभाले न संभले। एक के बदले दो तीन नहीं सत्ताईस!

जी न्यूज पर एक ‘नागरिक शिकायत निवारण’ (सिटीजन ग्रीवांस रिड्रेसल) किस्म का कार्यक्रम आता है: ‘हक का सवाल’। इस बार की प्रस्तुति में मीमांसा मलिक ने बताया कि कार्यक्रम को अब तक नागरिकों और उपभोक्ताओं की उन्नीस हजार से ज्यादा शिकायतें मिलीं है और इस कार्यक्रम के जरिए उनमें से साढ़े पांच हजार से ज्यादा का निपटान हो चुका है। कई केस भी दिए। इनमें एक नेत्र चिकित्सक का केस था, जिसे सरकार से राहत नहीं मिल रही थी। इस कार्यक्रम में आने के बाद उसे उनका हक मिला। अफसरशाही की आनाकानी के कारण रुके हुए कई लाख रुपए मिले, जिन पर उनका हक था। ऐसे कई केस दिए। सबने अपनी कहानी कही और मिली राहत को बताया।

यह सचमुच का जनहितकारी कार्यक्रम है। जिनकी कहीं सुनवाई नहीं, वे यहां सुनवाई करा सकते हैं। यह कार्यक्रम इसी तरह का आश्वासन देता दिखाई पड़ता है।
सीएनएनआइबीएन पर इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान के सिलसिले में आयोजित बहस का विषय था: ‘कौन डरता है सोशल मीडिया से?’ कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शेखर गुप्ता, कुरेशी आदि की बातचीत में कई नए पहलू खुले।

(मूलतः ‘अजदक’ कॉलम में प्रकाशित. जनसत्ता से साभार)

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