एक रिपोर्टर जो रिपोर्टिंग छोड़ मार्केटिंग डिपार्टमेंट में चला गया

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हर्षवर्धन प्रकाश

वह एक अच्छा रिपोर्टर बन सकता था।

जब चार महीने तक सैलरी नहीं मिली, तो उसने आख़िरकार रीजनल न्यूज़ चैनल के दफ़्तर जाना बंद कर दिया। कब तक मुफ़्त में खटता रहता। दो महीने तक नौकरी ढूँढता रहा। अगले दो महीने तक उसकी कोई ख़बर नहीं।

फिर एक दिन अचानक उसका फ़ोन आया और मेरे मोबाइल के स्क्रीन पर उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर उभरी।

‘सर, मैंने 15 दिन पहले नया रीजनल न्यूज़ चैनल जॉइन किया है’। मैंने महसूस किया कि उसकी आवाज़ भी मुस्कुरा रही थी।

‘यार, तो फिर फ़ील्ड पर दिखाई क्यों नहीं दे रहे हो’, मैंने पूछा।

‘रिपोर्टिंग नहीं, मार्केटिंग डिपार्टमेंट जॉइन किया है सर’, उसने बताया।

मैं सन्न था।

फिर वह ख़ुद ही बताता चला गया-‘रिपोर्टिंग में 8 हज़ार सैलरी मिल रही थी और मार्केटिंग में 12 हज़ार। सीधा गणित है। महंगाई बहुत बढ़ गयी है सर। मैंने खूब सोचा और फ़ील्ड बदलने का फ़ैसला
किया।’

वह यह बात casual तरीके से कह रहा था. लेकिन हो सकता है कि जब वह रिपोर्टिंग छोड़ने का फ़ैसला कर रहा था, तब अपने कच्चे सपनों को टूटते देख रहा हो। हो सकता है कि वह किताबी आदर्शों को नंगी व्यावहारिकता के आगे मुंह की खाते देख रहा हो। हो सकता है कि उसे बड़ी कंपनियों में काम करने वाले गैर पत्रकार दोस्तों की सैलरी के अंक अपने आदर्शों के मुकाबले बड़े दिखाई दे रहे हों-जैसे उन अंकों पर व्यावहारिकता का magnifying glass रख दिया गया हो।

या यह भी हो सकता है कि ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था और मैं चीज़ों को बेवजह emotionalise कर रहा हूँ।

लेकिन एक बात कह सकता हूँ कि जब उसे भूख लग रही थी और उसकी जेब में पैसे नहीं थे, तब उसे ऐसी कोई रेसपी नहीं पता थी जिससे आदर्शों का अचार डाला जा सकता हो या नैतिक शिक्षा की किताबों के नूडल्स बनाये जा सकते हों !

इसे हालात से हारकर रण छोड़ने वाले रिपोर्टर की कहानी माना जाए या नये ज़माने के समझदार कर्मचारी की सत्यकथा। लेकिन यह छोटे शहरों में पत्रकारिता के बड़े सपने देखने वाले युवाओं की हकीकत का एक हिस्सा है।

वे युवा, जो कुछ कर दिखाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। चैनल तो ‘तर’ हो जाते हैं, लेकिन इन युवाओं को उनके पसीने का सही मोल नहीं मिलता। इनमें से कुछ ख़ुद को रोज़ तिल-तिल कर मरता देखते हैं, कुछ डटे रहते हैं, कुछ पत्रकारिता छोड़ देते हैं, तो कुछ पत्रकारिता की भ्रष्ट राह पकड़ लेते हैं।

वह अपना काम बदलकर ख़ुश है। लेकिन मैं अब भी सोच रहा हूँ कि वह एक अच्छा रिपोर्टर बन सकता था।

(स्रोत-एफबी)

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